पण्य व्यापार सूचकांक (Merchandise Trade Indices) | Current Affairs | Vision IAS

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संक्षिप्त समाचार

31 Mar 2026
9 min

पण्य व्यापार सूचकांक को संशोधित किया गया है ताकि भारत के व्यापार की बदलती संरचना और वैश्विक व्यापार पैटर्न में आए बदलावों को बेहतर ढंग से दर्शाया जा सके। 

केंद्रीय बजट ने अग्रिम मूल्य निर्धारण समझौता (Advance Pricing Agreement: APA) के नियमों को तर्कसंगत बनाया है। यह निवेशक-अनुकूल कर व्यवस्था का संकेत देता है।

आईटी (IT) क्षेत्रक के लिए प्रमुख बदलाव:

  • विवादों और मुकदमों को कम करने के लिए आईटी सेवाओं को 'सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं' की एक ही श्रेणी में रखा गया है। इसके लिए एक समान 'सेफ हार्बर मार्जिन' तय किया गया है।  
    • सेफ हार्बर पात्रता की सीमा ₹300 करोड़ से बढ़ाकर ₹2,000 करोड़ कर दी गई है। साथ ही, स्वचालित और नियम-आधारित मंजूरी की व्यवस्था की गई है।
  • अग्रिम मूल्य निर्धारण समझौते (APA) की प्रक्रिया को तेज किया गया है ताकि इसे 2 साल (6 महीने विस्तार के साथ) के भीतर पूरा किया जा सके।
    • अग्रिम मूल्य निर्धारण समझौता वास्तव में करदाता और कर विभाग के बीच पहले से किया गया समझौता होता है। इसमें तय किया जाता है कि कुछ लेनदेन के लिए ट्रांसफर प्राइसिंग की विधि क्या होगी। इससे कर में निश्चितता आती है और विवाद कम होते हैं।
  • ट्रांसफर प्राइसिंग (Transfer Pricing) का अर्थ: एक ही समूह की अलग-अलग कंपनियों के बीच लेनदेन के लिए उचित मूल्य तय करना, ताकि कर से बचने के लिए मुनाफे को एक जगह से दूसरी जगह न भेजा जा सके।  
    • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समूह की कंपनियों के बीच कारोबार बाजार मूल्य को दर्शाए।
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सरकार ने अगले 5 वर्षों में देश की सभी पंचायतों और गांवों को कवर करने के लिए नई बहुउद्देशीय PACS/ डेयरी/ मत्स्य सहकारी समितियां स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के बारे में

  • PACS अल्पकालिक सहकारी ऋण संरचना की जमीनी स्तर की संस्थाएं हैं। यह उधारकर्ताओं और उच्च वित्त-पोषक संस्थाओं (जैसे- अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक और RBI/ NABARD) के बीच अंतिम मील की कड़ी (last-mile link) के रूप में कार्य करती हैं। इसका अर्थ है कि ये सेवा वितरण की अंतिम कड़ी हैं, जो सीधे ग्राहकों (किसान) से जुड़ती हैं। 
  • वर्तमान स्थिति: स्वीकृत PACS: 79,630; नए पंजीकृत PACS: 32,802; तथा डिजिटल किए गए PACS: 61,478।
  • विनियमन:
    • बहु-राज्य PACS: ये संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 44 के अंतर्गत आती हैं। साथ ही, बहु-राज्य सहकारी सोसायटी अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत केंद्रीय सहकारी सोसायटी रजिस्ट्रार (CRCS) द्वारा प्रशासित होती हैं।
    • एकल-राज्य PACS: ये संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के अंतर्गत आती हैं और संबंधित राज्य सहकारी सोसायटी अधिनियम के तहत संबंधित राज्य सहकारी सोसायटी रजिस्ट्रार (RCS) द्वारा प्रशासित होती हैं।

PACS को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई पहलें

  • PACS कंप्यूटरीकरण परियोजना: एक साझे ERP (एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग)-आधारित राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर के तहत PACS का कंप्यूटरीकरण किया जा रहा है।
  • राष्ट्रीय सहयोग नीति (NCP) 2025: सदस्यता का विस्तार किया जा रहा है और महिलाओं व कमजोर वर्गों के लिए नेतृत्वकारी भूमिकाएं निर्धारित की जा रही हैं। 
  • आदर्श उप-नियमों (Model Bye-laws) को अपनाना: इसका उद्देश्य PACS को बहुउद्देशीय सेवा केंद्रों के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाना है। बहुउद्देशीय सेवा केंद्र अग्रलिखित रूपों में होंगे - पीएम किसान समृद्धि केंद्र, सामान्य सेवा केंद्र, वेयरहाउसिंग, कस्टम हायरिंग सेंटर, प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र आदि। 
  • समावेशी शासन:
    • बहु-राज्य सहकारी सोसायटी (संशोधन) अधिनियम, 2023 के तहत सहकारी बोर्डों में महिलाओं और SC/ST सदस्यों के अनिवार्य प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया है।
    • स्वयं सहायता समूहों (SHGs), लघु एवं सीमांत किसानों और जनजातीय समुदायों का समावेशन किया जा रहा है।
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केंद्रीय बजट 2026 में उदारीकृत विप्रेषण योजना (Liberalised Remittance Scheme)  के तहत विदेश में शिक्षा और चिकित्सा खर्चों पर लगाए जाने वाले “स्रोत पर कर संग्रह (Tax Collected at Source: TCS)” की दर में कटौती की गई है।

  • “स्रोत पर कर संग्रह (TCS)” वह अतिरिक्त कर है जिसे विक्रेता, खरीदार से विशिष्ट वस्तुओं/सेवाओं की बिक्री के समय वसूल करता है। यह कर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 206C के अंतर्गत लगाया जाता है।

उदारीकृत विप्रेषण योजना (LRS) के बारे में

  • भारत का कोई भी निवासी व्यक्ति (नाबालिग सहित) एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 2,50,000 अमेरिकी डॉलर तक की राशि विदेश भेज सकता है। यह राशि चालू खाता या पूंजी खाता लेनदेन अथवा दोनों के संयोजन के लिए भेजी जा सकती है।
    • यह सुविधा कंपनियों, साझेदारी फर्मों, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF), ट्रस्ट आदि के लिए उपलब्ध नहीं है।
  • प्रारंभ: वर्ष 2004 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा शुरू की गई।
  • LRS के तहत प्रतिबंधित गतिविधियां: जुआ एवं लॉटरी, व्यापार एवं सट्टा गतिविधियां।

प्रधान मंत्री ने भारत की प्रथम 'नमो भारत क्षेत्रीय तीव्र पारगमन प्रणाली (RRTS)’ का उद्घाटन किया।

नमो भारत क्षेत्रीय तीव्र पारगमन प्रणाली (RRTS) के बारे में

  • यह एक नई रेल-आधारित, सेमी-हाई-स्पीड (180 किमी/ घंटा तक) और दैनिक यात्री (कंप्यूटर) पारगमन प्रणाली है।
  • मेट्रो से भिन्न: यह उच्च गति और कम ठहराव (स्टेशन पर रुकने) के साथ लंबी दूरी की यात्रा की सुविधा प्रदान करेगी। 
  • पारंपरिक ट्रेनों से भिन्न: यह एक समर्पित मार्ग पर उच्च आवृत्ति के साथ बिंदु-दर-बिंदु क्षेत्रीय यात्रा सुनिश्चित करेगी। 
  • कार्यान्वयन एजेंसी: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (केंद्र सरकार और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा व दिल्ली के बीच एक संयुक्त उद्यम)।

RRTS का महत्व

  • शहरी भीड़भाड़ को कम करना: 2030 तक 40% से अधिक जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करेगी, जिसे व्यवस्थित करने में यह प्रणाली सहायक सिद्ध होगी। 
  • यात्रा के समय में कमी और उत्पादकता में वृद्धि: उदाहरण के लिए - दिल्ली-मेरठ RRTS यात्रा के समय को 3 घंटे से घटाकर मात्र 60 मिनट कर देगी। 
  • संतुलित क्षेत्रीय विकास: यात्रियों को उपनगरीय और प्रादेशिक क्षेत्रों में रहने के लिए प्रोत्साहित करके, यह 'पॉलीसेंट्रिक' (बहु-केंद्रित) आर्थिक विकास का समर्थन करेगी।
  • पर्यावरणीय संधारणीयता: यह प्रणाली विद्युत संचालित है। साथ ही, यह निजी कारों पर निर्भरता को कम करने में भी सक्षम है।
  • सामाजिक अधिकारिता: यह परियोजना "नारी-शक्ति" के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि ट्रेन ऑपरेटरों और स्टेशन नियंत्रण कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या अधिक है।

निष्कर्ष

  • तीव्र, विश्वसनीय एवं संधारणीय क्षेत्रीय परिवहन व्यवस्था को सक्षम करके, 'नमो भारत' RRTS शहरों की भीड़भाड़ कम करने, उत्पादकता बढ़ाने और संतुलित शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए एक उत्प्रेरक बन सकती है। मजबूत मल्टीमॉडल एकीकरण, अभिनव वित्त-पोषण और संस्थागत समन्वय के साथ, यह भारत में क्षेत्रीय परिवहन और शहरी विकास के भविष्य को फिर से परिभाषित कर सकती है।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने वैज्ञानिकों से लघु किसानों के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) विकसित करने का आग्रह किया।  

एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) के बारे में

  • यह एक सहक्रियात्मक (synergistic) दृष्टिकोण है, जो एक ही कृषि इकाई पर कई घटकों जैसे फसल, पशुपालन, बागवानी, मत्स्यपालन, कुक्कुट पालन और मधुमक्खी पालन को आपस में जोड़ता है।
    • भारत के लगभग 89.4% किसान लघु जोत (2 हेक्टेयर से कम) पर खेती कर रहे हैं।

चुनौतियां

  • पूंजी की अधिक आवश्यकता: संबद्ध क्षेत्रकों (जैसे- पशु शेड, मछली तालाब आदि) को स्थापित करने के लिए उच्च प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता होती है।
  • ज्ञान का अभाव: पारंपरिक किसानों के पास जटिल व बहु-स्तरीय प्रणालियों के प्रबंधन के लिए तकनीकी कौशल की कमी हो सकती है।
  • श्रम की आवश्यकता: एकीकृत कृषि प्रणाली में श्रम की अधिक आवश्यकता होती है।

सरकारी पहलें

  • राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) - वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास (RAD): यह स्थान-विशिष्ट IFS संकुलों (clusters) को बढ़ावा देने वाला प्राथमिक मिशन है।
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): यह राज्यों को विभिन्न IFS मॉडल्स और अवसंरचना के वित्त-पोषण के लिए लचीलापन प्रदान करती है।
  • परंपरागत कृषि विकास योजना: यह पशुधन और फसल घटकों के बीच जैविक पोषक चक्र को बढ़ावा देती है।
  • विकसित कृषि संकल्प अभियान: इसका उद्देश्य 'लैब-टू-लैंड' (प्रयोगशाला से खेत तक) के अंतर को समाप्त करना और क्षेत्र-विशिष्ट IFS मॉडल्स प्रसारित करने के लिए वैज्ञानिकों को नियुक्त करना है।
  • ICAR-AICRP: एकीकृत कृषि प्रणाली पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (AICRP) विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए उत्पादकता बढ़ाने हेतु 25 राज्यों में स्थान-विशिष्ट मॉडल्स विकसित कर रही है।

केंद्रीय बजट 2026-27 में 'समर्पित दुर्लभ भू-तत्व गलियारों' की घोषणा की गई। ये गलियारे ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में बनाए जाएंगे। इन्हें दुर्लभ भू स्थायी चुंबक (REPMs) के खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और निर्माण के लिए विकसित किया जाएगा। 

दुर्लभ भू स्थायी चुंबक (REPMs) क्या हैं?           

  • ये सबसे शक्तिशाली प्रकार के स्थायी चुंबकों में से एक हैं, जिनमें उच्च चुंबकीय शक्ति और स्थिरता होती है।
  • उपयोग: इलेक्ट्रिक वाहन (EV) मोटर, पवन टरबाइन जनरेटर जैसे उन्नत इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों में इनका उपयोग होता है।
  • महत्त्व: 2030 तक REPMs की मांग दोगुनी होने की उम्मीद है।

भारत के लिए महत्व

  • रणनीतिक आत्मनिर्भरता: इन गलियारों से भारत की महत्वपूर्ण सामग्रियों तक पहुंच सुनिश्चित होगी। इससे विशेष रूप से चीन से आयात पर भारत की अत्यधिक निर्भरता कम होगी।
    • भारत ने 2022-25 के दौरान चीन से 60-80% (मूल्य के आधार पर) और 85-90% (मात्रा के आधार पर) REPMs का आयात किया था।
  • जलवायु संबंधी लक्ष्य: REPMs भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और 'नेट जीरो 2070' के विज़न का समर्थन करते हैं।
    • नेट जीरो 2070 का अर्थ है वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन करना। 
  • राष्ट्रीय सुरक्षा: ये गलियारे रक्षा उपकरणों और सटीक सेंसर्स के लिए विश्वसनीय घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों का खतरा कम होगा।

प्रमुख सरकारी पहलें 

  • REPM विनिर्माण योजना: ₹7,280 करोड़ के व्यय वाली एक योजना है। इसके तहत एकीकृत घरेलू REPM विनिर्माण तंत्र स्थापित किया जाएगा। इसकी क्षमता 6,000 MTPA होगी। यह तंत्र दुर्लभ-भू ऑक्साइड से लेकर तैयार चुंबक तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को कवर करेगा। 
  • राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM): इसका उद्देश्य दुर्लभ भू तत्वों सहित महत्वपूर्ण खनिजों के लिए एक दीर्घकालिक व एंड-टू-एंड आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण करना।
  • MMDR संशोधन अधिनियम, 2023: खान और खनिज (विकास और विनियमन) (MMDR) अधिनियम, 1957 में संशोधन किए गए हैं। ये संशोधन महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की एक समर्पित सूची; खनिज रियायतों की नीलामी आदि का प्रावधान करते हैं।
  • भारत वित्त वर्ष 2030-31 तक 50±1 प्रतिशत के ऋण-से-जीडीपी अनुपात तक पहुँचने के पथ पर अग्रसर है। बजट अनुमान 2026-27 के अनुसार, यह अनुपात जीडीपी का 55.6% होने का अनुमान है।
  • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 के तहत पहले उपयोग किए जाने वाले 'राजकोषीय घाटा-जीडीपी अनुपात' के स्थान पर अब 'ऋण-से-जीडीपी अनुपात' को प्राथमिक नीतिगत लक्ष्य के रूप में तेजी से उपयोग किया जा रहा है।
  • FRBM अधिनियम का लक्ष्य सरकार की राजकोषीय नीति को एक सतत मार्ग (Sustainable path) की ओर निर्देशित करना है, जिससे आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा मिल सके।

केंद्रीय बजट 2026-27 में तीन नए केमिकल पार्क्स स्थापित करने की घोषणा की गई है।

  • इन पार्कों की स्थापना के लिए ₹600 करोड़ आवंटित किए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य क्लस्टर - आधारित और अवसंरचना के नेतृत्व वाले दृष्टिकोण के माध्यम से भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र में बदलना है।

भारत में रसायन उद्योग की स्थिति

  • राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 7% का योगदान।
  • वित्त वर्ष 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार विनिर्माण GVA (सकल मूल्य वर्धित) में 8.1% की हिस्सेदारी है।
  • भारत वैश्विक स्तर पर छठा और एशिया में तीसरा सबसे बड़ा रसायन उत्पादक है।

रसायन उद्योग के समक्ष चुनौतियां

  • आयात पर निर्भरता: आयात पर अत्यधिक निर्भरता के कारण 2023 में 31 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार घाटा हुआ था।
  • अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स: पुराने औद्योगिक क्लस्टर तथा उच्च लॉजिस्टिक्स लागत वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में मूल्य नुकसान उत्पन्न करते हैं। 
  • अवसरों की कमी: उच्च-मूल्य वाले विशिष्ट उत्पादों (डाउनस्ट्रीम) की बजाय अत्यधिक उत्पादन (अपस्ट्रीम) पर अधिक ध्यान दिया जाता है। 
  • कम अनुसंधान एवं विकास (R&D): R&D में निवेश केवल 0.7% है। इसके विपरीत, वैश्विक औसत 2.3% है। 
  • पर्यावरण अनुपालन (EC) संबंधी बाधाएं: लंबी प्रसंस्करण अवधि, जटिल मंजूरी प्रक्रियाएं और राज्य एवं केंद्र स्तर पर दोहरा विनियामक निरीक्षण जैसी बाधाएं मौजूद हैं।
  • कौशल की कमी: विशेष रूप से ग्रीन केमिस्ट्री और नैनोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रकों में कुशल पेशेवरों की 30% तक की कमी है।

रसायन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए अन्य पहलें

  • प्लास्टिक पार्क: प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन, पुनर्चक्रण और प्रसंस्करण उद्योग की क्षमताओं को बढ़ाने पर केंद्रित है।
  • बल्क ड्रग पार्क: इनका लक्ष्य फार्मास्युटिकल कच्चे माल (सक्रिय औषध सामग्रियों- APIs) में आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
  • पेट्रोलियम, रसायन और पेट्रोकेमिकल्स निवेश क्षेत्र (PCPIRs): ये पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल्स के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करते हैं।
  • उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं: महत्वपूर्ण 'प्रमुख आरंभिक सामग्रियों' (KSMs), औषध मध्यवर्तियों और APIs के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए संचालित की जा रही हैं।

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पण्य व्यापार सूचकांक (Commodity Terms of Trade Index)

यह सूचकांक किसी देश के निर्यात मूल्य की तुलना उसके आयात मूल्य से करता है, यह दर्शाता है कि देश अपने निर्यात से कितने आयात खरीद सकता है। इसे संशोधित करने का उद्देश्य भारत के व्यापार की बदलती संरचना और वैश्विक व्यापार पैटर्न में आए बदलावों को बेहतर ढंग से दर्शाना है।

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