सुर्ख़ियों में क्यों?
रक्षा मंत्री ने रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और भारत को वैश्विक रक्षा उत्पादन केंद्र बनाने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया।
भारत में रक्षा विनिर्माण प्रणाली
- रक्षा उत्पादन: भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन 2014 के ₹46,425 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में लगभग ₹1.51 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया ।
- सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम (DPSU) रक्षा उत्पादन में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। कुल उत्पादन में इनका योगदान लगभग 77% है।
- रक्षा क्षेत्र से निर्यात: भारत का रक्षा निर्यात 2013–14 के ₹686 करोड़ से बढ़कर 2024–25 में ₹23,622 करोड़ का हो गया।
- निजी क्षेत्र की भूमिका: 2024–25 में रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र का योगदान ₹15,233 करोड़ और DPSU का योगदान ₹8,389 करोड़ रहा।
- भारत के रक्षा निर्यात गंतव्य: भारत अब 100 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। 2023–24 में संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया प्रमुख खरीदार रहे।
- मुख्य निर्यातित रक्षा उपकरण: इनमें बुलेटप्रूफ जैकेट, गश्ती नौकाएं, चेतक हेलीकॉप्टर, डोर्नियर (Do-228) विमान, रडार और यहां तक कि टॉरपीडो जैसी उन्नत प्रणालियां भी शामिल हैं।
- स्टार्टअप्स: भारत में सैन्य-तकनीक (मिलिट्री-टेक) स्टार्टअप्स के लिए वित्तपोषण 2016 में ₹27 करोड़ से बढ़कर 2025 में ₹1,653 करोड़ हो गया, यानी इसमें 61 गुना वृद्धि दर्ज की गई है। कुल निवेश ₹5,248 करोड़ तक पहुंच चुका है।

रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहलें
- रक्षा औद्योगिक गलियारे: उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो विशेष रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित किए गए हैं।
- दोनों राज्यों में 11 नोड्स में फैले ये गलियारे आवश्यक अवसंरचना और आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान कर रहे हैं, ताकि भारत को एक मजबूत रक्षा विनिर्माण केंद्र बनाया जा सके।
- सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियां (Positive Indigenisation Lists): केंद्र सरकार ने रक्षा उपकरणों के आयात को कम करने और देश में रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियां जारी की हैं।
- इन सूचियों में तोपें, असॉल्ट राइफलें, कॉर्वेट युद्धपोत, सोनार सिस्टम, परिवहन विमान, हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर (LCH), रडार, पहिएदार बख्तरबंद वाहन, रॉकेट, बम, बख्तरबंद कमांड पोस्ट वाहन और बख्तरबंद बुलडोज़र जैसी प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।
- रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार (Innovations for Defence Excellence – iDEX): iDEX की शुरुआत अप्रैल 2018 में की गई थी। इसका उद्देश्य रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में नवाचार और नई प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना है।
- इसके तहत MSME, स्टार्टअप्स, व्यक्तिगत नवप्रवर्तक (इनोवेटर्स), अनुसंधान संस्थान और शैक्षणिक संस्थानों को जोड़ा गया है। अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए ₹1.5 करोड़ तक की अनुदान सहायता दी जाती है।
- उदार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति: रक्षा क्षेत्र में स्वचालित मार्ग से 74% तक और सरकारी मंजूरी से 74% से अधिक (100% तक) विदेशी निवेश की अनुमति है।
- अप्रैल 2000 से अब तक रक्षा उद्योगों में कुल FDI ₹5,516.16 करोड़ रहा है।
- रक्षा परीक्षण अवसंरचना योजना (Defence Testing Infrastructure Scheme – DTIS): इस योजना का उद्देश्य एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में आठ नए (ग्रीनफील्ड) परीक्षण और प्रमाणन सुविधाओं की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता देकर स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना है।
- प्रौद्योगिकी विकास निधि (Technology Development Fund – TDF): यह योजना 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए शुरू की गई है।
- डेफएक्सपो (DefExpo): डेफएक्सपो की परिकल्पना 1998 में की गई थी। यह भारत की रक्षा औद्योगिक क्षमताओं को प्रदर्शित करने और रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने का एक प्रमुख मंच बन चुका है।
रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने की चुनौतियां
- सीमित वित्तीय संसाधन: सरकार के समक्ष सीमित वित्तीय संसाधन होने, अन्य विकासात्मक जरूरतें और राजस्व व्यय का बोझ होने के कारण रक्षा स्वदेशीकरण की गति धीमी रही है।
- रक्षा मंत्रालय को मिले कुल बजट में से केवल 27.95% हिस्सा ही पूंजीगत व्यय (नई मशीनें, उपकरण, रक्षा प्लेटफॉर्म निर्माण, आदि) के लिए है।
- रक्षा प्रौद्योगिकी में नवाचार की कमी: हालांकि भारत अब साइबर सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, अंतरिक्ष और ड्रोन जैसी नई प्रौद्योगिकियों के विकास पर ध्यान दे रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों में बजटीय निवेश अभी भी पारंपरिक हथियार प्रणालियों में निवेश की तुलना में कम है।
- आयात पर निर्भरता: भारत अभी भी विमान इंजन, प्रणोदन प्रणाली, उन्नत सामग्री, सेंसर जैसी महत्वपूर्ण और उच्च प्रौद्योगिकी वाली प्रणालियों के लिए अन्य देशों पर निर्भर है।
- रक्षा नवाचार प्रणाली में समन्वय की कमी: हालांकि DRDO, शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग जगत के बीच सहयोग के लिए कई ढांचे बनाए गए हैं। हालांकि, व्यावहारिक स्तर पर यह सहयोग रक्षा अनुसंधान और विकास से जुड़ी परियोजना विशेष तक सीमित रहता है। यह सहयोग समग्र रक्षा नवाचार प्रणाली के स्तर पर नहीं देखा जाता है।
- पश्चिमी देशों में अधिकांश R&D निजी क्षेत्र द्वारा किया जाता है, जबकि भारत में यह निवेश मुख्य रूप से सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका रह गई है।
- आवश्यक इनपुट सुविधाओं की कमी: अत्याधुनिक रक्षा उत्पादन के लिए बड़े निवेश, सटीक मशीनिंग, परीक्षण सुविधाएं, सामग्री से जुड़ी प्रयोगशालाएं और सुरक्षित डिजिटल नेटवर्क जरूरी होते हैं। भारत में इन सुविधाओं की अभी भी कमी है।
- कौशल की कमी: हालांकि भारत में प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में इंजीनियर्स और विज्ञान स्नातक डिग्री लेकर कॉलेज से निकलते हैं, लेकिन उनके व्यावहारिक कौशल और रोजगार योग्य क्षमता को लेकर संदेह बना रहता है।
निष्कर्ष
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है, आपूर्तिकर्ताओं की संख्या बड़ी है और रक्षा उत्पादन को लेकर राजनीतिक सोच व जन-जागरूकता में भी बदलाव आया है। सरकार और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को और मजबूत करके, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता देकर और रक्षा निर्यात को कूटनीति का एक प्रभावी साधन बनाकर, भारत एक बड़े हथियार आयातक देश से एक विश्वसनीय वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र में रूपांतरित हो सकता है। इस प्रक्रिया में रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि औद्योगिक क्षेत्र के आधुनिकीकरण और सामरिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगा तहत दीर्घ काल तक आर्थिक मजबूती का भी प्रमुख आधार बनेगा।