यौन उत्पीड़न रोकथाम (PoSH) अधिनियम, 2013 (Prevention of Sexual Harassment (PoSH) Act, 2013) | Current Affairs | Vision IAS

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यौन उत्पीड़न रोकथाम (PoSH) अधिनियम, 2013 (Prevention of Sexual Harassment (PoSH) Act, 2013)

28 Jan 2026
1 min

In Summary

  • सुप्रीम कोर्ट ने PoSH अधिनियम 2013 का विस्तार किया, जिससे महिलाओं को बाहरी लोगों द्वारा उत्पीड़न के लिए अपने कार्यस्थल पर ही आईसीसी के समक्ष शिकायत दर्ज करने की अनुमति मिल गई।
  • पीओएसएच अधिनियम 2013 यौन उत्पीड़न, कार्यस्थल और पीड़ित महिलाओं को परिभाषित करता है; विशिष्ट संरचनाओं और प्रक्रियाओं के साथ शिकायत निवारण के लिए आईसीसी/एलसीसी को अनिवार्य बनाता है।
  • कार्यान्वयन संबंधी मुद्दों में आईसीसी का गठन न होना, अनौपचारिक क्षेत्रों में चुनौतियां, प्रक्रियात्मक अस्पष्टता, कम रिपोर्टिंग और साक्ष्य संबंधी कठिनाइयां शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, उच्चतम न्यायालय ने डॉ. सोहेल मलिक बनाम भारत संघ एवं अन्य वाद (2025) में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 या पॉश (PoSH) अधिनियम, 2013 के दायरे का विस्तार किया है।

अन्य संबंधित तथ्य

  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि यदि किसी महिला का अपने संगठन के बाहर के किसी व्यक्ति द्वारा कार्यस्थल पर उत्पीड़न किया जाता है, तब वह अपने स्वयं के कार्यस्थल की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) के पास शिकायत दर्ज करा सकती है, न कि तृतीय पक्ष के प्रतिष्ठान की ICC के समक्ष।
  • यह निर्णय पीड़ित महिला के कार्यस्थल पर गठित ICC को किसी अन्य कार्यस्थल के कर्मचारी पर भी अधिकार-क्षेत्र प्रयोग करने की अनुमति देता है।

पॉश (PoSH) अधिनियम 2013 के मुख्य प्रावधान

  • PoSH अधिनियम का आधार उच्चतम न्यायालय का विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) का निर्णय है।
  • अधिनियम की धारा 16 शिकायत दर्ज कराने वाली महिला की पहचान गोपनीय रखने के लिए शिकायत और जांच कार्यवाही की सामग्री के प्रकाशन या उसे सार्वजनिक करने पर रोक लगाती है।

प्रमुख परिभाषाएं

यौन उत्पीड़न

समें निम्नलिखित में से कोई भी एक या अधिक अवांछित कृत्य या व्यवहार (चाहे प्रत्यक्ष रूप से हो या निहितार्थ रूप से) शामिल हैं, जो निम्नानुसार हैं:

  • शारीरिक संपर्क या प्रस्ताव;
  • यौन संबंधों की मांग या अनुरोध;
  • यौन संबंधी टिप्पणियाँ करना;
  • अश्लील साहित्य दिखाना;
  • यौन प्रकृति का कोई अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक, या गैर-मौखिक आचरण।

कार्यस्थल

  • रोजगार के कारण या रोजगार के दौरान कर्मचारी द्वारा दौरा किया गया कोई भी स्थान, जिसमें ऐसी यात्रा करने के लिए नियोक्ता द्वारा प्रदान किया गया आवागमन या परिवहन भी शामिल है।
  • एक कार्यस्थल में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रक शामिल हैं।

पीड़ित/व्यथित महिला

इसमें सभी महिलाएं शामिल हैं, चाहे उनकी आयु या रोजगार की स्थिति कुछ भी हो और चाहे वे संगठित या असंगठित क्षेत्रकों, सार्वजनिक या निजी क्षेत्रकों में हों। इसमें क्लाइंट्स, ग्राहक और घरेलू कामगार भी शामिल हैं।

शिकायत निवारण तंत्र

शिकायत समिति

 

आंतरिक शिकायत समिति (ICC) और स्थानीय शिकायत समिति (LCC)

  • 10 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रत्येक निजी या सार्वजनिक संगठन में ICC अनिवार्य है।
  • ICC की संरचना: न्यूनतम चार सदस्य जिनमें से आधी महिलाएं होंगी।
    • पीठासीन अधिकारी;
    • अधिमानतः महिलाओं के हितों के प्रति प्रतिबद्ध या सामाजिक कार्य का अनुभव या विधिक ज्ञान रखने वाले कर्मचारियों में से दो सदस्य;
    • गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) या महिलाओं के हितों के प्रति प्रतिबद्ध संघों से एक सदस्य
  • प्रत्येक जिला अधिकारी 10 से कम श्रमिकों वाले संगठनों से शिकायतें प्राप्त करने के लिए LCC का गठन करता है।
  • LCC की संरचना: न्यूनतम पांच सदस्य जिनमें से आधी महिलाएं होंगी
    • सामाजिक कार्य के क्षेत्र की प्रतिष्ठित महिला, जो महिलाओं के हितों के प्रति प्रतिबद्ध हो (अध्यक्ष);
    • जिले में ब्लॉक, तालुका या तहसील या वार्ड या नगरपालिका में कार्यरत महिलाओं में से एक सदस्य;
    • महिलाओं के हितों के प्रति प्रतिबद्ध गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) या संघों से दो सदस्य (कम-से-कम एक महिला होगी);
    • जिले में सामाजिक कल्याण या महिला एवं बाल विकास से संबंधित अधिकारी (पदेन सदस्य)
  • ICC और LCC के सभी सदस्यों का कार्यकाल: 3 वर्ष
  • ICC और LCC दोनों के पास दीवानी न्यायालय (सिविल कोर्ट) के समान शक्तियां हैं।

शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया

  • कोई भी पीड़ित महिला या उसका विधिक उत्तराधिकारी कार्रवाई के लिए ICC या LCC के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकता है।
  • शिकायत "घटना की तारीख से तीन माह के भीतर" की जानी चाहिए। हालांकि, ICC या LCC इस अवधि को अधिकतम तीन माह तक बढ़ा सकती है।

सुलह (Conciliation)

  • ICC/LCC जांच से पहले और पीड़ित महिला के अनुरोध पर, सुलह के माध्यम से उसके और प्रतिवादी के बीच मामले को निपटाने के लिए कदम उठा सकते हैं।
  • हालांकि, "किसी भी मौद्रिक समझौते" को सुलह का आधार नहीं बनाया जाएगा।

शिकायत की जाँच

  • ICC/LCC या तो पीड़िता की शिकायत पुलिस को अग्रेषित कर सकती है, अथवा स्वयं जांच प्रारंभ कर सकती है, जिसे 90 दिनों के भीतर पूरा किया जाना अनिवार्य है।
  • जांच पूर्ण होने के बाद ICC/LCC को 10 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट नियोक्ता को सौंपनी होगी।

दोषी के विरुद्ध कार्रवाई

  • यदि यौन उत्पीड़न के आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो ICC/LCC नियोक्ता को कंपनी के सेवा नियमों के अनुसार दोषी के विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश करेगी।

अपील 

  • यदि पीड़ित महिला या प्रतिवादी निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तब वह 90 दिनों के भीतर न्यायालय या अधिकरण में अपील कर सकती है।

झूठी शिकायत 

  • यदि शिकायत झूठी पाई जाती है, तब ICC नियोक्ता को सेवा नियमों के अनुसार शिकायतकर्ता महिला या शिकायत करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश कर सकती है।

 

पॉश (PoSH) अधिनियम 2013 के कार्यान्वयन से जुड़े मुद्दे

  • आंतरिक समितियों (ICCs) का गठन न होना: अनेक संस्थान या तो ICCs का गठन नहीं करते हैं या उनका गठन अनुचित तरीके से करते हैं (उदाहरण के लिए, बाह्य सदस्य की अनुपस्थिति)। इससे अधिनियम का मूल प्रवर्तन तंत्र कमजोर हो जाता है।
    • उदाहरण: देश के 30 राष्ट्रीय खेल महासंघों में से 16 ने अब तक ICC का गठन नहीं किया था।
  • अनौपचारिक/असंगठित क्षेत्रक: अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में, जहाँ नियोक्ता-कर्मचारी संरचनाएं अस्पष्ट हैं, वहां PoSH अधिनियम के संरक्षण तक पहुंचना और उन्हें लागू करना कठिन हो जाता है।
    • उदाहरण: भारत की लगभग 80% महिला कामगार अनौपचारिक क्षेत्रक में कार्यरत हैं।
  • प्रक्रियात्मक अस्पष्टता: जांच कैसे की जाए, इस बारे में कानून में अस्पष्टता तथा उत्पीड़न का सामना करने पर किसके पास जाना है, इसके बारे में महिला कर्मचारियों में पर्याप्त जागरूकता का अभाव जैसी समस्याएं हैं ये समस्याएं इसके प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • कम रिपोर्टिंग: कलंक, प्रतिशोध के डर और करियर पर नकारात्मक प्रभाव की आशंका के कारण पीड़िता प्रायः शिकायत दर्ज नहीं कराती हैं। अधिकारों और प्रक्रिया के प्रति जागरूकता की कमी भी रिपोर्टिंग को कम करती है।
  • साक्ष्य संबंधी कठिनाइयां: यौन उत्पीड़न प्रायः निजी तौर पर होता है, जिससे इसे साबित करना मुश्किल हो जाता है; साक्ष्य को संभालने में स्पष्टता और मानकीकरण की कमी पीड़ित की सुरक्षा और आरोपी के प्रति निष्पक्षता दोनों को कमजोर कर सकती है।
  • ग्रे एरिया (Grey areas): ICC को उत्पीड़न के मामलों में 'ग्रे एरिया' को पहचानने में कठिनाई होती है क्योंकि अनुचित व्यवहार और गलतफहमी के बीच का अंतर करना बहुत मुश्किल होता है। इसके अतिरिक्त, सांस्कृतिक अंतर, व्यक्तिगत धारणाएं और अलग-अलग व्याख्याएं भी प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना देती हैं। (नोट: ग्रे एरिया का अर्थ उन स्थितियों से है जहाँ मामला पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता और सही-गलत की लाइन बहुत महीन हो जाती है।)

महिलाओं के विरुद्ध अपराध रोकने के लिए उठाए गए अन्य कदम

  • यौन अपराधियों पर राष्ट्रीय डेटाबेस (NDSO): कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा देश भर में यौन अपराधियों की जांच और ट्रैकिंग की सुविधा के लिए गृह मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया।
  • वन स्टॉप सेंटर (OSC) योजना: हिंसा से प्रभावित महिलाओं को चिकित्सा सहायता, पुलिस सहायता, विधिक परामर्श, अस्थायी आश्रय आदि जैसी एकीकृत सेवाएं प्रदान करना।
  • यौन अपराधों के लिए जाँच ट्रैकिंग प्रणाली: आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2018 के अनुसार, यौन हमले के मामलों में समयबद्ध जांच की निगरानी और ट्रैकिंग करना
  • स्वाधार गृह योजना: उन महिलाओं के पुनर्वास के लिए संस्थागत सहायता प्रदान करती है जिन्होंने अपराध, हिंसा, मानसिक तनाव का सामना किया है ताकि वे गरिमा के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकें।
  • उज्ज्वला योजना: सामाजिक लामबंदी के माध्यम से वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए महिलाओं और बच्चों की तस्करी को रोकना।

 

आगे की राह

  • जाँच प्रक्रियाओं का मानकीकरण: ICC सदस्यों को जाँच प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों, संवेदनशील गवाहियों के प्रबंधन तथा तर्कपूर्ण रिपोर्ट लेखन पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जिससे जांच विधिक रूप से सुदृढ़ और मानवीय बन सके।
  • ICC की स्वतंत्रता: जब आरोपों में वरिष्ठ प्रबंधन (CEO स्तर) शामिल हो, तब रक्षोपायों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। इन रक्षोपायों में बाह्य सदस्य के लिए सशक्त भूमिका और निष्पक्षता व ICC निर्णयों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए संगठनात्मक दबाव को कम करने वाले तंत्र शामिल हैं।
  • पीड़िता सुरक्षा: गोपनीयता भंग होने से रोकने हेतु कठोर आंतरिक प्रोटोकॉल बनाए जाने चाहिए, उल्लंघन पर दंड का प्रावधान होना चाहिए तथा पीड़िता को जाँच के दौरान सुरक्षित कार्य परिवेश (कोई प्रतिशोध नहीं) सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जिससे रिपोर्टिंग और निष्पक्षता दोनों में वृद्धि हो सके।
  • संवेदीकरण कार्यक्रम: अचेतन पूर्वाग्रहों को दूर करने और संगठन के भीतर सम्मान व समानुभूति की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि विश्वास और सुरक्षित कार्य परिवेश का निर्माण हो सके।
  • साक्ष्य प्रबंधन प्रोटोकॉल को सुदृढ़ करना: ICCs को साक्ष्य एकत्र करने और उनका आकलन करने के लिए सुदृढ़ प्रक्रियाओं को अपनाना चाहिए। साक्ष्यों में सत्यापित दस्तावेजी साक्ष्य (ईमेल, टेक्स्ट, रिकॉर्ड) और सावधानीपूर्वक क्रॉस-चेक किए गए गवाहों के बयान शामिल हैं।

निष्कर्ष

पॉश (PoSH) अधिनियम के दायरे का हालिया न्यायिक विस्तार कार्यस्थल की बदलती और आपस में जुड़े जगत में जवाबदेही की खामियों को दूर करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। आगे चलकर, सतत संस्थागत प्रतिबद्धता, निरंतर संवेदीकरण और प्रक्रियात्मक कठोरता, पॉश (PoSH) को एक प्रतिक्रियाशील निवारण तंत्र से सभी महिलाओं के लिए सुरक्षित, समावेशी और न्यायसंगत कार्यस्थलों की सक्रिय गारंटी में बदलने के लिए आवश्यक हैं।

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वन स्टॉप सेंटर (OSC) योजना

हिंसा से प्रभावित महिलाओं को चिकित्सा, पुलिस, विधिक परामर्श और अस्थायी आश्रय जैसी एकीकृत सेवाएं प्रदान करने वाली एक सरकारी योजना।

यौन अपराधियों पर राष्ट्रीय डेटाबेस (NDSO)

गृह मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक पहल, जिसका उद्देश्य देश भर में यौन अपराधियों की जांच और ट्रैकिंग की सुविधा प्रदान करना है।

अनौपचारिक क्षेत्रक

अनौपचारिक क्षेत्रक में वे सभी आर्थिक गतिविधियाँ शामिल हैं जो सरकार द्वारा विनियमित या कर योग्य नहीं हैं। इसमें अक्सर कम वेतन, खराब कामकाजी परिस्थितियाँ और सामाजिक सुरक्षा का अभाव होता है, जैसे कि स्वरोजगार, घरेलू काम और बिना अनुबंध के दैनिक मजदूरी।

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