सुर्ख़ियों में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026-27 में वस्त्र क्षेत्रक को सुदृढ़ करने, बुनकरों और शिल्पकारों को सहायता प्रदान करने, निर्यात को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन हेतु सरकारी पहलों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।
भारत में वस्त्र क्षेत्रक की स्थिति:

- GGDP में योगदान: यह देश की कुल GDP में लगभग 2% का योगदान देता है।
- विनिर्माण क्षेत्रक में योगदान: कुल विनिर्माण सकल मूल्य वर्धन (GVA) का 11% है।
- निर्यात: वस्त्र एवं परिधान के मामले में विश्व का छठा सबसे बड़ा निर्यातक है।
- भारत के वस्त्र एवं परिधान निर्यात का लगभग 47% हिस्सा अमेरिका और यूरोपीय संघ मिलकर साझा करते हैं।
- रोजगार: देश में (कृषि के बाद) दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता क्षेत्रक है।
- MSME पारितंत्र: इस उद्योग की लगभग 80% क्षमता MSME क्षेत्रक में विस्तृत है।
अन्य सरकारी पहलें
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बजट 2026-27 में प्रमुख घोषणाएं
- एकीकृत वस्त्र क्षेत्रक कार्यक्रम: यह पांच प्रमुख उप-घटकों के इर्द-गिर्द संरचित है-
- घरेलू फाइबर आत्मनिर्भरता के लिए राष्ट्रीय फाइबर योजना।
- पारंपरिक क्लस्टरों को आधुनिक बनाने के लिए वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना।
- कारीगर सहायता को एकीकृत करने के लिए राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम।
- सतत विनिर्माण के लिए टैक्स-इको (Tex-Eco) पहल।
- समर्थ 2.0 कौशल विकास कार्यक्रम।
- मेगा टेक्सटाइल पार्क और तकनीकी वस्त्र: एकीकृत अवसंरचना और बड़े पैमाने की दक्षता प्रदान करने के लिए चैलेंज मोड में मेगा टेक्सटाइल पार्कों की स्थापना।
- महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल: इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार लिंकेज में सुधार, प्रक्रियाओं के आधुनिकीकरण और एक जिला एक उत्पाद (ODOP) पहल का समर्थन करके खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्रों को सशक्त बनाना है।
- निर्यात संवर्धन उपाय: शुल्क-मुक्त आयातित इनपुट का उपयोग करके बनाए गए वस्त्रों, जूतों और चमड़े के उत्पादों के निर्यातकों को लचीलापन प्रदान करने हेतु निर्यात दायित्व अवधि को 6 से बढ़ाकर 12 महीने कर दिया गया है।

- TReDS के माध्यम से MSMEs को तरलता सहायता:
- केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्रक के उद्यमों (CPSEs) द्वारा व्यापार प्राप्य छूट प्रणाली (TReDS) के उपयोग को अनिवार्य बनाया जाएगा।
- TReDS पर इनवॉइस छूट के लिए सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों हेतु क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (CGTMSE) के माध्यम से क्रेडिट गारंटी सहायता प्रदान की जाएगी।
- गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) को TReDS के साथ जोड़ा जाएगा।
- SME ग्रोथ फंड: सूक्ष्म उद्यमों को समर्थन देने और वस्त्र पारितंत्र में भविष्य के "चैंपियन SME" विकसित करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का कोष बनाया गया है।
वस्त्र उद्योग के समक्ष चुनौतियां
- कच्चे माल की बाधाएं: कपास की निम्न गुणवत्ता, जलवायु परिवर्तन के कारण कपास की उपज पर प्रभाव और सिंथेटिक फाइबर के लिए आयात पर निर्भरता।

- तीव्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा: बांग्लादेश और वियतनाम से कड़ी प्रतिस्पर्धा, तथा चीन से सस्ते कृत्रिम फाइबर (MMF) से बने कपड़ों की डंपिंग।
- हालिया भू-राजनीतिक चुनौतियां: उदाहरण के लिए, भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा लगाया गया 50% का भारी टैरिफ।
- स्वचालन का अभाव: शारीरिक श्रम पर अत्यधिक निर्भरता, जिससे त्रुटियों की संभावना बढ़ती है और उत्पादकता कम होती है।
- कौशल की कमी: इस क्षेत्रक का अत्यधिक विखंडित होना, जहां 90% से अधिक बुनाई इकाइयां असंगठित क्षेत्र में हैं।
- जटिल विनियामक ढांचा: DGFT की प्रशासनिक जटिलताएं, GST दरों में विसंगतियां और महंगे गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCOs) प्रतिस्पर्धात्मकता को बाधित करते हैं।
आगे की राह
- उन्नत स्वचालन अपनाएं: स्मार्ट लूम, AI-संचालित मांग पूर्वानुमान और RFID ट्रैसेबिलिटी को एकीकृत किया जाना चाहिए।
- अवसंरचना और R&D में निवेश: प्लग-एंड-प्ले डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस मेगा टेक्सटाइल पार्क स्थापित किया जाना चाहिए।
- तकनीकी वस्त्रों पर ध्यान: नई वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए तकनीकी और प्रदर्शन-आधारित वस्त्रों जैसे उच्च-मूल्य वाले खंडों में विविधता लाई जानी चाहिए।
- घरेलू मानव निर्मित फाइबर (MMF) को बढ़ावा: राष्ट्रीय फाइबर योजना के तहत घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित कर आयातित सिंथेटिक फाइबर पर निर्भरता कम किया जाना चाहिए।
- कपास की आपूर्ति श्रृंखला सुदृढ़ की जानी चाहिए: कपास किसान ऐप और कस्तूरी कॉटन भारत जैसी ब्रांडिंग पहलों के माध्यम से भारतीय कपास की पारदर्शिता और वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाई जानी चाहिए।
- मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) का लाभ: प्रमुख अंतर्राष्ट्रीयबाजारों तक शून्य-शुल्क पहुंच प्राप्त करने के लिए भारत-यूरोपीय संघ FTA जैसे समझौतों का सक्रिय उपयोग किया जाना चाहिए।
- कार्यबल का कौशल उन्नयन: व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करके और उन्नत समर्थ 2.0 कार्यक्रम का उपयोग करके कौशल की कमी को दूर किया जाना चाहिए।
- पारंपरिक शिल्पकारों का सशक्तिकरण: महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल के माध्यम से ग्रामीण उद्योगों, हथकरघा और खादी को समर्थन देना चाहिए।
- संधारणीयता-संबद्ध वित्तपोषण: MSMEs के लिए ऐसे वित्तपोषण मॉडल की शुरुआत की जानी चाहिए जहां लाभ सीधे सकारात्मक पर्यावरणीय परिणामों से जुड़े हों।