भारतीय प्रधानमंत्री ने अनेक अवसरों पर और स्पष्ट रूप से ये कहा है कि "यह युद्ध का युग नहीं है।" यह निःसंदेह विश्वभर के अरबों लोगों की साझी भावना है। फिर भी, रूस-यूक्रेन युद्ध और इजरायल-हमास युद्ध जैसे हालिया संघर्षों ने हिंसा की वेदी पर अनगिनत जानें ले ली हैं।
इस लेख में युद्ध की अवधारणा का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है तथा इसके ऐतिहासिक विकास की जांच करते हुए मानवता पर इसके प्रभाव की समीक्षा की गई है। इसके साथ ही युद्ध की पुनरावृत्ति के पीछे उत्तरदायी कारकों की पड़ताल और संस्थागत प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण किया गया है। इसमें एक स्थाई और समावेशी शांति के सृजन के लिए महत्वपूर्ण सबक भी प्रस्तुत किया गया है।
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