देशभर की अदालतों में 5,600 से अधिक पद रिक्त हैं | Current Affairs | Vision IAS
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केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों में न्यायपालिका में वर्तमान में 5,600 से अधिक रिक्तियां हैं।

  • वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों के 2 पद, हाई कोर्ट्स (HC) में न्यायाधीशों के 364 पद और जिला न्यायालयों में न्यायाधीशों के 5245 पद रिक्त हैं। 

रिक्तियों के लिए जिम्मेदार कारक 

  • समय-समय पर पदों का रिक्त होना: इसकी मुख्य वजहें हैं- सेवानिवृत्ति, त्यागपत्र, निधन, न्यायाधीशों की पदोन्नति, न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या में वृद्धि होना आदि। 
  • अधिक समय लेने वाली कॉलेजियम प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रक्रिया से होती है। इस प्रक्रिया के तहत कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच निरंतर सहयोग आवश्यक है। साथ ही, अलग-अलग सरकारी एजेंसियों से परामर्श एवं मंजूरी की आवश्यकता भी पड़ती है। 
    • हाई कोर्ट्स में नियमित न्यायाधीशों तथा अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 व 224 के तहत की जाती है। 
  • अन्य कारक: 
    • निचली अदालतों में न्यायिक पदों पर नियुक्ति की परीक्षा प्रक्रिया पूरी होने में काफी समय लगता है। 
    • न्यायाधीशों को कम वेतन मिलता है और उन पर कार्य बोझ भी अधिक होता है। इस वजह से प्रतिभाशाली वकील न्यायाधीश बनने के इच्छुक नहीं होते हैं। 

अदालतों में पद रिक्त रहने के प्रभाव

  • न्याय में देरी होना: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में क्रमशः 19,500 तथा 27 लाख से अधिक मामले लंबित हैं।
    • लंबित मामलों के अधिक होने के अन्य कारण हैं- न्यायिक अवसंरचना में कमी, सुनवाई का बार-बार टलना, मामलों के निपटान के लिए समय-सीमा तय नहीं होना आदि।
  • देश की आबादी की तुलना में न्यायाधीशों का अनुपात कम होना: इस वजह से न्यायिक अधिकारियों पर कार्य का बहुत अधिक तनाव रहता है। ऐसे में उनसे गलतियां होने की आशंका बनी रहती है।
    • 2002 में, अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ मामले में एक निर्देश पारित किया गया था। इसके अनुसार 2007 तक, ट्रायल कोर्ट में प्रत्येक 10 लाख जनसंख्या पर 50 न्यायाधीश होने चाहिए।
      • हालांकि, 2024 में भी प्रत्येक 10 लाख जनसंख्या पर 25 न्यायाधीश का अनुपात भी प्राप्त नहीं किया जा सका है।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) फ्रेमवर्क पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। इससे न्यायिक नियुक्तियों में संतुलन सुनिश्चित होगा। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही, दोनों सुनिश्चित हो सकती है।
  • अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) का गठन: सिविल सेवकों की भर्ती के समान जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए केंद्रीकृत भर्ती प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। 
    • इससे न्यायपालिका में अधिक प्रतिभाओं को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति में एकरूपता भी सुनिश्चित होगी।
      • संविधान का अनुच्छेद 312 अखिल भारतीय सेवाओं के गठन से संबंधित है।
  • अन्य उपाय: 
    • न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार किया जाना चाहिए; 
    • न्यायालयों में न्यायाधीशों की कुल संख्या की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए, आदि।
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