सुर्खियों में क्यों?
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत के राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (जैसे- GDP, GVA आदि) को "C" ग्रेड प्रदान किया है।
अन्य संबंधित तथ्य

- आईएमएफ (IMF) का "निगरानी के लिए डेटा पर्याप्तता" (Data Adequacy for Surveillance) आकलन किसी देश के सांख्यिकीय तंत्र के तकनीकी ऑडिट के रूप में कार्य करता है। 2025 की रिपोर्ट ने भारत के डेटा इकोसिस्टम के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया है:
- IMF के अनुसार, भारत के राष्ट्रीय लेखा डेटा पर्याप्त आवृत्ति और समयबद्धता के साथ उपलब्ध हैं और व्यापक रूप से पर्याप्त सूक्ष्मता प्रदान करते हैं।
- हालांकि, कुछ पद्धतिगत कमजोरियां सांख्यिकीय निगरानी को कुछ हद तक प्रभावित करती हैं, जो राष्ट्रीय लेखा के लिए 'C' ग्रेड की समग्र क्षेत्रीय रेटिंग का कारण बनती हैं।
- अन्य संकेतक: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), बाह्य क्षेत्रक और मौद्रिक/वित्तीय सांख्यिकी को "B" ग्रेड प्राप्त हुआ है।
IMF के अनुसार भारतीय सांख्यिकीय संरचना की प्रमुख चुनौतियाँ
- पुराने आधार वर्ष (Outdated Base Years): पुराने आधार वर्ष उन उद्योगों को दिए गए "भारांश" पर आधारित होते हैं जो अब प्रासंगिक नहीं भी हो सकते। सरल शब्दों में, यह पुरानी अर्थव्यवस्था के उद्योगों को आज भी अधिक महत्व देता है, जबकि नए और उभरते उद्योगों की अनदेखी करता है।
- भारत की जीडीपी श्रृंखला वर्तमान में 2011-12 के आधार वर्ष पर आधारित है।
- 14 वर्ष पुरानी यह संरचना डिजिटल अर्थव्यवस्था, गिग क्षेत्रक (जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म आधारित कार्य) और आधुनिक सेवाओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं कर पाती।
- भारत की जीडीपी श्रृंखला वर्तमान में 2011-12 के आधार वर्ष पर आधारित है।
- अपस्फीतिकारक संबंधी समस्या: आईएमएफ ने भारत द्वारा 'एकल अपस्फीति' (केवल अंतिम उत्पाद के मूल्य को कीमतों के अनुसार समायोजित करना) पर निर्भरता की आलोचना की है। इसके स्थान पर 'दोहरी अपस्फीति' (कच्चे माल और तैयार माल दोनों की कीमतों को अलग-अलग समायोजित करना) को अधिक सटीक माना जाता है।
- WPI बनाम PPI: भारत में अभी उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) का अभाव है। यह सूचकांक वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन स्थल से बाहर निकलते समय या उत्पादन प्रक्रिया में प्रवेश करते समय उनकी कीमतों में होने वाले औसत परिवर्तन को मापता है।
- परिणामस्वरूप, सांख्यिकीविद सेवाओं के मूल्य को समायोजित करने के लिए थोक मूल्य सूचकांक (WPI) का उपयोग करते हैं, जो मुख्य रूप से केवल वस्तुओं (Goods) के आंकड़ों पर आधारित होता है।
- WPI बनाम PPI: भारत में अभी उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) का अभाव है। यह सूचकांक वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन स्थल से बाहर निकलते समय या उत्पादन प्रक्रिया में प्रवेश करते समय उनकी कीमतों में होने वाले औसत परिवर्तन को मापता है।
- डेटा विलंब और अनौपचारिक क्षेत्रक: वर्तमान पद्धति असंगठित क्षेत्र की वृद्धि का अनुमान ऐसे बेंचमार्क्स के आधार पर लगाती है जो एक दशक से भी अधिक पुराने हैं।
- अद्यतन जनगणना के अभाव में नमूना सर्वेक्षण (जैसे PLFS या NSSO उपभोग सर्वेक्षण) अभी भी 2011 के पुराने जनसंख्या अनुमानों पर निर्भर हैं, जिससे परिणामों की सटीकता कम हो जाती है।
- उत्पादन बनाम व्यय: IMF ने उत्पादन पक्ष (GVA) और व्यय पक्ष से गणना की गई GDP के बीच काफी विसंगतियों की ओर भी संकेत किया है।

MoSPI द्वारा भारत के राष्ट्रीय लेखा डेटा में हालिया प्रमुख सुधार और अद्यतन
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आवश्यक सुधार
- राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) का सुदृढ़ीकरण: वित्त पर संसदीय स्थायी समिति की 27वीं रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से सिफारिश की है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) को वैधानिक दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए।
- आधुनिकीकरण और कार्यप्रणाली:
- आधार वर्ष संशोधन: MoSPI को नई राष्ट्रीय लेखा श्रृंखला (आधार वर्ष 2022-23) जारी करने के लिए 27 फरवरी, 2026 की समयसीमा का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
- श्रृंखला-आधारित प्रणाली: प्रत्येक दशक में स्थिर "आधार वर्ष" संशोधन की परंपरा से हटकर भारत को चेन-वेटेड प्रणाली (जिसका उपयोग अमेरिका और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाएं करती हैं) अपनाने पर विचार करना चाहिए, जिसमें वास्तविक समय के संरचनात्मक परिवर्तनों को दर्शाने हेतु भारांश वार्षिक रूप से अद्यतन किए जाते हैं।
- तकनीकी एकीकरण: बिग डेटा (GSTN डेटा, डिजिटल भुगतान डेटा) का उपयोग पारंपरिक सर्वेक्षणों के पूरक के रूप में उच्च-आवृत्ति संकेतक प्रदान कर सकता है।
- नए सर्वेक्षण:
- असंगठित क्षेत्रक के उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE): ASUSE की शुरुआत अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके डेटा का उपयोग अनौपचारिक क्षेत्रक के लिए पुराने बहिर्वेशन के स्थान पर वास्तविक वार्षिक डेटा को प्रतिस्थापित करेगा।
- घरेलू आय सर्वेक्षण: वर्ष 2026 में अपेक्षित भारत का पहला आधिकारिक 'घरेलू आय सर्वेक्षण', आय और व्यय के अनुमानों के बीच विद्यमान विसंगतियों को दूर करने में सहायक होगा।
- कैलेंडर अनुपालन: सरकार को जनगणना के संचालन को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि यह सांख्यिकीय प्रणाली का आधार है।
- सभी प्रमुख रिपोर्टों के लिए एक कठोर 'अग्रिम विमोचन कैलेंडर' का पालन सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है।
- पद्धतिगत बदलाव: विकसित अर्थव्यवस्थाओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले 'दोहरी अपस्फीति' मानक को अपनाने के लिए थोक मूल्य सूचकांक (WPI) से उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) आधारित अपस्फीति प्रणाली की ओर बढ़ना आवश्यक है।
निष्कर्ष
IMF द्वारा दिया गया "C" ग्रेड भारत की विकास गाथा पर अविश्वास का संकेत नहीं, बल्कि एक तकनीकी चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। संसदीय समिति की सिफारिशों को लागू करना तथा MoSPI के 2026 रिलीज़ कैलेंडर का पालन करना भारत की डेटा विश्वसनीयता को "C" से "A" स्तर तक उन्नत करने में निर्णायक सिद्ध होगा।