सुर्ख़ियों में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026–27 में इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना (ECMS) के लिए आवंटन बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ कर दिया गया है।
ECMS के बारे में
- उद्देश्य: घरेलू घटक विनिर्माण के लिए आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना।
- देश के भीतर आवश्यक घटकों, उप-असेंबली और कच्चे माल के उत्पादन को बढ़ावा देकर भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ना।

- मंत्रालय: इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY)।
- प्रोत्साहन: यह योजना लक्षित उत्पादों के लिए टर्नओवर के आधार पर विभिन्न प्रकार के वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है:
- टर्नओवर-आधारित प्रोत्साहन : 6 वर्षों के लिए, जिसमें 1 वर्ष की वैकल्पिक प्रारंभिक अवधि शामिल है। जैसे: डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा मॉड्यूल, मल्टीलेयर प्रिंटेड सर्किट बोर्ड आदि।
- पूंजीगत व्यय प्रोत्साहन: 5 वर्षों के लिए
- हाइब्रिड प्रोत्साहन
- लक्षित घटक: डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा मॉड्यूल की उप-असेंबली, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड असेंबली, लिथियम सेल एनक्लोज़र आदि शामिल हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग से जुड़ी चुनौतियां
- अत्यधिक आयात निर्भरता: भारत अभी भी मुख्य घटकों के लिए "निवल आयातक" है।
- स्रोत : प्राथमिक रूप से चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम।
- घटक :सेमीकंडक्टर उपकरण, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs), इंटीग्रेटेड सर्किट।
- प्रभाव : व्यापार घाटा बढ़ता है और आपूर्ति श्रृंखला में सुभेद्यता (जैसे भू-राजनीतिक तनाव के दौरान बाधाएं)।
- लागत प्रतिस्पर्धा में अंतर: भारत में विनिर्माण लागत चीन, वियतनाम या मेक्सिको की तुलना में 10–20% अधिक अधिक है।
- कारण :
- इनपुट पर उच्च आयात शुल्क,
- महंगे कच्चे माल तथा
- उच्च लॉजिस्टिक्स लागत।
- संरचनात्मक समस्या: बड़े घरेलू उद्योगों की कमी (आर्थिक पैमाने का अभाव)।
- कारण :
- स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास (R&D) की कमी: भारत का इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र मुख्यतः असेंबली आधारित है, डिजाइन आधारित नहीं।
- कमजोर R&D ढांचा उच्च मूल्य वाले उन्नत घटकों के घरेलू डिजाइन को सीमित करता है।
- ई-कचरा संकट: वैश्विक ई-कचरा 2030 तक 82 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है; भारत का हिस्सा लगभग 5 मिलियन मीट्रिक टन तक बढ़ सकता है।
- चुनौती: औपचारिक पुनःचक्रण ढांचे की कमी तथा पर्यावरणीय खतरे।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रक को बढ़ावा देने के लिए पहल
भारत सरकार ने देश को ESDM (इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिजाइन एवं विनिर्माण) हब बनाने के लिए "प्लग-एंड-प्ले" और "प्रोत्साहन-आधारित" दृष्टिकोण अपनाया है।
- राजकोषीय एवं विनिर्माण प्रोत्साहन
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना : यह 14 क्षेत्रों को शामिल करती है और मोबाइल फोन तथा IT हार्डवेयर पर विशेष ध्यान देकर निर्यात और तकनीकी अपनाने को बढ़ावा देती है।
- SPECS (इलेक्ट्रॉनिक घटकों और सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने के लिए योजना): यह पूंजीगत व्यय पर 25% तक वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है। इसका उद्देश्य भारत को "असेंबली" से "उच्च-मूल्य घटक निर्माण" की ओर ले जाना है।
- संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (EMC 2.0): यह इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के लिए "विश्व-स्तरीय अवसंरचना" और साझा सुविधा केंद्र विकसित करने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- सेमिकॉन इंडिया कार्यक्रम (2021): यह एक प्रमुख कार्यक्रम है, जो सेमीकंडक्टर फैब, डिस्प्ले फैब और डिजाइन-लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) आदि के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है, ताकि घरेलू सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़ावा दिया जा सके।
- निवेश एवं नीतिगत ढांचा
- राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति (NPE) 2019: भारत को वैश्विक ESDM हब के रूप में स्थापित करने के लिए बनाई गई है।
- 100% FDI: 100% FDI को स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति दी गई है, जिससे वित्त वर्ष 2020-21 से अब तक 4 अरब डॉलर से अधिक निवेश आकर्षित हुआ है।
- बजटीय एवं कर सुधार (2026-27)
- सीमा शुल्क में छूट: माइक्रोवेव ओवन जैसे विशेष उत्पादों के निर्माण में उपयोग होने वाले इनपुट पर लक्षित राहत दी गई है।
- सामाजिक कल्याण अधिभार (SWS) में छूट : इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के निर्माण में उपयोग होने वाले घटकों पर छूट दी गई है, ताकि घरेलू खिलौना उद्योग को बढ़ावा मिल सके।
निष्कर्ष
आयात निर्भरता को कम करने, उत्पादन लागत घटाने और नवाचार को बढ़ावा देने पर केंद्रित रणनीति के साथ, भारत एक प्रतिस्पर्धी और संधारणीय पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जैसे-जैसे भारत 2026 तक 300 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, उसकी मजबूत नीतियां और कुशल कार्यबल निरंतर विकास का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं, जिससे भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योग में एक प्रमुख देश के रूप में उभर रहा है।