सुर्ख़ियों में क्यों?
फलोदी दुर्घटना मामले में, उच्चतम न्यायालय ने एक्सप्रेस वे और राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) पर सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
उच्चतम न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां:
- अनुच्छेद 21 का विस्तार: उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ "जीने के अधिकार" के अभिन्न अंग के रूप में "सुरक्षित आवागमन का अधिकार तथा यात्रियों की सुरक्षा" को मान्यता दी है।

- बाधाओं से ऊपर मानव जीवन: पीठ ने पुनः स्पष्ट किया कि कोई भी वित्तीय अथवा प्रशासनिक बाधा मानव जीवन की गरिमा एवं महत्ता से ऊपर नहीं हो सकती।
- प्रशासनिक और मौद्रिक बाधाओं को दूर करते हुए देशभर में लागू करने योग्य दिशा-निर्देश जारी करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया गया।
- असंतुलित मृत्यु दर: उच्चतम न्यायालय ने चिंताजनक आंकड़ों की ओर इशारा करते हुए नोट किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग भारत की कुल सड़क लंबाई का मात्र 2% हैं, फिर भी वे सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मृत्यु में लगभग 30% का योगदान करते हैं।
उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी किए गए मुख्य दिशा-निर्देश:

- राजमार्ग अतिक्रमण हटाना: 'राइट ऑफ वे' (सड़क के स्वामित्व वाली भूमि) के भीतर किसी भी नए ढाबे, भोजनालय या व्यावसायिक संरचनाओं के निर्माण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है।
- उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली (ATMS) अनिवार्य: सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर कैमरे, गति संसूचक और दुर्घटना का पता लगाने वाली प्रणालियों को लगाना अनिवार्य है।
- भारी वाहनों की पार्किंग: पार्किंग केवल निर्धारित क्षेत्रों तक ही सीमित रहेगी।
- जिला राजमार्ग सुरक्षा कार्यबल (DHSTF): एकीकृत प्रवर्तन के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और राजमार्ग अधिकारियों को एकीकृत किया जाना है।
- आपातकालीन सेवाओं की तैनाती: त्वरित चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करने के लिए, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर अधिकतम 75 किलोमीटर की दूरी पर बुनियादी जीवन रक्षक सहायता (BLS) एम्बुलेंस और रिकवरी क्रेन 60 दिनों के भीतर तैनात करनी होगी।
- उन्नत निगरानी और गश्त: NHAI के चौबीसों घंटे गश्त करने वाले वाहनों के अतिरिक्त, अधिकतम 50 किलोमीटर के अंतराल पर समर्पित राजमार्ग निगरानी टीमों का गठन 30 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए।
- दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान: सभी दुर्घटना संभावित स्थानों की अनिवार्य पहचान और उनमें सुधार करना।
- नागरिक शिकायत: NHAI को 'राजमार्गयात्रा' अतिक्रमण शिकायत मॉड्यूल और 1033 टोल-फ्री नंबर को क्रियाशील करना होगा।
- अन्य: छमाही ड्रोन सर्वेक्षण आयोजित करना, राज्यों द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के पास भूमि-उपयोग परिवर्तन को प्रतिबंधित करना, ट्रकों के रुकने की जगह की सुविधा और एक अंतर-राज्यीय राजमार्ग सुरक्षा समन्वय समिति का गठन करना।
भारत में कम सड़क सुरक्षा के कारण:

- अवसंरचना की कमियां: तेजी से विस्तार पा रहे हाई-स्पीड नेटवर्क्स में प्रायः गैर-मोटर चालित यातायात के लिए सुरक्षित पहुंच या क्रॉसिंग की कमी है।
- खराब इंजीनियरिंग के कारण खतरनाक दुर्घटना संभावित क्षेत्र बनते हैं।
- कमजोर प्रवर्तन और अनुपालन: "लेन ड्राइविंग की अवधारणा का न होना", सीट बेल्ट के नियमों का अत्यंत कम अनुपालन (25%), विशेष रूप से पिछली सीटों पर (4%) और हेलमेट कानूनों का कम पालन (केवल 50% लोग हेलमेट पहनते हैं), तथा अनुमानित तौर पर 30% फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस का प्रचलन बुनियादी सुरक्षा को बाधित करता है।
- संस्थागत और प्रशासनिक कमियां: राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा परिषद (NRSC) जैसे मौजूदा निकायों के पास योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए पर्याप्त वैधानिक समर्थन, तकनीकी क्षमता और बजटीय संसाधनों की कमी है।
- अन्य: फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस, स्थानीय स्तर पर वाहनों में किए जाने वाले अनियंत्रित बदलाव, ओवरलोडिंग और दुर्घटना के बाद मिलने वाली चिकित्सा देखभाल में कमियां आदि।
सरकार की प्रमुख पहलें
- बहुआयामी 4E रणनीति: यह रणनीति शिक्षा (Education), अभियांत्रिकी (Engineering)—सड़क एवं वाहन , प्रवर्तन (Enforcement) तथा आपातकालीन देखभाल (Emergency Care) पर आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से सड़क सुरक्षा को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।
- मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 (Motor Vehicles (Amendment) Act, 2019 : MVAA): यह अधिनियम सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी कदम है। इसके अंतर्गत खराब सड़क डिज़ाइन के लिए सड़क निर्माण एजेंसियों एवं ठेकेदारों की जवाबदेही सुनिश्चित की गई है, दंड प्रावधानों को कठोर बनाया गया है तथा दुर्घटना पीड़ितों को "गोल्डन ऑवर" के दौरान कैशलेस उपचार प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।
- वाहन सुरक्षा में सुधार: भारत NCAP तथा ग्लोबल न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम (GNCAP) मानकों के अंतर्गत वाहनों में एयरबैग, एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS) तथा पैदल यात्रियों की सुरक्षा संबंधी डिजाइन को अनिवार्य किया गया है।
- राज्य सड़क सुरक्षा प्रोत्साहन कार्यक्रम: यह लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रस्तावित वित्तीय सहायता योजना है। इसके अंतर्गत सड़क सुरक्षा प्रदर्शन में निरंतर सुधार करने वाले राज्यों को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
- अन्य पहलें: राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा रणनीति (2018–2030), देशभर में सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों के संकलन एवं निगरानी हेतु एकीकृत सड़क दुर्घटना डेटाबेस का विकास तथा राष्ट्रीय चोट निगरानी एवं ट्रामा रजिस्ट्री की स्थापना आदि।
आगे की राह
- प्रवर्तन प्रणाली का आधुनिकीकरण: मानव हस्तक्षेप को कम करने तथा चौबीसों घंटे अनुपालन एवं निष्पक्ष दंड व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु मानव-रहित एवं स्वचालित प्रौद्योगिकियों, जैसे- कैमरा, उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली (ATMS) तथा ड्रोन आधारित निगरानी को व्यापक रूप से अपनाया जाना चाहिए।
- संस्थागत व्यवस्था को सुदृढ़ करना: मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अंतर्गत प्रावधानित पूर्ण अधिकार-संपन्न राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड (NRSB) तथा राज्य स्तरीय सड़क सुरक्षा प्राधिकरणों को शीघ्र प्रभावी रूप से संचालित किया जाना चाहिए, ताकि जवाबदेही एवं समन्वय सुनिश्चित हो सके।
- दुर्घटना उपरांत देखभाल को मजबूत करना: राहगीरों एवं सहायता प्रदान करने वाले नागरिकों की सुरक्षा हेतु "गुड समैरिटन" दिशा-निर्देशों को पूर्ण रूप से लागू किया जाना चाहिए तथा राष्ट्रीय राजमार्गों के साथ ट्रॉमा केयर नेटवर्क को एकीकृत किया जाना चाहिए।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3.6 हेतु कार्ययोजना: वर्ष 2030 तक सड़क दुर्घटना मृत्यु दर को आधा करने के उद्देश्य से राज्यवार बाध्यकारी लक्ष्य-ढांचा प्रकाशित किया जाना चाहिए तथा वार्षिक प्रदर्शन समीक्षा को केंद्र द्वारा दिए जाने वाले राजमार्ग वित्त-पोषण से जोड़ा जाना चाहिए।
- अन्य सुझाव: सभी सड़क परियोजनाओं के लिए अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट सुनिश्चित किए जाए। फर्जी ड्राइविंग लाइसेंसों को समाप्त करने हेतु स्वचालित चालक परीक्षण ट्रैक स्थापित किए जाए। साथ ही, प्रत्येक राज्य में आधुनिक स्वचालित वाहन निरीक्षण केंद्र विकसित किए जाए, ताकि वाहनों की फिटनेस का निष्पक्ष परीक्षण किया जा सके।
निष्कर्ष
भारत में सड़क सुरक्षा केवल परिवहन से संबंधित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोक स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिरता तथा सुशासन से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिकता है। सड़क सुरक्षा को सुदृढ़ करना सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), विशेष रूप से SDG 3.6 तथा SDG 11.2 (सुरक्षित परिवहन तक सार्वभौमिक पहुंच) की प्राप्ति के अनुरूप है। साथ ही, यह सड़क सुरक्षा से संबंधित अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों, जैसे 1968 वियना कन्वेंशन ऑन रोड साइन एंड सिग्नल्स तथा 1998 एग्रीमेंट ऑन टेक्निकल रेगुलेशन फॉर व्हिल्ड व्हीकल्स के अंतर्गत भारत की प्रतिबद्धताओं की पूर्ति भी सुनिश्चित करता है।