सुर्ख़ियों में क्यों?
चीन ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो (भारत में ब्रह्मपुत्र) नदी पर मेडोग (मोतुओ) मेगा डैम परियोजना का निर्माण शुरू किया है।
अन्य संबंधित तथ्य
- यह परियोजना केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परियोजना तिब्बत के औद्योगीकरण संबंधी बीजिंग के लक्ष्य का भी समर्थन करती है।
- चीन, मेडोग (मोतुओ) बांध परियोजना को एक नवीकरणीय ऊर्जा पहल और तिब्बत के लिए आर्थिक प्रोत्साहन के रूप में प्रस्तुत करता है, जो 2060 तक कार्बन तटस्थता के उसके लक्ष्य का समर्थन करती है।
मेडोग हाइड्रोपावर परियोजना के बारे में
- विस्तार और क्षमता: इसके बनने के बाद यह आकार में चीन की यांग्त्ज़ी नदी पर बने 'थ्री गॉर्जेस डैम' से भी बड़ा होगा। संभवतः उससे तीन गुना अधिक ऊर्जा उत्पन्न भी करेगा। मेडोग परियोजना विश्व की सबसे बड़ी बांध परियोजना होगी।
- अवस्थिति: यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश की सीमा के निकट तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी के ग्रेट बेंड पर निर्मित की जा रही है।
- परियोजना का डिजाइन: इसे रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना के रूप में पेश किया गया है। इसमें पांच क्रमिक (कैस्केड) हाइड्रो पावर संयंत्र होंगे और नदी के जल प्रवाह के आधे हिस्से तक को मोड़ने वाली भंडारण संरचनाएं होंगी।
परियोजना से जुड़ी गंभीर चिंताएं

- भू-राजनीतिक चिंताएं:
- प्रवाह में बाधा: नदी के प्रवाह में बदलाव से पूर्वोत्तर राज्यों में कृषि, खाद्य सुरक्षा और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित होंगी।
- उदाहरण: सियांग नदी आपदा (2000)।
- सुरक्षा संबंधी जोखिम: दोनों देशों के बीच तनाव के समय इसे एक संभावित वॉटर बॉम्ब के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
- जल संसाधन पर प्रतिस्पर्धा: ब्रह्मपुत्र बेसिन में भारत–चीन–बांग्लादेश के बीच जल संसाधन को लेकर प्रतिस्पर्धा है, जो कि बांध और जल के प्रवाह को मोड़ने वाली परियोजनाओं से प्रेरित है। इससे मानव सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर खतरा है।
- पर्यावरणीय प्रभाव:
- गंगा–ब्रह्मपुत्र डेल्टा के लिए आवश्यक तलछट (Sediment) प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
- मछलियों की लगभग 218 प्रजातियों (जैसे हिल्सा और महसीर) के समक्ष खतरा उत्पन्न हो सकता है। इससे 20 लाख लोगों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।
- आपदा के प्रति सुभेद्यता:
- यह परियोजना भूकंप क्षेत्र V में स्थित है, जो भूकंप और भूस्खलन के लिए अत्यधिक संवेदनशील है।
- ज्ञातव्य है कि दिसंबर 2024 में तिब्बत में आए 7.5 तीव्रता वाले भूकंप ने बड़े बांधों के टूटने के संभावित खतरे को उजागर किया था।
भारत और चीन के बीच मौजूदा नदी जल सहयोग तंत्र
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आगे की राह
- भारत की संभावित प्रतिक्रिया:
- रणनीतिक कदम: चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी हिस्से (Upstream) पर अपना अधिकार बढ़ाने के खिलाफ प्रतिक्रिया में, भारत अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट) के निर्माण की योजना बना रहा है।
- नीति आयोग ने 2017 में सियांग क्षेत्र में इस तरह की बहुउद्देशीय परियोजना का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था।
- पारदर्शिता की मांग: भारत द्वारा चीन से तकनीकी जानकारी, पर्यावरणीय अध्ययन और भूकंपीय सुरक्षा योजनाओं का पूरा विवरण साझा करने की मांग की जानी चाहिए। साथ ही, जब तक इन मुद्दों का समाधान न हो जाए, तब तक परियोजना रोकने पर जोर दिया जाना चाहिए।
- रणनीतिक कदम: चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी हिस्से (Upstream) पर अपना अधिकार बढ़ाने के खिलाफ प्रतिक्रिया में, भारत अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट) के निर्माण की योजना बना रहा है।
- क्षेत्रीय गठबंधन: निचले प्रवाह (Downstream) वाले देशों को एकजुट करना चाहिए, ताकि वे 1997 के संयुक्त राष्ट्र जल अभिसमय के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी जल बंटवारे के समझौते की मांग कर सकें। इसमें हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना, मिलकर पर्यावरणीय आकलन करना आदि शामिल होना चाहिए।
- सीमा-पार सहयोग: भारत यह प्रयास करे कि नदी जल साझाकरण पर चीन-कज़ाखस्तान समझौते की तरह ही एक संयुक्त तंत्र विकसित किया जाए, ताकि भारत साझा नदियों पर अपने अधिकार (Co-riparian rights) सुरक्षित रह सकें।
- जल सुरक्षा ढांचा: ब्रह्मपुत्र, सिंधु और गंगा नदी बेसिन वाले दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक "साउथ एशिया वाटर नाटो" जैसे समूह के गठन का प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि डेटा की पारदर्शिता, विवाद समाधान और आपदा से निपटने की तैयारी सुनिश्चित हो सके। इसमें भी सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत निहित होना चाहिए।
- इस दिशा में नाइल बेसिन इनिशिएटिव और मेकांग रिवर कमीशन से सर्वोत्तम पद्धतियों एवं सीख को अपनाया जा सकता है।
निष्कर्ष:
यारलुंग त्सांगपो परियोजना यह दिखाती है कि जल प्रबंधन में तुरंत और मिलजुलकर सहयोग की जरूरत है। यदि पारदर्शिता और न्यायपूर्ण जल साझाकरण (जैसे नदी के प्रवाह मार्ग में स्थित मध्यवर्ती देशों के गठबंधन या साउथ एशिया वाटर नाटो) जैसी व्यवस्था नहीं बनाई जाती हैं, तो इससे पर्यावरणीय नुकसान, आर्थिक हानि तथा क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा हो सकती है।