सुर्ख़ियों में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026-27 में शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के लिए बजटीय प्रावधानों को प्राथमिकता दी गई है। इससे शहरों के दीर्घकालिक विकास की दिशा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।

बजट घोषणाओं के मुख्य बिंदु
- शहरी आर्थिक क्षेत्रों (City Economic Regions: CERs) का विकास: शहरी समूहों की आर्थिक क्षमता का लाभ उठाने के लिए, सरकार उनके 'संवृद्धि के कारकों ' (ग्रोथ ड्राइवर्स) के आधार पर शहरी आर्थिक क्षेत्रों को चिन्हित करेगी, जिसके लिए प्रति CER पांच वर्षों में 5,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया जाएगा।
- CERs की शुरुआत शहरों को केवल प्रशासनिक इकाइयों के रूप में प्रबंधित करने के बजाय, उन्हें एकीकृत आर्थिक प्रणालियों के रूप में नियोजित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
- टियर II, टियर III शहरों और 'मंदिरों की नगरी' पर ध्यान: बजट में 5 लाख (0.5 मिलियन) से अधिक आबादी वाले टियर II और III शहरों को उभरते विकास केंद्रों के रूप में प्राथमिकता देते हुए वहाँ अवसंरचना विकास पर जोर दिया गया है। साथ ही, मंदिरों की नगरी के लिए आधुनिक अवसंरचना और अवसंरचना सुविधाओं का प्रावधान किया गया है।

- नगर निगम बॉण्ड के लिए प्रोत्साहन: नगर निगम बॉण्ड को ऋण प्राप्त करने के एक प्रमुख माध्यम के रूप में बढ़ावा देने के लिए, बजट में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक के एकल निर्गम पर 100 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव किया गया है। वहीं, छोटे और मध्यम शहरों द्वारा 200 करोड़ रुपये या उससे कम राशि के बॉण्ड जारी करने में अमृत योजना सहायता प्रदान करना जारी रखेगी।
- 16वें वित्त आयोग द्वारा अनुदान: बजट में वर्ष 2026-27 के लिए राज्यों को शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों तथा आपदा प्रबंधन के अनुदान के रूप में 1.4 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
- यूनिवर्सिटी टाउनशिप का निर्माण: बजट में प्रमुख औद्योगिक और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के पास पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप बनाने का प्रस्ताव है। इन्हें जीवंत शहरी केंद्रों के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई है।
- 'चैलेंज मोड' के माध्यम से कार्यान्वयन: शहर और राज्य अपनी विकास योजनाओं और यूनिवर्सिटी टाउनशिप योजना को लागू करने के लिए इस 'चैलेंज रूट' (प्रतिस्पर्धात्मक मार्ग) के माध्यम से वित्त पोषण प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे। यह सुनिश्चित करेगा कि वित्तीय सहायता प्रत्यक्ष तौर पर संरचनात्मक सुधारों और परिणामों से जुड़ी हो।
- अर्बन चैलेंज फंड (UCF): सुधार-आधारित शहरी परियोजनाओं को सहायता प्रदान करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के कोष को मंजूरी दी गई है।
भारत में शहरीकरण
- भारत की जनगणना के अनुसार, किसी बस्ती को 'शहरी' बस्ती के रूप में वर्गीकृत करने के लिए तीन शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है:
- बस्ती की जनसंख्या 5,000 से अधिक होनी चाहिए;
- पुरुष कार्यबल का कम-से-कम 75 प्रतिशत हिस्सा गैर-कृषि कार्यों में नियोजित होना चाहिए;
- जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर होना चाहिए।
- इस परिभाषा में उन कस्बों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें प्रशासनिक रूप से 'सांविधिक कस्बों' के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- जनगणना आधारित परिभाषा के अनुसार, भारत में शहरीकरण की गति धीमी हो रही है।
- हालाँकि, अब इस बात की स्वीकार्यता बढ़ रही है कि शहरीकरण को मापने के लिए आवागमन (परिवहन), श्रम बाजार, घनत्व, निर्मित क्षेत्र और रात्रिकालीन कृत्रिम रोशनी डेटा (नाइट-टाइम लाइट डेटा) का उपयोग किया जाना चाहिए। (आर्थिक समीक्षा 25-26)
- जनग्रह फाउंडेशन की 'भारत की शहरी प्रणालियों का वार्षिक सर्वेक्षण' (Annual Survey of India's City Systems: ASICS) 2023 की रिपोर्ट बताती है कि भारत जनगणना के आंकड़ों की तुलना में कहीं अधिक शहरीकृत हो सकता है।
- यूरोपीय आयोग के 'ग्रुप ऑन अर्थ ऑब्जर्वेशंस' के ग्लोबल ह्यूमन सेटलमेंट्स लेयर (GHSL) के सैटेलाइट आंकड़ों के अनुसार, 2015 में भारत में शहरीकरण का अनुपात 63 प्रतिशत था, जो कि 2011 की जनगणना में दर्ज की गई शहरीकरण दर से लगभग दोगुना है।
भारत में शहरीकरण से जुड़ी प्रमुख समस्याएं
- शहरी विरोधाभास: आर्थिक समीक्षा 2026 के अनुसार, बड़ी आबादी होने के बावजूद भारत को उसके अनुरूप वैश्विक आर्थिक प्रभाव या बेहतर रहने की स्थिति नहीं मिल पाई है, क्योंकि अवसंरचना में निवेश विकास की गति से पीछे रह गया है।
- परिणामस्वरूप घनी आबादी के संभावित लाभ कम हो गए हैं, क्योंकि यातायात जाम बढ़ गया है, पर्यावरण पर दबाव बढ़ा है और अनौपचारिक बस्तियों/रोजगार में वृद्धि हुई है।
- नया उपनगरीय विस्तार (सन्नगर): महानगरों का विस्तार अधिकतर बाहर की ओर हो रहा है, जो प्रायः परिवहन मार्गों का अनुसरण करता है। इस प्रक्रिया में नगर की सीमाओं के बाहर की कृषि भूमि शहरी उपयोग में बदल रही है।
- उदाहरण के लिए-2011 की जनगणना के अनुसार केरल में शहरीकरण दर 47.7% है, लेकिन 'डिग्री ऑफ़ अर्बनाइजेशन' (DEGURBA) पद्धति का उपयोग करके किए गए स्थानिक विश्लेषण के अनुसार, जब नगर सीमा के बाहर के प्रकार्यात्मक शहरी क्षेत्रों को भी शामिल किया जाता है, तो यह लगभग 80.8% तक पहुँच जाती है।
- शहरी आवागमन (मोबिलिटी): प्रमुख महानगरों में यातायात जाम के कारण भारी आर्थिक नुकसान होता है। मार्गदर्शक सिद्धांत वाहनों के बजाय लोगों की आवाजाही को प्राथमिकता देने की है।
- अपशिष्ट और स्वच्छता: आर्थिक समीक्षा 2026 स्वच्छता को केवल अवसंरचना से संबद्ध चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि एक संस्थागत और व्यावहारिक चुनौती के रूप में पहचानती है।
- शहरी वार्डों में घर-घर जाकर अपशिष्ट संग्रह करने का काम 98% तक पहुँच गया है, लेकिन अपशिष्ट के पृथक्करण और निस्तारण की क्षमताएं अभी भी कम हैं।
- फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) में कमियां: प्रतिबंधात्मक विकास नियंत्रण विनियमन, विशेष रूप से कम FSI मानक, भूमि की कृत्रिम कमी उत्पन्न करते हैं। इससे जमीन की कीमतें बढ़ जाती हैं और अवसंरचना सुविधा उपलब्ध कराने की प्रति-इकाई लागत में भी वृद्धि होती है। FSI वह अनुपात है जो बताता है कि किसी भूखंड पर कितना निर्माण किया जा सकता है।
- भारतीय शहरों में अनौपचारिकता: यह तेजी से हो रहे शहरीकरण का एक संरचनात्मक दुष्परिणाम है, जो झुग्गी-बस्तियों, अनौपचारिक श्रम और अपंजीकृत उद्यमों के रूप में दिखाई देता है। यह स्थिति औपचारिक आवास, सेवाओं और रोजगार प्रणालियों में मौजूद कमियों के कारण उत्पन्न होती है।
- रेहड़ी-पटरी वाले (स्ट्रीट वेंडर्स) और अनौपचारिक श्रम: इन्हें अक्सर बाधाओं के रूप में देखा जाता है जिन्हें हटाया जाना आवश्यक माना जाता है। अनौपचारिक बस्तियों को उजाड़ने से उनमें अन्तर्निहित 'पूंजी' नष्ट हो जाती है, जैसे कि अवस्थिति या मुख्य केंद्रों से निकटता संबंधी लाभ और सामाजिक संपर्क।
- खंडित शासन प्रणाली: शहरी स्थानीय निकायों (ULBs), विकास प्राधिकरणों और राज्य के विभिन्न विभागों के बीच कार्यों का दोहराव और सामंजस्य की कमी देखी जाती है।
- महापौर के पास कम अधिकार होना: भारतीय शहरों में एक ऐसे शक्तिशाली "मुख्य कार्यकारी" का अभाव है जो दीर्घकालिक दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से लागू कर सके।
- वित्तीय संसाधन के लिए उच्च निर्भरता: शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) पर्याप्त 'स्वयं के स्रोत से राजस्व' सृजित करने के बजाय राज्य की संचित निधि से मिलने वाले सहायता अनुदान और राज्य द्वारा सौंपे गए कर अधिकारों पर अत्यधिक निर्भर हैं।
- भारतीय शहर अपने 'स्वयं के स्रोत से राजस्व' के रूप में जीडीपी का 0.6% से भी कम उत्पन्न करते हैं (जबकि OECD देशों में यह अनुपात 2-4% है)।
- पेशेवर लोगों की कमी: योजना-निर्माण, डेटा एनालिटिक्स और आधुनिक लेखांकन के क्षेत्र में कुशल कार्यबल की भारी कमी है।
भारत में शहरीकरण में सुधार के लिए उठाए जाने वाले कदम
- अवसंरचना आधारित विकास: शहरी अवसंरचना में निवेश प्रतिक्रियात्मक उपायों (समस्या उत्पन्न होने के बाद) की जगह पहले से योजना बनाने में करनी चाहिए।
- शहरी अवसंरचना विकास निधि (Urban Infrastructure Development Fund - UIDF): यह निधि टियर-II और टियर-III शहरों में अवसंरचना विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई है।
- आवागमन (मोबिलिटी) की सुविधाओं में सुधार: 'नमो भारत' RRTS (रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) का विस्तार करना चाहिए ताकि क्षेत्रीय स्तर पर श्रमिकों का आवागमन आसान हो और रोजगार के अवसर बढ़ें। बस बेड़े को डिजिटल तकनीक से जोड़ना चाहिए, और लंदन/सिंगापुर की तर्ज पर 'कंजेशन प्राइसिंग' (भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में शुल्क) लागू करना चाहिए।
- अनौपचारिकता का एकीकरण: "बेदखली" के बजाय "स्थानिक एकीकरण" की नीति अपनानी चाहिए। सड़कों का निर्माण इस तरह से किया जाए कि उनमें औपचारिक रूप से रेहड़ी-पटरी वालों के लिए जगह सुनिश्चित हो सके। इसका अर्थ है कि अनौपचारिक कामगारों को समस्या मानने के बजाय, उन्हें शहर की योजना का हिस्सा बनाया जाए।
- महानगरीय शासन: परिवहन और भूमि उपयोग के लिए एकीकृत प्राधिकरण बनाए जाएँ, जो केवल शहर की सीमा तक सीमित न हों, बल्कि पूरे आर्थिक गतिविधि वाले भौगोलिक क्षेत्रों को ध्यान में रखें।
- वास्तविक विकेंद्रीकरण: 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के अनुसार "3Fs" — वित्त (Funds), कार्य (Functions) और कर्मचारी (Functionaries) — का बिना शर्त हस्तांतरण स्थानीय निकायों को किया जाए।
- राजकोषीय स्वायत्तता: स्वयं-अपडेट होने वाली संपत्ति कर व्यवस्था अपनाने, उपभोक्ता शुल्क लगाने और पूंजी बाजार (नगर निगमबॉण्ड) तक पहुंच बढ़ाने की जरुरत है। इससे शहरों को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया जा सकेगा।
- पेशेवर कैडर तैयार करना: नगर निगम के लिए विशेष कैडर बनाने और प्रदर्शन से संबद्ध क्षमता निर्माण सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
- व्यवहार परिवर्तन (नज) वाला डिजाइन : शहरी डिजाइन को व्यवहार बदलने वाले एक उपकरण के रूप में कार्य करना चाहिए। स्पष्ट मार्किंग, संकेत और अलग-अलग लेन वाली सुस्पष्ट सड़कें भ्रम को कम करती हैं और सही कदम उठाना स्वाभाविक बना देती हैं। इसका अर्थ है कि यदि सड़क पर पैदल चलने वालों और साइकिल सवारों के लिए अलग और स्पष्ट लेन होगी, तो लोग अपने आप नियमों का पालन करेंगे।
- जब लोगों को दिखता है कि उनके पैसे से मोहल्ले की सड़कें, नालियां प्रकाश व्यवस्था ठीक हो रही हैं, तो वे टैक्स देने में संकोच नहीं करते।
- प्रकृति-आधारित समाधान: अवसंरचना को चक्रीय बनाया जाए, जैसे वर्षा जल निकासी को आर्द्रभूमि से जोड़ना और पेड़ों की संख्या बढ़ाकर 'शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव' को कम करना।
- भवन-निर्माण नियमों में वर्षा जल संचयन और ग्रे-वॉटर (अपशिष्ट जल) के पुनः उपयोग को अनिवार्य किया जाए। IIM कोझिकोड कैंपस या कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा में अपनाई गई व्यवस्थाओं से सीख लेनी चाहिए।
निष्कर्ष
भारत में शहरीकरण के लिए आवश्यक संस्थागत ढांचा अभी मजबूत नहीं है। इसलिए केवल भौतिक निवेश (जैसे सड़क, पानी, बिजली में) ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक मजबूत "नागरिक अनुबंध" भी जरूरी है, जिसमें सरकार और नागरिक, दोनों की जिम्मेदारी तय हो। साझा समृद्धि के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इस तरह शहरों को इस तरह सशक्त बनाया जाना चाहिए कि वे आर्थिक विकास के केंद्र बनें, साथ ही सभी के लिए समावेशी और रहने योग्य भी हों।