सुर्ख़ियों में क्यों?

नीति आयोग ने निर्यात तत्परता सूचकांक (EPI) 2024 का चौथा संस्करण जारी किया है।
निर्यात तत्परता सूचकांक (EPI) क्या है?
- यह भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) की निर्यात तत्परता का एक व्यापक मूल्यांकन है।
- EPI का पहला संस्करण वर्ष 2020 में प्रकाशित हुआ था।
- यह वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के वस्तु निर्यात के लक्ष्य और विकसित भारत @2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
- EPI 2024 में राज्यों के वर्गीकरण में सुधार:
- दो मुख्य श्रेणियां: भू-क्षेत्रफल, जनसंख्या और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के आधार पर दो मुख्य श्रेणियां बनाई गई हैं: बड़े राज्य तथा छोटे राज्य, पूर्वोत्तर (NE) राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश (UTs)।
- इन श्रेणियों के भीतर, EPI 2024 राज्यों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत करता है:
- आकांक्षी (Aspirers): वे राज्य जो अपनी निर्यात क्षमता विकसित करने के प्रारंभिक चरण में हैं।
- चुनौती देने वाले (Challengers): उभरती हुई निर्यात क्षमता वाले राज्य जो बुनियादी आयामों को सुदृढ़ कर रहे हैं।
- अग्रणी (Leaders): वे राज्य जो निरंतर उच्च निर्यात प्रदर्शन प्रदर्शित कर रहे हैं।
EPI 2024 के मुख्य निष्कर्ष
- EPI 2024 के शीर्ष प्रदर्शनकर्ता
- बड़े राज्य: महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश।
- छोटे राज्य, उत्तर-पूर्वी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश: उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर, नागालैंड, दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, गोवा।
- स्तंभ-वार भारांश और प्रदर्शन
- निर्यात अवसंरचना (20%): इसमें विद्युत और जल की आपूर्ति, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तथा लास्ट-माइल कनेक्टिविटी शामिल है, जो समय पर वितरण और व्यापार लागत में कमी सुनिश्चित करते हैं।
- उदाहरण: महाराष्ट्र में जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) स्थित है, जो भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह है और देश के 50% से अधिक कंटेनरीकृत कार्गो का प्रबंधन करता है।
- व्यावसायिक पारितंत्र (40%): यह औद्योगिक क्लस्टरों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) और नवाचार केंद्रों की उपस्थिति का मूल्यांकन करता है जो व्यवसायों को कुशलतापूर्वक विस्तार करने में सक्षम बनाते हैं।
- उदाहरण: गुजरात की औद्योगिक नीति 2020 और IT-ITES नीति 2022-27 ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, अनुसंधान एवं विकास (R&D) और कौशल विकास पर केंद्रित हैं।
- निर्यात अवसंरचना (20%): इसमें विद्युत और जल की आपूर्ति, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तथा लास्ट-माइल कनेक्टिविटी शामिल है, जो समय पर वितरण और व्यापार लागत में कमी सुनिश्चित करते हैं।

- नीति और शासन (20%): यह निर्यात को सुगम बनाने वाली नीतियों, उनके कार्यान्वयन की प्रभावशीलता और निर्यातकों की सहायता में राज्य स्तरीय शासन की भूमिका का परीक्षण करता है।
- उदाहरण: उत्तर प्रदेश में एक जिला, एक उत्पाद (ODOP) योजना ने पारंपरिक शिल्प एवं वस्तुओं को बढ़ावा देकर स्थानीय उद्योगों और निर्यात को व्यापक रूप से प्रोत्साहित किया है।
- निर्यात प्रदर्शन (20%): यह किसी राज्य के निर्यात प्रयासों के वास्तविक परिणामों पर ध्यान केंद्रित करता है, जैसे कि निर्यात की मात्रा, मूल्य और विविधीकरण।
- उदाहरण: कर्नाटक का विविध और तकनीकी रूप से उन्नत विनिर्माण आधार इसके सुदृढ़ निर्यात प्रदर्शन का मुख्य कारक है। राज्य एयरोस्पेस, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो घटकों जैसे उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहा है।
भारत के निर्यात क्षेत्रक में विद्यमान चुनौतियां
- लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी: उदाहरण के लिए, तेलंगाना की भू-आबद्ध भौगोलिक स्थिति और कृष्णापटनम एवं विशाखापत्तनम जैसे दूरस्थ बंदरगाहों (600-700 किमी दूर) पर निर्भरता लॉजिस्टिक लागत एवं पारगमन समय में वृद्धि करती है, जिससे सड़क एवं रेल अवसंरचना पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- मूल्य अस्थिरता: उदाहरण के लिए, गुजरात की निर्यात संरचना पेट्रोलियम एवं पेट्रो-रसायन उत्पादों की ओर अत्यधिक झुकी हुई है, जो राज्य के कुल निर्यात मूल्य का आधे से अधिक भाग निर्मित करते हैं। यह स्थिति राज्य को वैश्विक तेल मूल्य अस्थिरता तथा पर्यावरणीय नीतिगत परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
- प्रतिस्पर्धा: उदाहरण के लिए, वियतनाम जैसे कम लागत वाले विनिर्माण केंद्रों से उभरती प्रतिस्पर्धा पंजाब के वस्त्र और कृषि-प्रसंस्करण जैसे पारंपरिक निर्यात क्षेत्रों के लिए चुनौती प्रस्तुत कर रही है।
- भू-राजनीतिक तनाव: उदाहरण के लिए, हरियाणा का निर्यात लचीलापन मुख्य रूप से अमेरिका, UAE और यूरोप जैसे सीमित बाजारों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण चुनौतीपूर्ण है, जो इसे भू-राजनीतिक तनाव या व्यापार नीति परिवर्तन से उत्पन्न बाह्य आघातों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
- गुणवत्ता और प्रमाणन: उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय परीक्षण और अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (NABL) के नेटवर्क की कमी वैश्विक खाद्य सुरक्षा मानकों को पूरा करने की क्षमता को सीमित करती है।
- कोल्ड चेन का अभाव: उदाहरण के लिए, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में शीत भंडारण एवं तापमान-नियंत्रित लॉजिस्टिक्स की अपर्याप्त उपलब्धता, नाशवंत वस्तुओं, समुद्री उत्पादों एवं फार्मास्यूटिकल्स उत्पादों जैसे क्षेत्रों में विविधीकरण की क्षमता को सीमित करती है, जिनके लिए एंड-टू-एंड शीत श्रृंखला आवश्यक होती है।
भारत के निर्यात परिदृश्य को सुदृढ़ करने हेतु प्रारंभ की गई प्रमुख सरकारी पहलें
- निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM): यह 2025 में घोषित एक प्रमुख पहल है। इसका उद्देश्य, भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को, विशेष रूप से MSMEs, पहली बार निर्यात करने वालों और श्रम-गहन क्षेत्रों के लिए सुदृढ़ करना है।
- निर्यात सुविधा केंद्रों (EFCs) की स्थापना: निर्यातकों, विशेष रूप से MSMEs को विदेशी बाजारों में अपने उत्पादों और सेवाओं के निर्यात के लिए आवश्यक मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से देश भर में EFCs स्थापित किए जा रहे हैं।
- वर्ष 2019 में निर्यात हब के रूप में जिले (DEH) पहल शुरू की गई थी। इस पहल का उद्देश्य देश के सभी जिलों में संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना और प्रत्येक जिले के उत्पादों की पहचान, ब्रांडिंग और प्रचार करना है।
- राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (NLP) और पीएम गति शक्ति: इनका उद्देश्य लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) पर आधारित योजना के माध्यम से मल्टी मॉडल कनेक्टिविटी को बढ़ाना है।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में कूरियर निर्यात पर प्रति-खेप 10 लाख रुपये की मूल्य सीमा को पूरी तरह हटाने की घोषणा की गई है। इससे छोटे व्यवसायों, कारीगरों और स्टार्टअप्स को ई-कॉमर्स चैनलों के माध्यम से वैश्विक बाजारों तक पहुंचने में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
भारत को राज्य-नेतृत्व वाली और अवसंरचना-संचालित निर्यात रणनीति की ओर संक्रमण करना चाहिए। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे क्षेत्रों के साथ लक्षित सहयोग के माध्यम से, भारत अपने व्यापार पोर्टफोलियो में विविधता लाने तथा लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है।