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भारत में महिला श्रम बल भागीदारी (Female Labour Force Participation in India)

31 Mar 2026
1 min

In Summary

  • भारत की जीडीपी वृद्धि की गति के लिए 2050 तक महिला श्रम बल भागीदारी दर (एफएलएफपीआर) को लगभग 55% तक बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
  • कम एफएलएफपीआर का कारण सामाजिक मानदंड, माता-पिता बनना, सीमित एसटीईएम पहुंच, गतिशीलता संबंधी बाधाएं और अनम्य कार्य व्यवस्थाएं हैं।
  • इन उपायों में श्रम संहिता के प्रावधान, कार्यस्थल सुरक्षा पहल, एसएचई-मार्ट, रोजगार संबंधी प्रतिबंधों को हटाना और लचीले कार्य को बढ़ावा देना शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, 2050 तक महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) को लगभग 55% तक बढ़ाना, उच्च वार्षिक GDP वृद्धि बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

विश्व आर्थिक मंच (WEF) की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत 2024 में 129वें स्थान से गिरकर 2025 में 131वें स्थान पर आ गया है और आर्थिक भागीदारी एवं अवसर उप-सूचकांक में निचले 5 देशों में शामिल है। इससे भारत में FLFPR बढ़ाने की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

महिलाओं की कम रोजगार भागीदारी के कारण

  • क्लॉडिया गोल्डिन का U-आकार वक्र (नोबेल प्राइज 2023): यह दर्शाता है कि महिलाओं की श्रम भागीदारी सामाजिक मानदंडों, कानूनी कमियों, मातृत्व प्रभाव और तकनीकी नवाचारों से प्रभावित होती है।
    • इसके अनुसार, प्रारंभिक औद्योगीकरण के दौरान FLFPR घटती है (महिलाएं कृषि छोड़ती हैं, लेकिन उनके पास उद्योग के लिए आवश्यक कौशल या सामाजिक स्वीकृति नहीं होती), और फिर शिक्षा स्तर बढ़ने तथा सेवा क्षेत्र के विस्तार के साथ पुनः बढ़ती है।
  • STEM क्षेत्रों में सीमित भागीदारी: भारत में महिलाएं STEM स्नातकों का 43% हैं, लेकिन केवल लगभग 27% ही STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित) कार्यबल में भाग लेती हैं।
  • ग्रामीण रोजगार में वृद्धि: ग्रामीण क्षेत्रों में FLFPR में वृद्धि को महिलाओं की कुल श्रम भागीदारी में वृद्धि का मुख्य कारण माना जाता है।
  • आवागमन से जुड़ी बाधाएं : विश्व बैंक के अध्ययन (2021) के अनुसार, 31% महिलाओं ने काम पर जाने में आवागमन को बाधा बताया।
    • 13% और 19% महिलाओं ने क्रमशः बाल देखभाल की जिम्मेदारियों और घरेलू कर्तव्यों को काम पर आने-जाने में बाधा के रूप में बताया।
  • लचीली कार्य व्यवस्था का अभाव: महिलाओं की देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों के कारण उन्हें लचीले कार्य विकल्पों की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण, 15-59 वर्ष की आयु वर्ग में 41% महिलाएं अपने परिवार के सदस्यों की देखभाल में संलग्न हैं (पुरुषों में यह आंकड़ा 21.4% है)।
  • अवैतनिक कार्य: महिलाएं प्रतिदिन औसतन 363 मिनट अवैतनिक कार्य करती हैं, जबकि पुरुष 123 मिनट करते हैं।
  • गिग अर्थव्यवस्था में कम भागीदारी: अनुमानों के अनुसार, महिलाएं वर्तमान में प्लेटफॉर्म आधारित अर्थव्यवस्था में केवल 28% कार्यबल का हिस्सा हैं। उन्हें निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है: 
    • सुरक्षा जोखिम
    • मातृत्व अवकाश और कल्याण सुविधाओं की कमी
    • लैंगिक विभाजन (Gender segmentation)
  • अन्य समस्याएं: वहनीय आवास की कमी; कार्यस्थल पर भेदभाव; यौन उत्पीड़न; पारिवारिक सहयोग का अभाव।

महिलाओं के रोजगार को बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम

  • श्रम संहिताओं के अंतर्गत प्रावधान:
    • शिकायत निवारण समिति में महिलाओं का आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
    • 26 सप्ताह का सवेतन मातृत्व अवकाश, साथ ही दत्तक और कमीशनिंग माताओं के लिए 12 सप्ताह का अवकाश। 
    • वेतन और रोजगार की शर्तों में लैंगिक भेदभाव पर रोक।
    • छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए क्रेच सुविधाओं को बढ़ावा देना।
    • खतरनाक कार्यों में महिलाओं को नियोजित करने से पहले पर्याप्त सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करना।
  • कार्यस्थल पर सुरक्षा: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की "शी-बॉक्स" पहल महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के प्रावधानों को लागू करती है।
  • शी-मार्ट पहल : केंद्रीय बजट 2026-27 में प्रारंभ की गई यह पहल स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पादों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराती है।
  • महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों का विस्तार: 
    • 17 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा 'खतरनाक' उद्योगों में महिलाओं के रोजगार पर लगी पाबंदियों को हटाना।
    • लगभग 22 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में कारखानों में महिलाओं के लिए रात्रि कार्य की अनुमति।
    •  33 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में भी रात्रि कार्य की अनुमति।

आगे की राह: महिला श्रम भागीदारी बढ़ाने के उपाय

  • सुरक्षा अवसंरचना और सस्ती परिवहन व्यवस्था का विस्तार: 
    • व्यस्त क्षेत्रों में कम भीड़ वाले समय में महिला पुलिस की उपस्थिति बढ़ाना। जैसे: कोच्चि की महिला पुलिस कंट्रोल रूम वैन और हैदराबाद की शी टीम।
    • सुरक्षित प्रकाश और क्रॉसिंग के साथ महिलाओं के अनुकूल पैदल और साइकिल मार्ग विकसित करना। जैसे: चेन्नई का समावेशी सड़क डिजाइन।
  • महिला-केंद्रित औद्योगिक क्लस्टर और विनिर्माण: महिलाओं के लिए अनुकूल कार्य और आवागमन वातावरण तैयार करना। जैसे: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की "सखी निवास" योजना।
  • वहनीय आवास: जैसे, तमिलनाडु की कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास निगम ('थोझी छात्रावास')।
  • अवैतनिक देखभाल कार्य का बोझ कम करना
    • कार्य में पुनः प्रवेश की बाधाओं को कम करना: जैसे, कार्यबल में पुनः प्रवेश करने वाली महिलाओं के लिए 'बैक टू वर्क' और 'रिटर्नशिप प्रोग्राम' जैसी पहल।
    • लचीले कार्य, हाइब्रिड मॉडल और लिंग-संवेदनशील मानकों को बढ़ावा देना : जैसे, नई श्रम संहिताएं महिलाओं को मातृत्व लाभ के बाद घर से काम करने की अनुमति देती हैं।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी: जैसे, तेलंगाना का वी-हब महिलाओं को स्टार्टअप और निवेशकों से जोड़ता है।
  • अन्य उपाय: 
    • STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना; 
    • आंगनवाड़ी केंद्रों का विस्तार;
    • सामुदायिक क्रेच की व्यवस्था; 
    • नियोक्ता-समर्थित बाल देखभाल को प्रोत्साहन; 
    • प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उद्योग की मांग के अनुसार बनाना आदि।

निष्कर्ष

महिलाओं की श्रम भागीदारी भारत के दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन और SDG 5 (लैंगिक समानता और सभी महिलाओं व लड़कियों का सशक्तिकरण) को प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। महिलाओं के उच्च रोजगार स्तर से श्रम बाजार में अधिक समानता आती है, परिवारों का कल्याण मजबूत होता है और  एक अधिक समावेशी, सशक्त और उत्पादक अर्थव्यवस्था का निर्माण होता है। यह भारत को 2047 तक विकसित भारत (Viksit Bharat) के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक होगा।

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विकसित भारत (Viksit Bharat)

भारत सरकार का एक दृष्टिकोण, जिसका लक्ष्य 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है। इसमें आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार शामिल है, जिसमें महिलाओं की बढ़ी हुई श्रम भागीदारी एक महत्वपूर्ण घटक है।

SDG 5

Sustainable Development Goal 5, part of the UN's 2030 Agenda for Sustainable Development, which aims to achieve gender equality and empower all women and girls. It includes targets related to ending all forms of discrimination, violence, harmful practices, and ensuring women's full and effective participation in leadership at all levels of decision-making.

शी-मार्ट (She-Mart)

केंद्रीय बजट 2026-27 में शुरू की गई एक पहल, जिसका उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण महिलाओं द्वारा उत्पादित वस्तुओं के लिए एक बेहतर बाजार प्रदान करना है।

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