केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्रों (CETPs) को उद्योगों की 'ब्लू श्रेणी’ (Blue Category) के तहत अनिवार्य पर्यावरणीय सेवाओं (ESS) के रूप में वर्गीकृत किया है।
उद्योगों की 'ब्लू श्रेणी' के बारे में

- इसमें 'अनिवार्य पर्यावरणीय सेवाएं' (ESS) शामिल हैं।
- ESS वे सुविधाएं हैं जो घरेलू और औद्योगिक कार्यों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को रोकने, कम करने और नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य हैं।
- मुख्य उदाहरण: सीवेज उपचार संयंत्र (STPs), अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन संयंत्र, बायोमाइनिंग और कंपोस्टिंग इकाइयां।
औद्योगिक क्षेत्रकों का वर्गीकरण
- CPCB ने प्रदूषण सूचकांक (Pollution Index - PI) के आधार पर उद्योगों को वर्गीकृत का एक तरीका विकसित किया है। यह 'एहतियाती सिद्धांत' (Precautionary Principle) पर आधारित है।
- प्रदूषण सूचकांक किसी उद्योग के जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और अपशिष्ट उत्पन्न करने की क्षमता को देखकर तैयार किया जाता है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य को ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ यानी इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) घोषित किया है।

इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) क्या है?
- ESZ को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाता है। यह पूरी तरह संरक्षित क्षेत्र से कम संरक्षण वाले क्षेत्र के बीच का परिवर्तन वाला क्षेत्र (ट्रांजीशन जोन) होता है।
- आमतौर पर यह अभयारण्य या राष्ट्रीय उद्यान के चारों ओर लगभग 10 किलोमीटर तक होता है। लेकिन हर स्थान पर इसका विस्तार अलग-अलग हो सकता है।
स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित भारत के पहले प्रदूषण नियंत्रण पोत (PCV), ICGS समुद्र प्रताप को गोवा में समुद्री बेड़े में शामिल (कमीशनिंग) किया गया।
ICGS समुद्र प्रताप की मुख्य विशेषताएं:
- यह गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा निर्मित किए जा रहे दो प्रदूषण-नियंत्रण पोतों में से पहला पोत है।
- यह भारतीय तटरक्षक बल (ICG) के बेड़े का अब तक का सबसे बड़ा पोत है।
- यह पोत निम्नलिखित आधुनिक उपकरणों से युक्त है:
- उन्नत प्रदूषण-पहचान प्रणाली,
- प्रदूषण नियंत्रण कार्रवाई हेतु समर्पित नौकाएं,
- ऑनबोर्ड प्रदूषण नियंत्रण प्रयोगशाला,
- आधुनिक अग्निशमन क्षमताएं।
Article Sources
1 sourceकेंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने भारत की रामसर सूची में 2 नई आर्द्रभूमियों के सूचीबद्ध होने की घोषणा की। ये हैं; पटना पक्षी अभयारण्य और और छारी-ढांड।
- अब रामसर अभिसमय के तहत भारत में कुल आर्द्रभूमियों की संख्या 98 हो गई है।
पटना पक्षी अभयारण्य के बारे में
- यह उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित एक संरक्षित अभयारण्य है। इसकी स्थापना 1991 में हुई थी।
- यह उत्तर प्रदेश का सबसे छोटा पक्षी अभयारण्य है।
- यहाँ कई प्रकार के जलीय पक्षी प्राप्त होते हैं, जैसे कि: लेसर विसलिंग-बतख, ग्रेलाग कलहंस, कॉम्ब बतख, रडी शेलडक, गॉडवाल, यूरेशियन विजन, इंडियन स्पॉट-बिल्ड बतख, नॉर्दर्न शोवेलर और नॉर्दर्न पिनटेल।
छारी-ढांढ आर्द्रभूमि रिजर्व के बारे में
- यह गुजरात के कच्छ जिले में शुष्क बन्नी घास के मैदानों और कच्छ के रण में नमक के दलदली मैदानों के किनारे पर स्थित है।
- कच्छी भाषा में 'छारी' का अर्थ है "खारा" और 'ढांढ' का अर्थ है "उथली आर्द्रभूमि"।
- यह कई संकटापन्न प्रजातियों का पर्यावास है। इनमें शामिल हैं; डेलमेटियन पेलिकन, ओरिएंटल डार्टर, ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क और इंडियन स्किमर।
- यह क्षेत्र "चिर बत्ती" (Chir Batti) या ‘भूतिया रोशनी' के लिए भी प्रसिद्ध है। यह बन्नी घास के मैदानों में अंधेरी रातों में देखी जाने वाली एक अद्भुत परिघटना है।
Article Sources
1 sourceप्रधान मंत्री ने हाल ही में काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना का उद्घाटन किया। इस परियोजना का उद्देश्य काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में वन्य-जीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के बारे में
- अवस्थिति: काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम में स्थित है। यह ब्रह्मपुत्र नदी और कार्बी (मिकिर) पहाड़ियों के बीच फैला है।
- मान्यता: यह एक राष्ट्रीय उद्यान, टाइगर रिजर्व और महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) है। 1985 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिला।
- यह क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह ऑस्ट्रेलेशिया और इंडो-एशियन फ्लाईवे के मिलन स्थल पर स्थित है।
- जैव विविधता: बाघ, हाथी, स्वैम्प डियर, जंगली भैंस, आदि।
- यहाँ भारतीय एक-सींग वाले गैंडे की सबसे अधिक संख्या पाई जाती है।
ऊर्जा और स्वच्छ वायु पर अनुसंधान केंद्र (CREA) के हालिया विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली के वार्षिक PM2.5 प्रदूषण का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा द्वितीयक प्रदूषकों , मुख्य रूप से अमोनियम सल्फेट के कारण होता है।
द्वितीयक प्रदूषकों (Secondary Pollutants) के बारे में
- ये प्रदूषक प्रत्यक्ष रूप से किसी स्रोत (जैसे- वाहन या विद्युत संयंत्र) से उत्सर्जित नहीं होते हैं।
- इसके बजाय ये तब बनते हैं, जब इन स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक वायुमंडल में मौजूद अणुओं के साथ रासायनिक अभिक्रिया करते हैं। इससे एक नया प्रदूषक निर्मित होता है।
- उदाहरण के लिए: अमोनियम सल्फेट, ओज़ोन, नाइट्रोजन के ऑक्साइड आदि।
- जो प्रदूषक किसी स्रोत से सीधे पर्यावरण में उत्सर्जित होते हैं, प्राथमिक प्रदूषक कहलाते हैं।
- अमोनियम सल्फेट का निर्माण: सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) गैस वायुमंडल में ऑक्सीकृत होकर 'सल्फेट' बनाती है। इसके बाद यह सल्फेट वायुमंडल में मौजूद 'अमोनिया' के साथ अभिक्रिया करता है। इस प्रक्रिया के अंत में अमोनियम सल्फेट का निर्माण होता है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य (संशोधन) नियम, 2025 अधिसूचित किए हैं।
मुख्य विवरण
- विस्तार: उत्सर्जन में कटौती के लिए बाध्यकारी (obligated) क्षेत्रकों की सूची में चार नए क्षेत्रक जोड़े गए हैं- पेट्रोलियम रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल्स, टेक्सटाइल्स (वस्त्र), और सेकेंडरी एल्युमीनियम।
- पिछले क्षेत्रक: एल्युमीनियम, सीमेंट, लुगदी व कागज और क्लोर-क्षार (chlor-alkali)।
- लक्ष्य और समयसीमा: नए नियम 208 विशिष्ट औद्योगिक इकाइयों को अनुपालन वर्ष 2025-26 से अपनी GHG उत्सर्जन तीव्रता (GEI) कम करने का आदेश देते हैं।
- GEI, उत्पाद की प्रति इकाई पर उत्पन्न होने वाली GHGs की मात्रा है। उदाहरण के लिए- सीमेंट या एल्युमिनियम जैसे उत्पाद के प्रति टन के उत्पादन में मुक्त गैसें।
- कटौती के लक्ष्य: कुल उत्सर्जन तीव्रता में कटौती का लक्ष्य 2026-27 तक 3% से 7% के बीच रखा गया है। इस हेतु आधार वर्ष: 2023-24 निर्धारित किया गया है।
- अनुपालन तंत्र: जो इकाइयां लक्ष्य पूरा करने में विफल रहेंगी, उन्हें कमी को पूरा करने के लिए कार्बन क्रेडिट प्रमाण-पत्र (CCCs) खरीदना होगा।
- ऐसा न करने पर 'पर्यावरण क्षतिपूर्ति' दंड लगाया जाएगा, जो CCCs की औसत व्यापारिक कीमत के दोगुने के बराबर होगा।
- महत्त्व: यह कदम भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) लक्ष्यों के अनुरूप है। इनमें 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम करने और 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य शामिल है।

एक अमेरिकी जीवविज्ञानी टोबी कियर्स को माइकोराइजल नेटवर्क पर उनके शोध-कार्य के लिए टायलर पर्यावरण उपलब्धि पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया गया है।
- गौरतलब है कि टायलर पुरस्कार को पर्यावरण के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है।
माइकोराइजल नेटवर्क के बारे में
- परिभाषा: ये भूमिगत फंगल (कवक) नेटवर्क होते हैं। इनमें माइकोराइजा कवक अपनी हाइफ़ा (फंगल धागों) के माध्यम से कई पौधों की जड़ों को आपस में जोड़ते हैं।
- माइकोराइजा कवक पौधों के साथ सहजीवी संबंध (symbiotic association) बनाते हैं। इसमें पौधे कवक को कार्बोहाइड्रेट देते हैं और बदले में उन्हें जल तथा आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।
- वन पारितंत्र में उपस्थित इस भूमिगत फंगल नेटवर्क को “वुड वाइड वेब” (Wood Wide Web) कहा जाता है।
- पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य भूमिका: ये नेटवर्क प्रतिवर्ष लगभग 13 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को मृदा में समाहित करने में मदद करते हैं।

बायोमैटेरियल्स यानी जैव-पदार्थ पारंपरिक, पेट्रोलियम आधारित उत्पादों के लिए संधारणीय विकल्प प्रदान करते हैं।
बायोमैटेरियल्स (जैव-पदार्थ) के बारे में:
- बायोमैटेरियल्स वे पदार्थ हैं जो पूरी तरह या आंशिक रूप से जैविक स्रोतों से प्राप्त होते हैं या जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से बनाई जाती हैं।
- अनुप्रयोग: बायोइंजीनियरिंग/जैव-चिकित्सा, पैकेजिंग, कृषि, स्वास्थ्य-देखभाल सेवा, वस्त्र उद्योग, आदि में।
भारत, सड़क निर्माण हेतु बायो-बिटुमेन (Bio-bitumen) का व्यावसायिक रूप से उत्पादन करने वाला विश्व का पहला देश बन गया है।
बायो-बिटुमेन के बारे में:
- यह बिटुमेन का एक वैकल्पिक रूप है, जिसे जैविक (ऑर्गेनिक) तत्वों से तैयार किया जाता है।
- उदाहरण: कृषि-अपशिष्ट, लिग्निन, बायोचार, बायो-ऑयल आदि।
- बिटुमेन: यह कच्चे तेल के आसवन (distillation) से उत्पन्न होने वाला एक काला पदार्थ है। यह अपने चिपकने वाले गुणों (adhesive properties) के लिए जाना जाता है।
- प्रमुख लाभ:
- कच्चे तेल के आयात में कमी लाई जा सकती है।
- पराली जलाने (Stubble burning) की समस्या का समाधान कर सकता है।
- जैव-अर्थव्यवस्था (Bioeconomy) को बढ़ावा दे सकता है।
- इसका उपयोग बिटुमेन के पूरक के रूप में किया जा सकता है या बाइंडर मिश्रण में बिटुमेन की मात्रा कम करने के लिए किया जा सकता है।
- अनुप्रयोग:
- सड़कों को पक्का करने में।
- जलरोधक कार्यों (Waterproofing) में, आदि।
अमेजन की डंकरहित मधुमक्खियां कानूनी अधिकार प्राप्त करने वाली पहली कीट बनीं।
डंकरहित मधुमक्खी (मेलिपोनिनी) के बारे में
- प्राचीन उत्पत्ति: यह विश्व की सबसे पुरानी मधुमक्खी प्रजाति है, जो लगभग 8 करोड़ वर्षों से अस्तित्व में है।
- शारीरिक संरचना: इनमें डंक होते हैं, लेकिन ये बहुत छोटे होते हैं और रक्षा के लिए कार्यात्मक रूप से अनुपयोगी हैं।
- विविधता: विश्व स्तर पर इनकी लगभग 500 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 170 से अधिक विशेष रूप से पेरू में पाई जाती हैं।
- उपचार: इनके शहद को "तरल स्वर्ण" कहा जाता है। यह अपने शक्तिशाली जीवाणुरोधी और सूजनरोधी गुणों के लिए मूल्यवान है।
- महत्त्व: ये प्राचीन परागणकर्ता कोको और कॉफी सहित अमेजन की 80% वनस्पतियों का पोषण करती हैं।
Article Sources
1 sourceगणतंत्र दिवस परेड 2026 में 'गलवान' और 'नुब्रा' नामक दो बैक्ट्रियन ऊंटों ने पहली बार कर्तव्य पथ पर मार्च कर इतिहास रचा।

बैक्ट्रियन ऊँट के बारे में
- इसका नाम बैक्ट्रिया से पड़ा है, जो मध्य एशिया का एक प्राचीन क्षेत्र था। यह ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाला बड़ा, सम-खुर वाला जानवर (Even-toed ungulate) है।
- पर्यावास: यह मूल रूप से मध्य एशिया के शुष्क और ठंडे क्षेत्रों में पाया जाता है। जैसे-गोबी और तकला मकान मरुस्थल में।
- भारत में लगभग 300–400 बैक्ट्रियन ऊंट पाए जाते हैं। ये सभी लद्दाख की नुब्रा घाटी में प्राप्त होते हैं।
- शारीरिक विशेषताएँ: इसकी पीठ पर दो कूबड़ होते हैं, जिनमें चर्बी (वसा) जमा रहती है।
- जलवायु अनुकूलन: इसके शरीर पर सर्दियों में घने फर उग आते हैं। यह −30°C से 40°C तक के तापमान को सहन कर सकता है।
- संरक्षण स्थिति: IUCN लाल सूची के अनुसार यह प्रजाति क्रिटिकली एंडेंजर्ड है।
- पालतू बैक्ट्रियन ऊँट (Camelus bactrianus) को संकटापन्न प्रजाति (Threatened Species) की श्रेणी में नहीं डाला गया है।
- हालांकि, वन्य बैक्ट्रियन ऊँट (Camelus ferus - जो कि एक विशिष्ट प्रजाति है), IUCN के अनुसार संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में है।
आंध्र प्रदेश सरकार 'स्पेस सिटी' परियोजना के तहत होप आइलैंड पर उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र विकसित करेगी। यह द्वीप कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा है।
होप आइलैंड के बारे में
- यह एक अपेक्षाकृत नया द्वीप है। यह गोदावरी डेल्टा के पानी द्वारा बहाकर लाई गई रेत से बनी 16 किलोमीटर लंबी 'सैंड स्पिट' (रेत की पतली पट्टी) है।
- यह काकीनाडा शहर को समुद्र की तूफान महोर्मि (Storm Surges) से बचाता है।
- यह एक प्राकृतिक 'जल अवरोधक (ब्रेक वाटर)' के रूप में कार्य करता है, जो समुद्र की लहरों को शांत रखता है। इसी कारण काकीनाडा बंदरगाह भारत के सबसे सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाहों में से एक है।
कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य के बारे में
- अवस्थिति: यह आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में स्थित है, जहाँ गोदावरी नदी और बंगाल की खाड़ी का मिलन होता है।
- यह गोदावरी मैंग्रोव वन का हिस्सा है। आंध्र प्रदेश सरकार ने इसे 1978 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया था।
पिछले सर्वेक्षण (2021–23) में भारत में अनुमानित 6,327 नदी डॉल्फिन दर्ज की गई थीं।
- वर्तमान सर्वेक्षण में गंगा और सिंधु नदी डॉल्फिन के अलावा, सुंदरवन एवं ओडिशा में पाई जाने वाली इरावदी डॉल्फिन को भी शामिल किया जाएगा।

डॉल्फिन परियोजना के बारे में
- शुरुआत: 15 अगस्त 2020 में।
- 'केंद्र प्रायोजित योजना: वन्यजीव पर्यावासों का विकास' के तहत एक योजना है।
- उद्देश्य: पर्यावास संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से समुद्री एवं नदी डॉल्फिन के साथ-साथ संबंधित सिटासियन (डॉल्फिन, व्हेल आदि) का भी संरक्षण करना।
नदी डॉल्फिन (सुपरफैमिली: प्लैटिनिस्टोइडे)
- विशेषताएं:
- ये कार्यात्मक रूप से दृष्टिहीन होती हैं और आवागमन व शिकार के लिए इकोलोकेशन पर निर्भर करती हैं।
- इनका थूथन (snout) लंबा व पतला, पेट गोल, शरीर गठीला तथा फ्लिपर्स बड़े होते हैं।
- एक शीर्ष शिकारी के रूप में, वे नदियों के स्वास्थ्य की प्रमुख संकेतक प्रजाति हैं।
- डॉल्फिन संरक्षण के लिए शुरू की गई पहलें:
- विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन वन्यजीव अभयारण्य (बिहार) की स्थापना की गई है।
- चंबल नदी संरक्षण क्षेत्र को डॉल्फिन संरक्षण क्षेत्र के रूप में नामित किया गया है।
- अन्य: डॉल्फिन परियोजना संचालन समिति का पुनर्गठन किया गया है; डॉल्फिन और व्हेलिंग कमिश्नरों की नियुक्ति की गई है; गंगा नदी डॉल्फिन की सैटेलाइट टैगिंग की जा रही है आदि।
Article Sources
1 sourceवैज्ञानिकों ने भारत में पफरफिश विषाक्तता (Pufferfish Poisoning) के पहले मामले की पुष्टि की है।
ताजे जल की पफरफिश के बारे में
- ये मछलियां टेट्राओडोंटिडी (Tetraodontidae) कुल की लगभग 30–35 उप-प्रजातियों का समूह हैं। ये अपना पूरा जीवन ताजे जल में बिताती हैं।
- सामान्य नाम: टोडफिश, पटका फिश, बैलूनफिश और फुगु।
- प्राप्ति क्षेत्र: पश्चिमी घाट तथा गंगा, ब्रह्मपुत्र और महानदी जैसे प्रमुख नदी बेसिन।
- आहार व पर्यावास: पफरफिश सर्वाहारी होती हैं और नितलस्थ (benthic) क्षेत्र में रहती हैं।
- विशिष्टता: इनमें टेट्रोडोटॉक्सिन (TTX) पाया जाता है, जो प्रकृति में ज्ञात सबसे प्रभावकारी न्यूरोटॉक्सिन (तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचाने वाला) में शामिल है।