भारत में खाद्य सुरक्षा और मानक
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के सर्वेक्षणों से देश में खाद्य गुणवत्ता से जुड़ी गंभीर समस्याओं का संकेत मिलता है। लगभग 20% तैयार खाद्य पदार्थ FSSAI के मानकों पर खरे नहीं उतरते, हालाँकि यह उपभोग के लिए पूरी तरह असुरक्षित नहीं है।
कम गुणवत्ता वाले खाद्य के निहितार्थ
- पैमाना और प्रभाव: 20% का आंकड़ा देश भर में उपभोग किए जाने वाले खाद्यान्न की पर्याप्त मात्रा को दर्शाता है, जो उत्पादन स्तर पर उच्च हानि के साथ-साथ खाद्य असुरक्षा में योगदान देता है।
- पर्यावरणीय लागत: चाहे उत्पादन के स्तर पर हो या उपभोग के स्तर पर खाद्य अपशिष्ट भूमि और जल के अकुशल उपयोग का कारण बनता है, जिससे समय के साथ महत्वपूर्ण पर्यावरणीय लागत उत्पन्न होती है।
- बाजार तक पहुंच पर प्रतिबंध: राष्ट्रीय खाद्य मानकों को पूरा करने में असमर्थता, वैश्विक खाद्य व्यापार में भारत के एकीकरण को सीमित करती है, क्योंकि उच्च निर्यात मानक गैर-टैरिफ बाधाओं के रूप में कार्य करते हैं।
- आर्थिक प्रभाव: घटिया भोजन से उत्पन्न पोषण संबंधी कमियां समग्र आर्थिक उत्पादकता को प्रभावित करती हैं।
चुनौतियाँ और समाधान
- नीतिगत चुनौतियाँ: संभावित निर्यात गंतव्यों में उच्च मानकों के कारण संरक्षणवादी नीतियों को बढ़ावा मिलता है, जैसे- टैरिफ, जो भारत की खाद्य सुरक्षा रणनीति को प्रभावित करते हैं।
- गुणवत्ता सुधार: गुणवत्ता संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें क्षमता निर्माण, कठोर प्रवर्तन तथा आय में वृद्धि के साथ बदलती खाद्य आदतों के अनुकूल होना शामिल है।
- नियामक प्रवर्तन: घटिया खाद्यान्न के अनुपात को कम करने के लिए प्रवर्तन क्षमता को मजबूत करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्थिर दर प्रणालीगत विफलताओं को इंगित करती है।