भारत-चीन संबंधों के 75 वर्ष (75 Years of India-China Relations) | Current Affairs | Vision IAS
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भारत-चीन संबंधों के 75 वर्ष (75 Years of India-China Relations)

01 Jun 2025
41 min

सुर्ख़ियों में क्यों? 

हाल ही में, भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के 75 वर्ष पूरे हुए। इस अवसर पर चीन के राष्ट्रपति ने दोनों देशों के बीच "ड्रैगन-एलिफेंट टैंगो" जैसे संबंधों का उल्लेख किया। यह दोनों देशों के बीच सामंजस्यपूर्ण साझेदारी का प्रतीक है।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • "ड्रैगन-एलिफेंट टैंगो" शब्दावली वास्तव में रूपकात्मक कहावत है, जिसका उपयोग चीन और भारत के बीच शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक संबंधों के विजन को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
  • ड्रैगन चीन का प्रतिनिधित्व करता है, जो चीनी पौराणिक कथाओं का एक प्रतीक है। वहीं एलीफेंट (हाथी) भारत का प्रतिनिधित्व करता है, जो भारतीय सांस्कृतिक विरासत में शक्ति और बुद्धिमत्ता का प्रतीक माना जाता है।
  • टैंगो (एक प्रकार की नृत्य शैली) समन्वय, सद्भाव और आपसी समझ का प्रतीक है।

शांतिपूर्ण भारत-चीन संबंधों का महत्व

  • क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए: शांतिपूर्ण संबंध विवादित सीमा पर टकराव की आशंका को कम करता है और इससे दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापक शांति और स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।
    • तनाव कम करने से दोनों देश अपने संसाधनों को सैन्य क्षेत्र में खर्च करने की बजाय सामाजिक-आर्थिक विकास और अन्य प्रमुख घरेलू प्राथमिकताओं में लगा सकते हैं।
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समृद्धि और शांति: स्थिर भारत-चीन संबंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक तनाव को कम करके और सहयोगात्मक विकास को बढ़ावा देकर समृद्धि और शांति सुनिश्चित कर सकता है।
  • व्यापार और निवेश: स्थिर संबंध द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के लिए अनुकूल माहौल को बढ़ावा देता है, जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के प्रायः सभी क्षेत्रकों को लाभ होता है। 
    • उदाहरण के लिए, चीन भारत के फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए सक्रिय फार्मास्युटिकल घटकों (Active Pharmaceutical Ingredients: APIs) का मुख्य स्रोत है। साथ ही वह भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में बड़ा निवेशक भी है। 
  • भारत के लिए क्रिटिकल संसाधनों का स्रोत: चीन दुर्लभ भू-धातुओं (रेयर अर्थ एलिमेंट्स) के उत्पादन में अग्रणी है, जो नई प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए आवश्यक है। दोनों देशों के बीच स्थिर संबंध भारत की इन अति महत्वपूर्ण यानी क्रिटिकल संसाधनों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है। 
    • भारत नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सोलर मॉड्यूल और सोलर सेल के लिए भी चीन पर निर्भर है।
  • वैश्विक प्रभाव: भारत और चीन एशिया की प्रमुख शक्तियां हैं। उनके बीच स्थिर संबंध होने पर वे ग्लोबल गवर्नेंस में रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन  (Shanghai Cooperation Organization: SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग भी उनके प्रभाव को बढ़ाते हैं।
    • भारत और चीन के बीच सहयोग अंतर्राष्ट्रीय मामलों में पाश्चात्य देशों के प्रभावों को कम कर सकता है। इससे विश्व व्यापार संगठन (WTO), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में सुधार के लिए दबाव बनाया जा सकता है।
  • वैश्विक चुनौतियों का सामना करना: भारत और चीन के बीच शांतिपूर्ण संबंध जलवायु परिवर्तन, लोक स्वास्थ्य, ऊर्जा सुरक्षा जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सहयोग को बढ़ावा दे सकता है। साथ ही, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर संयुक्त कार्रवाई को भी बढ़ावा मिलेगा।

भारत-चीन संबंधों में मुख्य चिंताएं/ समस्याएं 

  • सीमा-निर्धारण स्पष्ट नहीं होना: भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control: LAC) पर आपसी सहमति की कमी के कारण कई बार सैन्य टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
    • इनके कुछ उदाहरण हैं; डोकलाम गतिरोध (2017)गलवान घाटी संघर्ष (2020)
  • व्यापार असंतुलन: वर्ष 2022-23 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 83.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2023-24 में बढ़कर 85 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। भारत सेमीकंडक्टर, फार्मास्युटिकल API आदि के लिए चीन पर निर्भर है।
    • वर्तमान में, चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और वर्ष 2023-2024 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 118.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था।
  • चीन-पाकिस्तान गठजोड़: भारत पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) से गुजरने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (China-Pakistan Economic Corridor: CPEC) को अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन मानता है।
  • चीन की आक्रामकता: चीन विशेष रूप से दक्षिण एशिया में स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स जैसी रणनीतियों के माध्यम से मालदीव, श्रीलंका जैसे भारत के पड़ोसी देशों में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। साथ ही, दक्षिण चीन सागर में उसकी सैन्य और क्षेत्रीय दावेदारी से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो रही है।
    • इस बीच, भारत क्वाड (भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसे अंतर्राष्ट्रीय फोरम के माध्यम से समान विचारधारा वाले देशों के साथ संबंधों को मजबूत कर रहा है। इसे चीन की आक्रामकता के रणनीतिक प्रतिसंतुलन के रूप में देखा जा रहा है।
  • जल शक्ति: चीन का भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से बहने वाली नदियों पर नियंत्रण है। चीन ने अपने क्षेत्र में जांगमू , दागू, जिएक्सू और जियाचा बांध जैसी कई परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है। इससे वह जल को भू-रणनीतिक हथियार के रूप में भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है।

आगे की राह 

  • राजनयिक संवाद बनाए रखना: ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन जैसे द्विपक्षीय या क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से संवाद के खुले चैनल बनाए रखने चाहिए। 
    • दोनों देश ब्रिक्स, SCO, G20 और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) के सदस्य हैं। 
  • एक-दूसरे का सम्मान करना और आपसी समझ के आधार पर संबंध बनाना: दोनों देशों को एक-दूसरे का सम्मान करके, एक-दूसरे की संवेदनशीलता का ध्यान रखकर और आपसी हित के त्रिस्तरीय सूत्र के आधार पर संबंधों के फिर से मजबूत करने वाले "स्थायी आधार" की आवश्यकता है। 
  • रणनीतिक संतुलन: भारत को अनावश्यक तनाव से बचते हुए तथा अपनी संप्रभुता को बनाए रखते हुए सामरिक सतर्कता और संपर्क के बीच संतुलन बनाना चाहिए।
  • जल संसाधन प्रबंधन: दोनों देशों में बहने वाली नदियों के लिए हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने पर सहयोग बढ़ाना चाहिए  तथा संभावित संघर्षों को कम करने हेतु संयुक्त प्रबंधन के लिए तंत्र स्थापित करना चाहिए।
  • विश्वास निर्माण उपाय (Confidence Building Measures: CBMs): केवल सैन्य स्तरीय वार्ताओं तक सीमित न रहकर, सीमा क्षेत्रों में आर्थिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी CBMs का हिस्सा बनाना चाहिए। इससे स्थानीय स्तर पर लोगों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

निष्कर्ष 

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपनी पुस्तक 'द इंडिया वे: स्ट्रेटेजीज फॉर एन अनसर्टेन वर्ल्ड' में तर्क दिया है कि चीन से निपटना यथार्थवाद (realism), चपलता (agility) और रणनीतिक स्पष्टता (strategic clarity) का विषय है। इस संदर्भ में, भारत के लिए यह उचित होगा कि वह संतुलित रणनीति अपनाए - जहाँ सतर्कता और संपर्क, दोनों का संतुलन हो। साथ ही, वैश्विक साझेदारी का लाभ उठाने और बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में प्रॉक्सी बने बिना अपने राष्ट्रीय हितों को सशक्त रूप से प्रस्तुत करना चाहिए। इस अनिश्चितता भरे विश्व में, चीन से निपटना केवल समस्या के अंतिम समाधान तक पहुँचने के बारे में नहीं है, बल्कि ताकत, कूटनीति और दूरदर्शिता के माध्यम से उसके साथ संतुलन बनाए रखने के बारे में है - जो एक परिपक्व वैश्विक शक्ति की पहचान है।

स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति

  • स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स एक भू-राजनीतिक और रणनीतिक फ्रेमवर्क है। इसके अंतर्गत चीन हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region - IOR) में वाणिज्यिक और सैन्य ठिकानों (जिन्हें "मोती" कहा जाता है) का एक नेटवर्क विकसित कर रहा है। इसका उद्देश्य अपने ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा करना और क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना है।
  • बंदरगाहों और सैन्य ठिकानों का नेटवर्क: चीन ने पाकिस्तान (ग्वादर), श्रीलंका (हंबनटोटा), बांग्लादेश (चटगांव) और म्यांमार (सितवे और कोको द्वीप) जैसे देशों में बंदरगाह सुविधाओं में निवेश किया है और उनका विकास किया है। जिबूती में उसका एक सैन्य अड्डा भी है। 

भारत की "हीरों का हार (Necklace of Diamonds)" रणनीति

इस बहुआयामी अप्रोच में निम्नलिखित शामिल हैं -

  • नौसैनिक अड्डों का विकास और पहुंच सुनिश्चित करना: उदाहरण के लिए, ईरान (चाबहार), ओमान, सिंगापुर (चांगी नौसैनिक अड्डा), आदि के विकास में भारत की भूमिका रही है।
  • क्षेत्रीय साझेदारी को मजबूत करना: एक्ट ईस्ट नीति अपनाई गई है। इसके अलावा आसियान, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंधों को मजबूत किया जा रहा है। क्वाड और हिंद-प्रशांत पहलों के माध्यम से रणनीतिक भागीदारी बढ़ाई जा रही है।
  • समुद्री क्षेत्र में सहयोग हेतु  सागर/ SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) और महासागर/ MAHASAGAR रणनीतियों को अपनाया गया है।
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