विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 (VIKSIT BHARAT SHIKSHA ADHISHTHAN (VBSA) BILL, 2025) | Current Affairs | Vision IAS

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विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 (VIKSIT BHARAT SHIKSHA ADHISHTHAN (VBSA) BILL, 2025)

01 Mar 2026
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक, 2025 को लोक सभा में प्रस्तुत किया गया था। अब इसे एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया है।

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 के बारे में

  • परिचय: इसका उद्देश्य संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची (सूची I) की प्रविष्टि 66 के तहत भारत में उच्चतर शिक्षा के लिए एक एकीकृत विनियामक संरचना निर्मित करना है।
    • संघ सूची की प्रविष्टि 66 उच्चतर शिक्षा या अनुसंधान संस्थानों और वैज्ञानिक व तकनीकी संस्थानों में मानकों के समन्वय एवं निर्धारण का प्रावधान करती है।
  • विधेयक की आवश्यकता: देश में उच्चतर शिक्षण संस्थाओं (HEIs) के लिए विनियामक प्रणालियों को सरल और सुव्यवस्थित बनाना।
    • साथ ही, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 शिक्षा संरचना के सभी पहलुओं (जिसमें इसका विनियमन और शासन शामिल हैं) के संशोधन एवं पुनर्गठन की परिकल्पना करती है।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA): उच्चतर शिक्षा के विनियमन हेतु कई संस्थाओं की जगह विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) नामक एकल आयोग का गठन किया जाएगा। यह उच्चतर शिक्षा के विनियमन हेतु शीर्ष संस्था होगी।
    • VBSA संस्थानों के वित्त-पोषण (Funding) को नियंत्रित नहीं करेगा।
  • VBSA के तहत विशिष्ट परिषदें: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान के अंतर्गत निम्नलिखित तीन परिषदों का गठन किया जाएगा:
    • विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद (विनियामक कार्यों हेतु);
    • विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद (प्रत्यायन यानी मान्यता प्रदान करने हेतु); तथा 
    • विकसित भारत शिक्षा मानक परिषद (शिक्षा के मानक निर्धारण हेतु)।
  • कानूनों का निरसन: यह विधेयक निम्नलिखित अधिनियमों को निरस्त करने का प्रावधान करता है:
    • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) अधिनियम, 1956;
    • अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) अधिनियम, 1987; तथा 
    • राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) अधिनियम, 1993.
  • आयोग के निम्नलिखित कार्य होंगे:
    • उच्चतर शिक्षा और अनुसंधान के लिए रणनीतिक दिशा प्रदान करना;
    • उच्चतर शिक्षा संस्थाओं (HEIs) को बड़े बहु-विषयक शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों में बदलने के लिए रोडमैप विकसित करना; तथा 
    • शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए योजनाओं का सुझाव देना।
  • HEIs पर जुर्माना: विनियामक परिषद कानून के उल्लंघन के लिए HEIs पर जुर्माना लगा सकती है।
  • अपील: आयोग और परिषदों के निर्णयों के विरुद्ध अपील केंद्र सरकार के समक्ष की जाएगी।
  • अपवाद: यह विधेयक कानूनी और चिकित्सा शिक्षा को अपने दायरे से बाहर रखता है। इनका विनियमन अलग-अलग अधिनियमों के तहत जारी रहेगा।
  • प्रस्तावित वास्तुकला परिषद (CoA): वास्तुविद अधिनियम, 1972 के अंतर्गत स्थापित यह परिषद भारतीय शिक्षा नीति 2020 की परिकल्पना के अनुसार एक पेशेवर मानक निर्धारण निकाय (Professional Standard Setting Body – PSSB) के रूप में कार्य करेगी।

भारत में उच्चतर शिक्षा की वर्तमान विनियामक संरचना

  • स्थिति: शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का हिस्सा है, जिसका अर्थ है कि यह केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की साझा जिम्मेदारी है।
    • हालांकि, तकनीकी व वैज्ञानिक शिक्षण संस्थान और अनुसंधान एवं मानकों का निर्धारण संघ सूची (प्रविष्टि 66) के अंतर्गत आते हैं, जिस पर केंद्र का विशेष अधिकार है।
  • शीर्ष विनियामक निकाय: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) शिक्षा मंत्रालय के तहत प्रमुख संस्था है। यह वित्त-पोषण, संस्थाओं को मान्यता देना, मानक निर्धारित करना, शिक्षण, परीक्षा व अनुसंधान की निगरानी करना आदि कार्य संपन्न करता है।
  • पेशेवर परिषदें: विशिष्ट क्षेत्रकों के विनियमन के लिए अलग-अलग वैधानिक निकाय कार्य करते हैं:
    • AICTE (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद): यह इंजीनियरिंग, प्रबंधन और अन्य तकनीकी शिक्षा का विनियमन करती है।
    • वैधानिक निकाय: विशिष्ट व्यवसायों के लिए अन्य निकाय हैं, जैसे:
      • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC): चिकित्सा शिक्षा के लिए;
      • बार कॉउन्सिल ऑफ़ इंडिया (BCI): कानूनी शिक्षा के लिए आदि।
  • प्रत्यायन निकाय: ये संस्थाएं गुणवत्ता के आधार पर संस्थानों और पाठ्यक्रमों का मूल्यांकन करती हैं:
    • NAAC (राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद): UGC द्वारा स्थापित, यह महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को उनकी गुणवत्ता के आधार पर ग्रेड प्रदान करती है।
    • NBA (राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड): AICTE अधिनियम के तहत स्थापित यह विशिष्ट तकनीकी कार्यक्रमों (जैसे मैकेनिकल इंजीनियरिंग में B.Tech) को मान्यता प्रदान करता है।

उच्चतर शिक्षा शासन में प्रमुख मुद्दे

  • कार्यों का विखंडन: वर्तमान में उच्चतर शिक्षा में कई विनियामक सक्रिय हैं, जैसे UGC, AICTE और राज्य सरकारें। इनके अधिकार क्षेत्र अक्सर एक-दूसरे के साथ टकराते हैं। इससे शिक्षण संस्थाओं के लिए लालफीताशाही व भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • हितों का टकराव: UGC जैसे निकाय वर्तमान में दोहरी भूमिका निभा रहे हैं, जैसे- नियम और मानक तय करना; अनुदान का वितरण करना आदि। एक ही संस्था द्वारा नियम बनाना और धन का वितरण करना शासन में पारदर्शिता की कमी व हितों के टकराव को जन्म देता है।
  • संसाधनों की असमानता: बजट के आवंटन में भारी असंतुलन है। UGC के कुल बजट का लगभग 65% हिस्सा केंद्रीय विश्वविद्यालयों द्वारा उपयोग किया जाता है। इसके विपरीत, राज्य विश्वविद्यालय, जो देश के अधिकांश छात्रों का नामांकन संभालते हैं, उन्हें केवल 35% बजट ही मिल पाता है।
  • 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' दृष्टिकोण: वर्तमान विनियामक ढांचा बहुत कठोर है। एक बड़े शोध-आधारित विश्वविद्यालय और एक छोटे शिक्षण कॉलेज के लिए एक जैसे ही नियम लागू किए जाते हैं। यह दृष्टिकोण संस्थानों में नवाचार और स्वायत्तता को रोकता है।
  • संकाय (फैकल्टी) की कमी: सार्वजनिक उच्चतर शिक्षण संस्थानों (HEIs) में शिक्षकों के पदों पर व्यापक रिक्तियां हैं। कई संस्थानों में 50% तक पद रिक्त पड़े हैं। भर्ती प्रक्रियाएं अक्सर नौकरशाही की जटिलताओं या राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण अवरुद्ध रहती हैं।
  • नियोजनीयता अंतराल: तकनीकी स्नातकों में नियोजन संबंधी कौशल की अत्यधिक कमी है। इससे शिक्षितों में बेरोजगारी बढ़ रही है।
    • इंडिया स्किल रिपोर्ट 2025 के अनुसार, केवल लगभग 55% भारतीय स्नातक ही "रोजगार के योग्य" (Employable) माने जाते हैं।
  • अनुसंधान संबंधी व्यय में कमी: अनुसंधान व विकास (R&D) और नवाचार पर सार्वजनिक व्यय में गिरावट देखी गई है। भारत अपनी जीडीपी का केवल 0.68% ही अनुसंधान और विकास पर व्यय करता है। इसकी तुलना में चीन और अमेरिका जैसे देश अपनी जीडीपी का बहुत बड़ा हिस्सा शोध पर व्यय करते हैं।

निष्कर्ष

VBSA विधेयक, 2025 में उच्चतर शिक्षा शासन को सुव्यवस्थित करने और इसे "विकसित भारत" के निर्माण के अनुरूप ढालने की अपार क्षमता है। हालांकि, इसकी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि इसका कार्यान्वयन कितना परामर्शात्मक, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित रहता है।

संबंधित सुर्ख़ियां

अमित कुमार बनाम भारत संघ वाद में उच्चतर शिक्षा संस्थाओं (HEIs) में छात्रों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।

उच्चतम न्यायालय के प्रमुख निर्देश:

  • एकीकृत कल्याण ढांचा: एक राष्ट्रीय कार्य बल को "यूनिवर्सल डिजाइन फ्रेमवर्क" और "कल्याण ऑडिट" के लिए मॉडल मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs) तैयार करने का कार्य सौंपा गया है।
    • संस्थानों द्वारा नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट स्कोर को सीधे राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) ग्रेडिंग से जोड़ा जा सकता है।
  • अनिवार्य रिपोर्टिंग: यदि किसी छात्र की आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु होती है, तो HEIs को तुरंत पुलिस को सूचित करना होगा, चाहे वह घटना परिसर (Campus), छात्रवास या पीजी में ही क्यों न हुई हो।
  • रिक्तियों को भरना: संकाय और प्रशासनिक पदों के सभी रिक्त पदों को 4 महीने के भीतर भरा जाएगा, जिसमें आरक्षित श्रेणियों को प्राथमिकता दी जाएगी। 
  • डेटा का केंद्रीकरण: डेटा-आधारित नीति निर्माण के लिए, विशेष रूप से 15-29 आयु वर्ग के बीच आत्महत्या पर प्रतिदर्श पंजीकरण आंकड़ों (SRS) को केंद्रीय स्तर पर बनाए रखा जाएगा। 
  • छात्रवृत्ति वितरण: लंबित छात्रवृत्तियों को 4 महीने के भीतर निपटाया जाएगा। भविष्य के वितरण के लिए समय-सीमा तय की जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि देरी के कारण छात्र की पढ़ाई पर कोई अकादमिक प्रतिबंध न लगे।
  • अन्य निर्देश:
    • HEIs में या 1 किमी के दायरे में 24/7 चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो।
    • NCRB (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़ों में स्कूली छात्रों और HEIs के छात्रों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए।
    • UGC के अनिवार्य विनियमों का कठोरता से पालन सुनिश्चित करना होगा।

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NCRB

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau) भारत सरकार का एक संगठन है जो देश में अपराधों और अपराधियों से संबंधित डेटा एकत्र, विश्लेषण और प्रसारित करता है।

मॉडल मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs)

मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs) विस्तृत, लिखित निर्देश हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि कार्य को लगातार और सही ढंग से निष्पादित किया जाए। 'मॉडल' SOPs का अर्थ है कि ये किसी विशिष्ट कार्य के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण या ढांचा प्रदान करते हैं।

कल्याण ऑडिट

यह एक प्रक्रिया है जिसका उपयोग किसी संस्थान की कल्याणकारी नीतियों और प्रथाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है, विशेष रूप से छात्रों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के संबंध में।

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