सुर्ख़ियों में क्यों?
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने राज्य वित्त 2023-24 प्रकाशन का दूसरा संस्करण जारी किया।
अन्य संबंधित तथ्य
- राज्य वित्त 2023-24 प्रकाशन सभी 28 राज्यों की राजकोषीय स्थिति का एक समेकित और परीक्षित अवलोकन प्रस्तुत करता है।
- इस संस्करण में वर्ष 2014-15 से 2023-24 तक के 10 वर्षों की प्रवृत्ति का विश्लेषण भी शामिल है।
राज्यों की राजकोषीय स्थिति
- राजस्व प्राप्तियां: राज्यों का अपना कर राजस्व (SOTR) राजस्व प्राप्तियों का सबसे बड़ा घटक है, जिसका 2014-15 और 2023-24 के बीच लगभग 47 प्रतिशत योगदान रहा है।
- अन्य घटक: इनमें केंद्रीय करों और शुल्कों में हिस्सा (28 प्रतिशत), सहायता अनुदान (17 प्रतिशत) और राज्यों का गैर-कर राजस्व (8 प्रतिशत) शामिल है।
- केंद्रीय करों में हिस्सेदारी: यह वित्त वर्ष 2014-15 के 21.34 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 29.77 प्रतिशत हो गई, जो 14वें और 15वें वित्त आयोग के तहत उच्च कर हस्तांतरण को दर्शाती है।
- अन्य घटक: इनमें केंद्रीय करों और शुल्कों में हिस्सा (28 प्रतिशत), सहायता अनुदान (17 प्रतिशत) और राज्यों का गैर-कर राजस्व (8 प्रतिशत) शामिल है।
- पूंजीगत प्राप्तियां: 2014-15 से 2023-24 के दशक में, कुल ऋण और गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में लोक ऋण प्राप्तियां 94 से 99 प्रतिशत के बीच रही हैं।
- राज्यों का परिव्यय: 2014-15 से 2023-24 की दशकीय प्रवृत्ति के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्यों का बजटीय परिव्यय कुल संयुक्त सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 16.15 प्रतिशत से 17.49 प्रतिशत के बीच था।
- राजस्व परिव्यय: 2014-15 से 2023-24 के दौरान, राज्यों का राजस्व परिव्यय कुल व्यय का 80-87 प्रतिशत था।
- प्रतिबद्ध परिव्यय (वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान आदि) और सब्सिडी ने निरंतर राजस्व परिव्यय के आधे से अधिक हिस्से को अवशोषित किया, जो वित्त वर्ष 2023-24 में 51.76 प्रतिशत तक पहुंच गया।
- पूंजीगत परिव्यय: औसतन, 2014-15 से 2023-24 के दौरान राज्यों का पूंजीगत परिव्यय कुल बजटीय व्यय के 13-20 प्रतिशत की सीमा के भीतर रहा है।
- राजस्व परिव्यय: 2014-15 से 2023-24 के दौरान, राज्यों का राजस्व परिव्यय कुल व्यय का 80-87 प्रतिशत था।
- राजस्व और राजकोषीय घाटा: वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान, कुल 16 राज्य राजस्व अधिशेष की स्थिति में थे, जबकि 12 राज्य राजस्व घाटे में थे।
- वित्त वर्ष 2023-24 में, 18 राज्यों ने 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित GSDP के 3% की सीमा से अधिक राजकोषीय घाटा दर्ज किया।
राज्य वित्त के समक्ष जोखिम और उनके निहितार्थ
- बेशर्त नकद अंतरण (UCTs): बेशर्त नकद अंतरण के तेजी से बढ़ते पैमाने एवं निरंतरता ने राजकोषीय स्थिरता तथा मध्यम अवधि के विकास के संबंध में चिंताएं उत्पन्न कर दी हैं। (निम्न बॉक्स में आर्थिक सर्वेक्षण के निष्कर्ष दिए गए हैं)
बेशर्त नकद अंतरण (UCTs) पर आर्थिक सर्वेक्षण 2026 (Economic Survey 2026 on UCTs)
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- उच्च ऋण स्तर: ऋण के बढ़ते स्तर से ब्याज व्यय में वृद्धि होती है, जो राज्य के बजट पर दबाव डालता है।
- उच्च ब्याज भुगतानों को पूरा करने के लिए, सरकारें प्रायः अन्य उत्पादक व्ययों में कटौती करती हैं, जिससे मध्यम अवधि की विकास संभावनाएं प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती हैं।
- उच्च राजस्व परिव्यय: राज्यों का संयुक्त सकल राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2022 में GDP के 2.6% से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 3.2% हो गया, जबकि संयुक्त राजस्व घाटा इसी अवधि में GDP के 0.4% से बढ़कर 0.7% तक पहुंच गया। यह दर्शाता है कि राजस्व परिव्यय के वित्तपोषण हेतु निरंतर उधारी ली जा रही है।
- बढ़ती आकस्मिक देयताएं: राज्यों की बकाया गारंटी मार्च 2017 के अंत में GDP के 2% से बढ़कर मार्च 2024 के अंत में 3.9% हो गई है, जिससे राज्यों पर ऋण-शोधन का दबाव बढ़ गया है।

राज्य वित्त को सुदृढ़ करने हेतु आगे की राह
- सशर्त नकद हस्तांतरण: जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण द्वारा सुझाव दिया गया है, नकद सहायता को सशर्त, समीक्षा-आधारित और समयबद्ध रूप में तैयार किया जा सकता है। इससे दीर्घकालिक राजकोषीय कठोरता को कम करने में सहायता मिलेगी।
- उदाहरण के लिए: मेक्सिको के 'प्रोग्रेसा/ओपोर्टुनिडेड्स' (Progresa/Oportunidades) कार्यक्रम के अंतर्गत, परिवारों को नकद सहायता केवल तभी प्राप्त होती थी जब बच्चे नियमित रूप से स्कूल जाते थे और गर्भवती महिलाएं तथा छोटे बच्चे स्वास्थ्य जांच एवं पोषण निगरानी के लिए स्वास्थ्य केंद्रों पर जाते थे।
- राजस्व में सुधार: डिजिटलीकरण और प्रशासनिक सुव्यवस्थितीकरण के माध्यम से राजस्व बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए कर आधार को व्यापक बनाने, संपत्ति कर में वृद्धि करने, नए करों को अपनाने और व्यय को क्षमता-वर्द्धन एवं अवसंरचना विकास की ओर पुनर्गठित करने की आवश्यकता है। ऐसे निवेश राज्यों के GSDP और राजस्व को और अधिक बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
- आकस्मिक देयताओं का समाधान: संस्थागत सुधारों को अपनाना जैसे कि स्वतंत्र ऋण प्रबंधन कार्यालयों की स्थापना करना आवश्यक है। ये कार्यालय आकस्मिक देयताओं का पूर्वानुमान लगाने और राज्य सरकार की ऋण प्रबंधन रणनीति को क्रियान्वित करने के लिए उत्तरदायी होंगे।
- राजकोषीय परिषद: प्रत्येक राज्य अपनी स्वतंत्र राजकोषीय परिषद का गठन कर सकता है। इस परिषद में शिक्षाविदों, वित्तीय बाजार के प्रतिभागियों और अन्य विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए, जो राजकोषीय अनुशासन की निगरानी कर सकें।