सुर्ख़ियों में क्यों?
दक्षिणी राज्यों ने यह चिंता व्यक्त की है कि लोकसभा सीटों का जनसंख्या-आधारित परिसीमन तथा वित्त आयोग द्वारा धन आवंटन की वर्तमान पद्धति उनके साथ न्यायोचित नहीं है।
परिसीमन के बारे में
- परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत प्रत्येक राज्य में लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के लिए सीटों की संख्या और उनके प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाएं निर्धारित की जाती हैं।

- परिसीमन का उत्तरदायित्व एक उच्च-शक्ति प्राप्त निकाय को सौंपा जाता है जिसे परिसीमन आयोग (सीमा आयोग) के रूप में जाना जाता है।
- भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है—1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग (2022) ने परिसीमन आयोग अधिनियम, 2002 तथा जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अंतर्गत संघ राज्य क्षेत्र प्रदेश जम्मू-कश्मीर को 90 विधानसभा क्षेत्रों (जम्मू में 43 और कश्मीर में 47) तथा 5 संसदीय क्षेत्रों में पुनर्गठित किया।
- परिसीमन के लिए सांविधानिक उपबंध
- अनुच्छेद 82 और 170: संसद द्वारा अवधारित प्राधिकारी और रीति से प्रत्येक राज्य का प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों) में पुनः समायोजन और विभाजन।
- अनुच्छेद 330 और 332: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या का पुनर्निर्धारण।
- परिसीमन आयोग के आदेश विधि के समान प्रभावी होते हैं और इन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- लोकसभा या राज्य विधानसभाओं द्वारा इन आदेशों में संशोधन नहीं किया जा सकता।
- ये भारत के राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट तिथि से प्रभावी होते हैं।
परिसीमन आयोग से संबंधित महत्त्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
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परिसीमन का महत्व
- संवैधानिक अधिदेश: जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के साथ प्रतिनिधित्व के समय-समय पर संरेखण के लिए संविधान अनुच्छेद 82 और 170 के तहत परिसीमन अनिवार्य है।
- राजनीतिक समानता: यह निर्वाचन क्षेत्रों को समय-समय पर पुनर्व्यवस्थित करके "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" के लोकतांत्रिक सिद्धांत को क्रियान्वित करता है ताकि प्रत्येक विधायक लगभग समान संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे।

- गेरीमैंडरिंग (Gerrymandering) की रोकथाम: एक पारदर्शी परिसीमन प्रक्रिया राजनीतिक लाभ के लिए सीमाओं में हेरफेर की गुंजाइश कम करती है और चुनावों की सत्यनिष्ठा की रक्षा करती है।
- संघवाद : यह राष्ट्रीय और राज्य विधायिकाओं में प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों की संख्या निर्धारित करके संघीय ढांचे में क्षैतिज संतुलन बनाता है।
- ऐतिहासिक समायोजन : परिसीमन ने ऐतिहासिक रूप से सीटों के वितरण को इस प्रकार समायोजित किया है ताकि संसद, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय स्वशासी संस्थानों में जनसंख्या वितरण के सापेक्ष एक संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
- प्रभावी शासन व्यवस्था : जनसंख्या और जनसांख्यिकीय पैटर्न के साथ संरेखित निर्वाचन क्षेत्र प्रतिनिधियों को अपने मतदाताओं की जरूरतों को बेहतर तरीके से समझने में मदद करते हैं।
परिसीमन से संबंधित प्रमुख चुनौतियां
- संघीय असंतुलन: केवल जनसंख्या आधारित परिसीमन से उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार) को लाभ और जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों (जैसे दक्षिणी राज्य) को हानि हो सकती है।
- इससे संघीय संतुलन कमजोर हो सकता है क्योंकि राष्ट्रीय नीतियों को उत्तरी राज्यों की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाया जा सकता है, जिससे राज्यों के बीच राजनीतिक और क्षेत्रीय तनाव उत्पन्न हो सकता है।
- आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्र: वर्तमान व्यवस्था के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का उपबंध है। हालांकि, यह चिंता बनी हुई है कि इन निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण इन समुदायों के वास्तविक जनसांख्यिकीय वितरण को सटीक रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती है।
- जनभागीदारी का अभाव: वर्तमान प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनभागीदारी का अभाव है, क्योंकि निर्णय मुख्यतः परिसीमन आयोग (जो राजनीतिक नियुक्तियों से बना है) द्वारा किए जाते हैं। इससे लोगों और निर्धारित सीमाओं के बीच अलगाव उत्पन्न हो सकता है।
- प्रतिनिधित्व असंतुलन: जनगणना में विलंब के कारण वर्तमान जनसंख्या वितरण की तुलना में प्रतिनिधित्व में विकृति आई है, जिससे प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्वाचित प्रतिनिधियों तक पहुंच कमजोर हो गई है।
परिसीमन की अंतर्राष्ट्रीय प्रथाएं
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आगे की राह
- सीट वितरण: सीटों के आवंटन के लिए कुल प्रजनन दर (TFR)-समायोजित सूत्र का उपयोग किया जाए, जिसमें जनसंख्या-आधारित लोकसभा सीटों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर की TFR के आधार पर संतुलित किया जाए, ताकि जनसंख्या स्थिरीकरण में सफल राज्यों को दंडित किए बिना न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
- पारदर्शी प्रक्रिया: पारदर्शिता में सुधार और व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करते हुए राजनीतिक दलों, नागरिक समाज संगठनों तथा आम जनता जैसे हितधारकों को शामिल किया जाए, जिससे परिसीमन प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता को सुदृढ़ किया जा सके।
- आवधिक समीक्षा: परिसीमन नियमित रूप से किया जाना चाहिए। इसे आदर्श रूप में प्रत्येक जनगणना (प्रत्येक दस वर्ष) के बाद किया जाना चाहिए, ताकि जनसंख्या में हुई वृद्धि और परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करते हुए समान प्रतिनिधित्व बनाए रखा जा सके।
- प्रभावी प्रतिनिधित्व: निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाएं इस प्रकार निर्धारित की जाएं कि वे सामाजिक रूप से समेकित और प्रशासनिक रूप से व्यावहारिक हों। यह सांस्कृतिक और सामुदायिक एकता (विशेष रूप से SC और ST के लिए) को अक्षुण्ण रखें, साथ ही सुलभता, प्रभावी प्रतिनिधि-मतदाता संवाद और चुनावी स्थिरता बनाए रखने में व्यवधानों को न्यूनतम करें।
- निधि आवंटन: वित्त आयोग निधि आवंटित करने के लिए कई मानदंडों का उपयोग करता है, जैसे:
- आय अंतराल : कम आय वाले राज्यों को अधिक अंतरण प्राप्त होता है।
- जनसंख्या का आकार: यह राज्यों की व्यय संबंधी आवश्यकताओं को दर्शाता है। वित्त आयोगों ने वर्तमान आवश्यकताओं को दर्शाने के लिए या तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया है या जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों को पुरस्कृत करने के लिए 1971 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया है।
- जनसांख्यिकीय प्रदर्शन: यह प्रजनन दर में सफल कमी को पुरस्कृत करता है।
निष्कर्ष
आगे बढ़ते हुए, भारत को ऐसा परिसीमन और वित्तीय संघीय ढांचा विकसित करना चाहिए, जो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और सहकारी संघवाद के बीच संतुलन बनाए रखे। साथ ही यह सुनिश्चित करे कि जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विकास में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को नुकसान न हो। वैश्विक सर्वोत्तम अनुभवों और भारतीय संवैधानिक मूल्यों पर आधारित एक पारदर्शी, परामर्शात्मक और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण जनसंख्या के आधार पर न्याय और राज्यों के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक हो सकता है।