भारत में नदी प्रदूषण (River Pollution in India) | Current Affairs | Vision IAS

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भारत में नदी प्रदूषण (River Pollution in India)

31 Mar 2026
1 min

In Summary

  • सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषित नदियों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही बंद कर दी और निगरानी का कार्य राष्ट्रीय महाधिवक्ता को सौंप दिया; अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार की पुष्टि की।
  • भारत की 43% नदियाँ प्रदूषित हैं, जिसके कारण कानूनी क्रियान्वयन में समस्याएँ, खंडित शासन व्यवस्था और अपर्याप्त सीवेज अवसंरचना है।
  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को मजबूत करना, उपचार सुविधाओं का उन्नयन करना और जनभागीदारी को प्रोत्साहित करना नदी प्रदूषण से निपटने की कुंजी है।

In Summary

सुर्खियों में क्यों?

उच्चतम न्यायालय (SC) ने प्रदूषित नदियों पर अपनी 2021 की स्वतः संज्ञान कार्यवाही बंद कर दी है और प्राथमिक निगरानी की जिम्मेदारी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) को सौंप दी है।

न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ

  • NGT जैसे विशेष न्यायाधिकरण इन स्थितियों की निरंतर निगरानी करने के लिए बेहतर रूप से सक्षम हैं।
  • न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि स्वच्छ वातावरण और मानव गरिमा के साथ स्वच्छ परिस्थितियों में जीने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है।
    • एमसी मेहता बनाम भारत संघ, 1987 वाद में उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मूल अधिकार का हिस्सा माना है।
    • इस वाद के तहत, उच्चतम न्यायालय ने उद्योगों को तब तक के लिए  गंगा नदी में प्रदूषणकारी अपशिष्ट छोड़ने से रोक दिया जब तक कि वे उपचार संयंत्र स्थापित नहीं कर लेते।

भारत में नदी प्रदूषण की स्थिति

  • 'जल गुणवत्ता बहाली हेतु प्रदूषित नदी खंड- 2025': केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा – 
    • 43% नदियाँ प्रदूषित: 623 नदियों के जल गुणवत्ता आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर 271 नदियों में 296 प्रदूषित खण्ड की पहचान की गई।
    • केवल 62% स्थानों ने जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग BOD मानदंडों का अनुपालन किया: 2022 और 2023 के दौरान निगरानी किए गए 2116 स्थानों में से, 1312 स्थानों ने BOD मानदंडों (3.0 मिलीग्राम/लीटर से कम) का अनुपालन किया, जिन्हें बाह्य स्नान के लिए अधिसूचित किया गया था।
  • भारत की नदियों में सूक्ष्म और विषैली धातुओं की स्थिति, 2024: केंद्रीय जल आयोग द्वारा -
    • अध्ययन किए गए 434 स्टेशनों में से 112 स्टेशनों पर कम-से-कम 1 धातु (अध्ययन की गई 9 ट्रेस और विषैली धातुओं में से) निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई।

भारत में नदी प्रदूषण के विनियमउद्योगों/इकाइयोंन में समस्याएं

  • अप्रभावी विधिक क्रियान्वयन: कड़े पर्यावरण कानूनों के लागू होने के बावजूद, कर्मचारियों की कमी और खराब निगरानी के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती है।
    • उदाहरण के लिए, यमुना नदी के किनारे स्थित कारखाने सख्त विनियामक निगरानी के अभाव में नियमित रूप से बिना शोधन किए अपशिष्ट को नदी में डंप करते हैं।
  • खंडित शासन व्यवस्था: नदी प्रबंधन में कई एजेंसियों की भागीदारी से कार्यों का ओवरलैप और प्रशासनिक अक्षमता उत्पन्न होती है।
    • उदाहरण के लिए, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) प्रायः स्थानीय नगरपालिका अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करने में विफल रहते हैं, जिससे अवैध अपशिष्ट निपटान पर कार्रवाई धीमी हो जाती है।
  • योजनाओं का कम प्रदर्शन: विस्तृत परियोजना रिपोर्टों की स्वीकृति में देरी, कार्यान्वयन की धीमी गति और निधि का कम उपयोग देखा गया है।
    • उदाहरण के लिए, 2024-25 तक नमामि गंगे कार्यक्रम के लिए आवंटित धन का केवल 69% ही उपयोग किया गया था।
  • अपर्याप्त सीवेज अवसंरचना: भारत का 60% से अधिक सीवेज बिना शोधन के सीधे नदियों में प्रवाहित हो जाता है।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: कमजोर दंड और राजनीतिक समर्थन के कारण कई उद्योग बिना किसी परिणाम के प्रदूषण फैलाना जारी रखते हैं।
    • उदाहरण के लिए, उच्चतम न्यायालय के कई निर्देशों के बावजूद, कानपुर में चमड़ा कारखाने लगातार गंगा नदी में विषैले रसायन छोड़ते रहते हैं।

भारत में नदी प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए मौजूदा विधिक ढाँचा:

  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974: जल प्रदूषण को विनियमित करने के लिए केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB एवं SPCBs) की स्थापना करता है; प्रदूषक पदार्थों के निपटान के लिए नदी या कुएं के उपयोग पर रोक लगाता है, आदि।
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: सरकार को प्रदूषण मानक निर्धारित करने और खतरनाक अपशिष्ट निपटान को विनियमित करने का अधिकार देता है।
    • भारत सरकार ने इस अधिनियम के अंतर्गत अनुसूची-I: 'विभिन्न उद्योगों से पर्यावरणीय प्रदूषकों के उत्सर्जन या निर्वहन के लिए मानक' के तहत उद्योग-विशिष्ट निर्वहन मानकों को अधिसूचित किया है।
  • राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) अधिनियम, 2010: पर्यावरण संबंधी मामलों के त्वरित निपटान का प्रावधान करता है। NGT प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों / इकाइयों पर जुर्माना लगा सकता है।
  • नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW) नियम, 2016 और सीवेज उपचार विनियम: नदियों में सीधे निर्वहन को रोकने के लिए अपशिष्ट पृथक्करण एवं उपचार को अनिवार्य बनाते हैं।
  • गंगा कार्य योजना (1986) और नमामि गंगे (2014): सीवेज उपचार संयंत्र, वनीकरण और औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण हेतु महत्वपूर्ण वित्तपोषण किया गया।
  • यह नदी के पुनरुद्धार और जन जागरूकता अभियानों पर भी ध्यान केंद्रित करता है।
  • राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क (NWMP): जल संसाधनों की जल गुणवत्ता की स्थिति का नियमित रूप से आकलन करने के लिए राज्यों में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (SPCBs) और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रदूषण नियंत्रण समितियों (PCCs) के सहयोग से CPCB द्वारा स्थापित किया गया।
  • राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP): विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण कार्यों के कार्यान्वयन के माध्यम से नदियों में प्रदूषण के भार को कम करने के लिए केंद्र प्रायोजित योजना।
  • सीवरेज अवसंरचना निर्माण हेतु योजनाएं: अटल कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन (AMRUT) और स्मार्ट सिटी मिशन।

आगे की राह

  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सशक्त बनाना: SPCBs और CPCB के लिए अधिक वित्त, स्वायत्तता और जवाबदेही सुनिश्चित करना।
  • स्रोत नियंत्रण: प्रदूषण स्रोतों की पहचान और प्रबंधन, ठोस अपशिष्ट एवं सीवेज की मात्रा और प्रकृति का आकलन।
  • रीयल-टाइम ट्रैकिंग में अपग्रेड करना: नदी जल की स्थिति की लगातार निगरानी के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सेंसर और उपग्रहों जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग करना।
  • मौजूदा उपचार सुविधाओं का उन्नयन: उन्नत उपचार प्रौद्योगिकियों को अपनाएं और कड़े निगरानी प्रोटोकॉल लागू करना।
  • एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन: औद्योगिक विनियमन, अपशिष्ट प्रबंधन और कृषि नीतियों को एक ही प्राधिकरण के अंतर्गत एकीकृत करना।
    • उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ की जल रूपरेखा निर्देश एक द्रोणी-आधारित दृष्टिकोण का अनुसरण करता है, जिससे सदस्य देशों में नदियों की स्थिति में सुधार होता है।
  • जनभागीदारी को प्रोत्साहित करना: स्थानीय नागरिकों को प्रदूषण की रिपोर्ट करने और सामुदायिक सफाई प्रयासों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करके उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल करना।
    • उदाहरण के लिए, वाराणसी में आम नागरिकों द्वारा चलाए गए सफाई अभियानों ने उनके स्थानीय क्षेत्र में जल की गुणवत्ता में सुधार लाने में सफलतापूर्वक मदद की है।

निष्कर्ष

भारत में मजबूत विधिक प्रावधानों के बावजूद, कमजोर प्रवर्तन, खराब समन्वय और अपर्याप्त अवसंरचना के कारण नदी प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। इस संकट से निपटने के लिए सख्त कार्यान्वयन, बेहतर शासन, तकनीकी निगरानी और जन भागीदारी आवश्यक है, ताकि स्वच्छ और सतत नदियों को बनाए रखा जा सके।

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एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन

यह एक समग्र दृष्टिकोण है जिसमें किसी नदी बेसिन के सभी पहलुओं, जैसे औद्योगिक विनियमन, अपशिष्ट प्रबंधन, कृषि नीतियाँ और जल संसाधन प्रबंधन को एक ही प्राधिकरण के तहत एकीकृत किया जाता है, ताकि बेहतर पर्यावरणीय परिणाम प्राप्त किए जा सकें।

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP)

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan) एक केंद्र प्रायोजित योजना है जिसका उद्देश्य गंगा बेसिन को छोड़कर देश की अन्य प्रमुख नदियों के प्रदूषित खंडों में प्रदूषण को कम करना है।

राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क (NWMP)

यह CPCB द्वारा स्थापित एक नेटवर्क है जो देश भर में जल संसाधनों की जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी करता है। यह जल प्रदूषण की स्थिति का आकलन करने और नीति निर्माण में मदद करता है।

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