सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम भारत संघ (2026) के निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर एक विभाजित निर्णय दिया है।
अन्य संबंधित तथ्य
- धारा 17A को भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा जोड़ा गया था। यह प्रावधान करती है कि किसी लोक सेवक के विरुद्ध अधिनियम के अंतर्गत जांच प्रारंभ करने से पूर्व सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी।
- विभाजित निर्णय :
- न्यायमूर्ति विश्वनाथन: धारा 17A को संवैधानिक रूप से वैध माना, परंतु यह शर्त जोड़ी कि स्वीकृति का निर्णय लोकपाल या संबंधित राज्य के लोकायुक्त द्वारा लिया जाना चाहिए।
- न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना: धारा 17A को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया, क्योंकि यह केवल एक विशेष वर्ग के लोक सेवकों को संरक्षण प्रदान करती है।
- विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997) और डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, सीबीआई (2014) के पिछले निर्णयों में, न्यायालय ने उन कार्यकारी और वैधानिक प्रावधानों को निरस्त कर दिया था जिनमें वरिष्ठ लोक सेवकों के विरुद्ध जांच से पहले पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता होती थी।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 के बारे में
- यह अधिनियम लोक पदों पर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अधिनियमित किया गया था और इसे 2018 में संशोधित किया गया।
- यह अधिनियम लोक सेवक को इस प्रकार परिभाषित करता है:
- कोई भी व्यक्ति जो सरकार या स्थानीय प्राधिकरण की सेवा या वेतन पर कार्य करता है, अथवा जो किसी लोक कर्तव्य के निर्वहन हेतु सरकार द्वारा शुल्क या कमीशन के माध्यम से पारिश्रमिक प्राप्त करता है।
- कोई भी न्यायाधीश, जिसमें वह व्यक्ति भी शामिल है जिसे विधि द्वारा, स्वयं या किसी निकाय के सदस्य के रूप में, न्यायनिर्णयन संबंधी कार्य करने का अधिकार प्रदान किया गया हो।
- भ्रष्टाचार की परिभाषा: भ्रष्टाचार को किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कार्य करने या न करने के बदले में परितोष/उपहार (कानूनी पारिश्रमिक के अलावा) की स्वीकृति या मांग के रूप में परिभाषित किया गया है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 के अन्य मुख्य प्रावधान
पहलू | विवरण |
लोक सेवक को रिश्वत देने से संबंधित अपराध के लिए दंड | कोई भी लोक सेवक जो लोक कर्तव्य का बेईमानीपूर्ण तरीके निष्पादन के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करता है, उसे न्यूनतम 3 वर्ष के कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे 7 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है और वह जुर्माने के लिए भी भागी होगा। |
आदतन अपराधी के लिए दंड | ऐसे अपराधी को न्यूनतम 5 वर्ष से लेकर अधिकतम 10 वर्ष तक के कारावास से दंडित किया जाएगा तथा वह जुर्माने का भी भागी होगा। |
जांच करने के लिए अधिकृत व्यक्ति
| निम्नलिखित पद से नीचे का कोई भी पुलिस अधिकारी, बिना मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अथवा प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट (जैसा भी मामला हो) के आदेश के, ऐसे अपराध की जांच नहीं करेगा और न ही बिना वारंट गिरफ्तारी करेगा।
|
भारत में भ्रष्टाचार के प्रचलित होने के कारण
- केंद्रीकृत नियंत्रण: स्वतंत्रता के पश्चात राज्य का अत्यधिक नियंत्रण और नौकरशाही विनियमन ने शासन-प्रणाली में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप प्रदान किया। 'लाइसेंस-राज' व्यवस्था के अंतर्गत लाइसेंस एवं परमिट प्राप्त करने के लिए रिश्वत प्रचलित हो गई।
- 1980 के दशक का बोफोर्स घोटाला उच्चतम राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार को उजागर करता है, जिसने शासन-व्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को रेखांकित किया।
- राजनीतिक–नौकरशाही गठजोड़: राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच निकट संबंध संरक्षणवाद, भाई-भतीजावाद तथा भ्रष्ट नेटवर्कों की सुरक्षा को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए, आदर्श हाउसिंग घोटाला (2010, महाराष्ट्र)।
- सामाजिक-आर्थिक: भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। गरीबी और आर्थिक संकट रिश्वतखोरी एवं शोषण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाते हैं, जिससे वंचित वर्गों को मूलभूत सेवाएं प्राप्त करने के लिए भ्रष्ट तंत्र पर निर्भर होना पड़ता है।
- 'भ्रष्टाचार का संस्कृतिकरण': यह अवधारणा प्रो. कौशिक बसु (भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार) द्वारा प्रतिपादित की गई। इसके अनुसार भ्रष्ट आचरण को छिपाने के बजाय लोग उसे दिखाते हैं ताकि समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा मिल सके। धीरे-धीरे ऐसा अनैतिक व्यवहार सामान्य माना जाने लगता है और लोग आगे बढ़ने के लिए उसे स्वीकार करने लगते हैं।
- स्वतंत्र जांच एजेंसियों का अभाव: सीबीआई जैसी एजेंसियां कार्यपालिका के नियंत्रण में कार्य करती हैं, जिससे उनकी स्वायत्तता सीमित होती है और भ्रष्टाचार के मामलों की निष्पक्ष जांच प्रभावित होती है।
- इसके अतिरिक्त, न्यायालयों में लंबित मामलों की अधिकता के कारण भ्रष्टाचार मामलों के निस्तारण में विलंब होता है, जिससे दंड का प्रतिरोधक प्रभाव कमजोर पड़ जाता है।
- उदाहरण: केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, CBI द्वारा जांच किए गए 7,072 भ्रष्टाचार मामले न्यायालयों में लंबित हैं, जिनमें से 379 मामले 20 वर्षों से अधिक समय से अनिर्णीत हैं।
- पारदर्शिता का अभाव: प्रशासनिक गोपनीयता, कमजोर जन-निगरानी और व्हिसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम तथा सूचना का अधिकार (RTI) जैसे कानूनों के अपर्याप्त क्रियान्वयन से शक्ति के दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा मिलता है।
- भले ही भारत भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) 2025 में 91वें स्थान पर पहुंच गया है, लेकिन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल अभी भी भारत को उन देशों में वर्गीकृत करता है जो भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए "खतरनाक" हैं, विशेष रूप से स्थानीय खनन और रेत माफियाओं से जोखिम का हवाला देते हुए।
- चुनावी वित्तपोषण : अत्यधिक चुनावी व्यय और राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता की कमी, राजनेताओं, अधिकारियों और व्यवसायों के बीच 'लेनदेन' (quid-pro-quo) व्यवस्था को प्रोत्साहित करती है।
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, 2004-05 से 2022-23 के बीच छह प्रमुख राजनीतिक दलों को प्राप्त कुल चंदे का लगभग 60% (₹19,083 करोड़) अज्ञात स्रोतों से प्राप्त हुआ।
भारत में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हेतु अन्य कदम
|
आगे की राह
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) की सिफारिशें:
- भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को राज्य सतर्कता आयोग के अधीन लाया जाए।
- राज्यों की आर्थिक अपराध इकाइयों को सुदृढ़ किया जाए तथा विभिन्न एजेंसियों के मध्य समन्वय बढ़ाया जाए।
- लोक सेवकों के लिए नैतिक संहिता का विकास किया जाए, जिससे नैतिक आचरण को बढ़ावा मिले।
- पारदर्शी सार्वजनिक खरीद प्रणाली: डिजिटल ई-खरीद, लोक निविदा प्रकटीकरण तथा संभावित ब्लॉकचेन तकनीक के उपयोग से स्वतंत्र वास्तविक-समय अंकेक्षण द्वारा निधियों को ट्रैक किया जा सकता है जिससे अपव्यय और पक्षपात को कम हो सके ।
- न्यायिक सुधार: विशेष न्यायालय, समयबद्ध सुनवाई, प्रशिक्षित न्यायाधीश और तकनीक-आधारित मामले की ट्रैकिंग न्याय की गति बढ़ा सकती है।
- व्हिसलब्लोअर संरक्षण: व्हिसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम को और मजबूत बनाकर, शिकायत करने वाले की पहचान गोपनीय रखते हुए, कानूनी सुरक्षा प्रदान करके और सुरक्षित शिकायत माध्यम उपलब्ध कराकर अधिक खुलासों को बढ़ावा दिया जा सकता है तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।
- राजनीतिक वित्तपोषण: दानों का अनिवार्य प्रकटीकरण, व्यय सीमा का निर्धारण, बड़े अनाम चंदों पर प्रतिबंध तथा राज्य द्वारा वित्त पोषित चुनाव अभियान, राजनीतिक–प्रशासनिक–व्यावसायिक गठजोड़ को सीमित कर सकते हैं।
- संस्थागत उपाय : CBI, CVC और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी कानून प्रवर्तन एवं सतर्कता एजेंसियों को पर्याप्त संसाधन, अधिक कार्यात्मक स्वायत्तता और निरंतर क्षमता निर्माण प्रदान कर सशक्त बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 की धारा 17A जैसे प्रावधानों पर न्यायिक स्पष्टता के साथ राजनीतिक वित्तपोषण में सुधार, जांच एजेंसियों की स्वायत्तता में वृद्धि और नैतिक शासन में निरंतर सुधार से ही जवाबदेही सुदृढ़ हो सकती है। केवल संस्थाओं के आपसी समन्वित प्रयास और समाज की प्रतिबद्धता से ही भारत एक भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी और समावेशी लोक प्रशासन की ओर बढ़ सकता है।