सुर्खियों में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026-27 में CCUS के विकास और परिनियोजन को समर्थन देने के लिए अगले 5 वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की गई है।
CCUS के बारे में
- IEA CCUS को उन प्रौद्योगिकियों के रूप में परिभाषित करता है जो विद्युत संयंत्रों और उद्योगों जैसे बड़े स्थिर स्रोतों से CO2 का प्रग्रहण (कैप्चर) करते हैं।

- लक्ष्य: भंडारण या उपयोग के माध्यम से एकत्रित CO2 को वायुमंडल में पुनः प्रवेश करने से रोकना।
- प्रग्रहण (कैप्चर) तकनीकें: डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC), विलायक (रासायनिक या भौतिक), अवशोषण, क्रायोजेनिक पृथक्करण आदि के माध्यम से औद्योगिक गैस प्रवाह से CO₂ को अलग करना।
- एकत्रित की गई CO2 को इसके बाद निर्जलित, संपीड़ित किया जाता है और पाइपलाइनों के माध्यम से निर्धारित स्थलों तक पहुँचाया जाता है; इसके अतिरिक्त इसे जहाज, रेल या ट्रकों द्वारा भी ले जाया जा सकता है।
- भंडारण: अप्रयुक्त CO2 को स्थायी रूप से भूगर्भीय भंडारण में रखा जाता है जिसमें EOR (उन्नत तेल पुनर्प्राप्ति), ECBMR (उन्नत कोल बेड मीथेन रिकवरी) और लवणीय जलभृत और बेसाल्ट भंडारण जैसे स्थायी भंडारण विकल्प शामिल हैं।

- भारत का लक्ष्य: नीति आयोग की 'कार्बन प्रग्रहण, उपयोग एवं भंडारण नीति रूपरेखा एवं भारत में इसके कार्यान्वयन तंत्र' शीर्षक रिपोर्ट के अनुसार 750 मिलियन टन प्रतिवर्ष (mtpa) CO₂ का प्रग्रहण, उपयोग और भंडारण है।
भारत के लिए CCUS का महत्त्व
- ऐसे क्षेत्रकों का डीकार्बोनाइजेशन जिनका शमन कठिन है: CCUS उन क्षेत्रकों के लिए एकमात्र ज्ञात प्रौद्योगिकी है, जिनका डीकार्बोनाइजेशन करना कठिन है और जिनमें CO₂ (कार्बन) उत्सर्जन बहुत अधिक होता है। उदाहरण के लिए, इस्पात, सीमेंट, तेल एवं गैस, पेट्रोकेमिकल्स एवं रसायन, उर्वरक जैसे क्षेत्रक।
- उदीयमान क्षेत्रकों को सक्षम बनाना (कोयला गैसीकरण/निम्न-कार्बन हाइड्रोजन): यह भारत के कोयले के समृद्ध भंडार के उपयोग के आधार पर ब्लू हाइड्रोजन (अर्थात, CCUS के साथ युग्मित कोयला गैसीकरण-आधारित हाइड्रोजन उत्पादन) के लागत-प्रतिस्पर्धी उत्पादन को सक्षम बना सकता है।
- ऊर्जा, सामग्री एवं खाद्य सुरक्षा: CCUS कार्बन को मूल्य-वर्धित उत्पादों में परिवर्तित करके भारत में 'सर्कुलर कार्बन इकोनॉमी' को सक्षम बना सकता है तथा आयात बिल को कम करने में सहायक हो सकता है। (इन्फोग्राफिक देखें)
- रेट्रोफिटिंग द्वारा मौजूदा उत्सर्जकों का रखरखाव: उदाहरण के लिए, भारत की लगभग दो-तिहाई कच्ची इस्पात क्षमता विगत 15 वर्षों में विकसित की गई है, जिसे CCUS अवसंरचना के साथ रेट्रोफिट करके बचाया जा सकता है।
- नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की प्राप्ति: भारत के नेट-जीरो लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 2070 तक कुल मिलाकर 11.4 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य प्रति वर्ष (GtCO2e) CO₂ को अलग करना आवश्यक होगा।
- CCUS भारत के ऊर्जा एवं औद्योगिक क्षेत्रों से होने वाले उत्सर्जन को कम कर सकता है (जो 2020 में कुल उत्सर्जन में लगभग 60% का योगदान करते थे)।
CCUS के कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियाँ
- उच्च लागत: CCUS परियोजनाओं के लिए प्रति वर्ष 750 मीट्रिक टन CO2 कैप्चर, उपयोग और भंडारण के लिए 100-150 बिलियन अमेरिकी डॉलर के प्रारंभिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होगी।
- प्रौद्योगिकीय सीमाएँ:
- CO2 उपयोग प्रौद्योगिकियाँ, कैप्चर प्रौद्योगिकियों की तुलना में अपेक्षाकृत कम विकसित हैं।
- DAC अभी प्रारंभिक चरण में है: इसकी आर्थिक स्थिति (वर्तमान अनुमानित लागत - यूएस$ 400-800/टन CO2) और संचालन का पैमाना अभी निर्धारण किया जाना बाकी है।
- रिट्रोफिटिंग में कठिनाइयाँ: पुराने संयंत्रों (कोयला/सीमेंट) में CCUS प्रणाली को लागू करना तकनीकी रूप से जटिल और लागत-प्रधान है।
- भूगर्भीय भंडारण संबंधी जोखिम: उदाहरण के लिए, यदि CO2 को अत्यधिक बलपूर्वक इंजेक्ट किया जाता है, जिससे यह चट्टान को विखंडित कर सकता है और संभावित रूप से भूकंपीय गतिविधि (सूक्ष्म-भूकंप) उत्पन्न कर सकता है।
- विनियामकीय चुनौतियां: सुरक्षा, रखरखाव और संभावित रिसाव के लिए कौन जिम्मेदार है, इसे परिभाषित करने वाले स्पष्ट विधिक ढांचे की कमी निजी निवेशकों के लिए भारी वित्तीय जोखिम उत्पन्न करती है।
- भंडारण संबंधी सीमित आंकड़े: भारत में CO2 के भंडारण के लिए उपलब्ध पोर स्पेस संबंधी भूवैज्ञानिक आंकड़े सीमित हैं, विशेष रूप से लवणीय जलभृतों और बेसाल्टिक भंडारण के संदर्भ में।
भारत में CCUS के कार्यान्वयन के लिए आगे की राह
- निजी क्षेत्रक की भागीदारी बढ़ाने के लिए CCUS परियोजनाओं को प्रोत्साहन देना और उनके जोखिम को कम करना:
- सार्वजनिक/सरकारी वित्तपोषण: 'स्वच्छ ऊर्जा उपकर', कम लागत वाले संप्रभु या अंतर्राष्ट्रीय हरित कोष, कार्बन बांड या जलवायु कोष जैसे वित्तपोषण तंत्रों के माध्यम से।
- कम-कार्बन या कार्बन-न्यून उत्पादों को समर्थन: सरकारी निविदाओं और उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं में तरजीही खरीद के माध्यम से।
- लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप: कार्बन कैप्चर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (CCFC) जैसी वित्तीय संरचना, कार्बन क्रेडिट, कैप्चर संयंत्रों के लिए पूंजी और परिचालन सब्सिडी, CCUS परियोजनाओं के लिए कर छूट आदि।
- नई CO₂ उपयोग प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा:आईआईटी बॉम्बे में स्थित नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन जैसे उत्कृष्टता केंद्रों के माध्यम से नवाचार-आधारित पारितंत्र को बढ़ावा देना और विकसित करना।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: उदाहरण के लिए, मिशन इनोवेशन के माध्यम से ज्ञान साझा करना, जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन एक प्रमुख मिशन है।
- राष्ट्रीय CCS विनियम एवं विधिक ढांचे का मसौदा तैयार करना: इसमें कार्बन डाइऑक्साइड के स्वामित्व, परिवहन और इंजेक्शन के बाद की जिम्मेदारी और कार्बन लेखांकन पर ध्यान केंद्रित करते हुए संपूर्ण CCUS मूल्य श्रृंखला को शामिल किया जाएगा।
- भंडारण स्थलों का मानचित्रण: सरकार प्राथमिकता वाले बेसिनों में CO2 स्रोत-सिंक गलियारों का मानचित्रण कर सकती है और भूगर्भीय भंडारण क्षमता का निर्धारण कर सकती है।
- हब और क्लस्टर मॉडल: केजी बेसिन और राजस्थान में हब-क्लस्टर मॉडल CCUS की व्यापक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकते हैं।
- भूगर्भीय डेटा विश्लेषण के लिए मशीन लर्निंग: उदाहरण के लिए, आइसलैंड में कार्बफिक्स परियोजना CO₂ इंजेक्शन के प्रभावों की भविष्यवाणी करने और भूगर्भीय डेटा के आधार पर स्थल चयन को अनुकूलित करने के लिए मशीन लर्निंग मॉडल का उपयोग करती है।
निष्कर्ष
भारत, चीन और अमेरिका के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक देश है। CCUS उन क्षेत्रों में, कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए एक प्रमुख प्रौद्योगिकी है और यह भारत की राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम (NDC) प्रतिबद्धताओं का समर्थन करती है, जैसे कि 2050 तक CO₂ उत्सर्जन को 50% तक कम करना। हालांकि, इसके प्रभावी कार्यान्वयन को संभव बनाने के लिए उच्च लागत, तकनीकी कमियों और विनियामक मुद्दों को सशक्त नीतिगत समर्थन, नवाचार और निजी भागीदारी के माध्यम से हल करना आवश्यक है।