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भारत में दहेज (Dowry in India)

31 Mar 2026
1 min

In Summary

  • सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के बेहतर प्रवर्तन के लिए दहेज निषेध अधिकारियों (डीपीओ) की नियुक्ति, प्रशिक्षण और प्रचार-प्रसार का निर्देश दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या (आईपीसी की धारा 304बी/धारा 80 बीएनएस) और क्रूरता (आईपीसी की धारा 498ए/धारा 85 बीएनएस) के मामलों के शीघ्र निपटान के साथ-साथ पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण पर जोर दिया।
  • अदालत ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) मामले में धारा 498ए के मामलों में स्वतः गिरफ्तारी के खिलाफ दिशानिर्देशों को भी दोहराया और जमीनी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों और सामाजिक मानदंडों में बदलाव का सुझाव दिया।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराई से निपटने और दहेज प्रतिषेध अधिनियम (DPA), 1961 के माध्यम से प्रतिषेध को लागू करने के लिए स्टेट ऑफ यू.पी. बनाम अजमल बेग केस, 2025 में कई निर्देश जारी किए हैं।

भारत में दहेज प्रथा के बारे में

  • दहेज प्रतिषेध अधिनियम (DPA), 1961 के अनुसार, दहेज का अर्थ है "कोई भी संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति जो विवाह के एक पक्ष द्वारा विवाह के दूसरे पक्ष को, विवाह के समय, उससे पहले या उसके बाद किसी भी समय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी गई हो या देने के लिए सहमति व्यक्त की गई हो।"

प्रमुख सांख्यिकी (NCRB, 2023)

  • मामलों में वृद्धि: 2023 में दहेज से संबंधित अपराधों में 14% की वृद्धि देखी गई।
  • कुल मामले: देश भर में 15,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए।
  • मृत्यु दर: वर्ष 2023 के दौरान दहेज की वजह से 6,100 से अधिक मौतें दर्ज की गईं।
  • राज्यवार डेटा: उत्तर प्रदेश में DPA के तहत सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए, इसके बाद बिहार और कर्नाटक का स्थान रहा।

भारत में बढ़ते दहेज और संबंधित अपराधों के कारण

  • सामाजिक प्रतिष्ठा: दहेज तेजी से सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने का एक साधन बन गया है, जैसे कि "भव्य शादियाँ"विलासिता की वस्तुएं आदि। बढ़ती महत्वाकांक्षी जीवनशैली के साथ, विवाह दिखावटी उपभोग का एक मंच बन गया है, जो दहेज की माँगों को ऊपर की ओर धकेलता है।
  • वित्तीय सुरक्षा: दहेज का प्रावधान वधू के लिए वित्तीय सुरक्षा का एक पैमाना सुनिश्चित कर सकता है, जो आर्थिक कठिनाई के समय में एक सुरक्षा जाल के रूप में कार्य करता है।
  • कमजोर निवारण: दहेज के मामलों को निपटाने में न्यायिक प्रणाली में देरी, दहेज विरोधी कानूनों के कमजोर कार्यान्वयन में योगदान देती है। 2015 में, केवल 34.7% आरोपियों को दोषी ठहराया गया था, जबकि बाकी मामले लंबित रहे।
    • दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के बावजूद, भ्रष्टाचार, सामाजिक दबाव और अपर्याप्त पीड़ित सहायता के कारण दहेज उत्पीड़न और मृत्यु की कई घटनाएं रिपोर्ट नहीं हो पाती हैं।
  • लेन-देन: कई क्षेत्रों में, वर की शिक्षा/नौकरी (IAS/इंजीनियर/निजी क्षेत्र का पैकेज) को एक संपत्ति की तरह माना जाता है। इससे विवाह एक "लेन-देन" में बदल जाता है, जो मांग-पक्ष वाले दहेज को प्रोत्साहित करता है।
  • सामाजिक दबाव: अलगाव/ तलाक से जुड़े सामाजिक कलंक के भय, बच्चों की चिंता और पारिवारिक सम्मान बनाए रखने के दबाव आदि के कारण परिवार बार-बार दहेज की किस्तें देना जारी रख सकते हैं। यह विवाह के बाद भी निरंतर दहेज वसूली को सक्षम बनाता है।
  • जागरूकता और शिक्षा का अभाव: कई लोग कानूनी निहितार्थों और उन्हें उपलब्ध सुरक्षा के बारे में जागरूक नहीं हैं।

दहेज से संबंधित न्यायिक निर्देश 

  • राजबीर बनाम हरियाणा राज्य (2010): सुप्रीम कोर्ट ने सभी ट्रायल कोर्ट्स को अनिवार्य निर्देश जारी किया कि वे प्रत्येक दहेज मृत्यु मामले में IPC की धारा 302 (अब BNS की धारा 103) शामिल करें, जब तक कि साक्ष्य स्पष्ट रूप से इसके विपरीत संकेत न दें।
  • सतवीर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2001): सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम (DPA) के तहत दहेज की परिभाषा की व्याख्या की और यह माना कि "विवाह के संबंध में" मांगी गई या दी गई कोई भी संपत्ति दहेज के दायरे में आती है, चाहे वह कभी भी मांगी गई हो।

 

आगे की राह

  • स्टेट ऑफ यू.पी. बनाम अजमल बेग, 2025 केस में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
    • दहेज निषेध अधिकारियों (DPOs) की नियुक्ति: इन अधिकारियों को पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और उनके संपर्क विवरणों का व्यापक रूप से प्रचार किया जाना चाहिए ताकि नागरिकों को पता हो कि किससे संपर्क करना है।
      • DPOs भारत के दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त सरकारी अधिकारी होते हैं।
    • लंबित मामलों का त्वरित निपटान: उच्च न्यायालयों से अनुरोध किया गया है कि वे निपटान के लिए आईपीसी की धारा 304B (दहेज मृत्यु) और धारा 498A (दहेज उत्पीड़न सहित क्रूरता) से संबंधित मामलों की संख्या का आकलन करें।
      • अब, BNS, 2023 की धारा 80 और 85 क्रमशः दहेज मृत्यु और क्रूरता से संबंधित हैं।
    • अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण: पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को समय-समय पर प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए ताकि वास्तविक मामलों के प्रति संवेदनशीलता सुनिश्चित हो सके और साथ ही उन मामलों की पहचान की जा सके जो तुच्छ या निराधार हो सकते हैं।
    • अन्य: जिला प्रशासन द्वारा जमीनी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाना, इस कुप्रथा के बारे में जागरूकता के लिए शिक्षा पाठ्यक्रम में बदलाव आदि।
  • अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, 2014 केस में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश।
    • सभी राज्य सरकारें अपने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दें कि IPC की धारा 498A के तहत मामला दर्ज होने पर स्वचालित रूप से गिरफ्तारी न करें।
    • आरोपी को आगे की हिरासत के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश करते समय, पुलिस अधिकारी उन कारणों और सामग्रियों को प्रस्तुत करेगा जिनके कारण गिरफ्तारी आवश्यक हुई।
    • अभियुक्त की हिरासत को अधिकृत करते समय, मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट का अवलोकन करेगा और अपनी संतुष्टि के बाद ही मजिस्ट्रेट हिरासत को अधिकृत करेगा।
    • संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा उपर्युक्त कारणों को दर्ज किए बिना हिरासत को अधिकृत करना, उपयुक्त उच्च न्यायालय द्वारा विभागीय कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होगा।
  • सामाजिक मानदंड: दहेज को सामाजिक स्वीकृति से बल मिलता है। इसलिए, ग्राम समितियाँ, आवासीय कल्याण संघ (RWAs), धार्मिक नेता और युवा समूह दहेज की मांग के खिलाफ सामाजिक प्रतिबंध लगा सकते हैं और दहेज मुक्त विवाहों को पुरस्कृत (प्रमाणन, सार्वजनिक मान्यता) कर सकते हैं।

निष्कर्ष

दहेज केवल एक कानूनी समस्या नहीं है, बल्कि पितृसत्ता और विवाह बाजारों में निहित एक सामाजिक-आर्थिक संस्था है। इसलिए, समाधान के लिए "4P दृष्टिकोण" की आवश्यकता है, अर्थात: पनिशमेंट (सजा/निवारण), प्रोटेक्शन (पीड़ित सहायता), प्रिवेंशन (सामाजिक मानदंड में बदलाव), और महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रमोशन (बढ़ावा देना)।

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सामाजिक मानदंड

यह किसी समाज में स्वीकृत व्यवहारों और विश्वासों का समूह है। दहेज प्रथा को सामाजिक स्वीकृति से बल मिलता है, इसलिए सामाजिक मानदंडों को बदलकर इसे प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है।

4P दृष्टिकोण

यह दहेज जैसी सामाजिक बुराई से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण है, जिसमें शामिल हैं: पनिशमेंट (सजा/निवारण), प्रोटेक्शन (पीड़ित सहायता), प्रिवेंशन (सामाजिक मानदंड में बदलाव), और प्रमोशन (महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देना)।

IPC की धारा 304B

यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा है जो 'दहेज मृत्यु' को परिभाषित करती है। यदि किसी महिला की मृत्यु विवाह के सात साल के भीतर जलाए जाने या शारीरिक चोट से होती है, और यह साबित होता है कि उसकी मृत्यु से ठीक पहले उसे दहेज के लिए परेशान किया गया था, तो इसे दहेज मृत्यु माना जाता है।

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