सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) की नवीकरणीय क्षमता सांख्यिकी 2026 रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में उल्लेख है कि भारत ने स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के संबंध में विश्व में तीसरा स्थान प्राप्त कर लिया है।

अन्य संबंधित तथ्य
- वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता: कुल वैश्विक स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता लगभग 5150 गीगावाट (GW) तक पहुंच गई है, जिसमें चीन (2260 GW) और अमेरिका (470 GW) अग्रणी हैं।
- भारत की वैश्विक रैंकिंग: भारत 250.52 गीगावाट की स्थापित क्षमता के साथ ब्राजील (228 GW) को पीछे छोड़ते हुए विश्व का तीसरा सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक बन गया है।
- वैश्विक विद्युत संक्रमण: एक शताब्दी से भी अधिक समय में पहली बार नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन ने कोयले आधारित विद्युत उत्पादन को पीछे छोड़ दिया है। एम्बर ग्लोबल इलेक्ट्रिसिटी रिव्यू 2026 के अनुसार, वैश्विक विद्युत उत्पादन में अक्षय ऊर्जा का योगदान 33.8% रहा, जबकि कोयले का योगदान 33.0% था।
भारत में नवीकरणीय ऊर्जा की स्थिति
- क्षमता वृद्धि: वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने 55.3 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा उत्पादन क्षमता जोड़ी है।
- भारत ने वर्ष 2025-26 में अब तक की सर्वाधिक वार्षिक पवन ऊर्जा क्षमता वृद्धि अर्थात 6.05 गीगावाट दर्ज की है।
- भारत ने सौर ऊर्जा में भी ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की है। वर्ष 2025-26 में 45 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई है। इसमें राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु शीर्ष योगदानकर्ता राज्य रहे हैं।
- NDC लक्ष्य: भारत ने जून 2025 में ही गैर-जीवाश्म स्रोतों से 50% स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया, जो कि इसके 2030 के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्य से पांच वर्ष पूर्व ही पूर्ण हो गया।
- विद्युत उत्पादन: वर्ष 2025-26 में भारत ने कुल 1,845.921 बिलियन यूनिट (BU) विद्युत का उत्पादन किया, जिसमें गैर-जीवाश्म स्रोतों का योगदान 538.97 BU (29.2%) रहा।
- विद्युत मांग: भारत की कुल विद्युत मांग का लगभग 51.5% हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से पूरा किया गया है।
नवीकरणीय ऊर्जा का महत्व

- ऊर्जा सुरक्षा: यह बाह्य आपूर्ति झटकों, भू-राजनीतिक संघर्षों और वैश्विक ऊर्जा कीमतों की अस्थिरता के प्रति संवेदनशीलता को कम करता है। उदाहरण के लिए, पश्चिम एशिया संकट।
- जलवायु प्रतिबद्धताएं: यह भारत को अपने जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करता है, जैसे कि 2035 तक कार्बन तीव्रता में 47% की कमी लाना और 2070 तक नेट ज़ीरो (Net Zero) का लक्ष्य प्राप्त करना।
- उदाहरण: बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा उपयोग के कारण ऊर्जा क्षेत्रक में उत्सर्जन तीव्रता में कमी।
- आर्थिक लाभ: यह बड़े पैमाने पर निवेश को आकर्षित करता है, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देता है और विभिन्न क्षेत्रों में हरित रोजगार के अवसर सृजित करता है।
- उदाहरण: मार्च 2000 से जून 2025 के बीच गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्रक में लगभग 23 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्राप्त हुआ है।
- समावेशी विकास: विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा समाधान जैसे रूफटॉप सोलर, कृषि-सौर और मिनी-ग्रिड सार्वभौमिक ऊर्जा पहुंच प्राप्त करने में सहायक हैं।
- सामुदायिक सशक्तिकरण: 'बेयरफुट विमेन सोलर इंजीनियर्स' कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं को 'सोलर मामा' के रूप में प्रशिक्षित करता है ताकि वे अपने गाँवों में सौर बिजली प्रदान कर सकें।
नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि के कारण

- निम्न लागत वाली प्रौद्योगिकी: सौर और पवन ऊर्जा की घटती लागत ने इसके अपनाए जाने की दर को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, 2015-2025 के बीच सौर पैनल की कीमतों में लगभग 90% की गिरावट आई।
- सरकारी नीतियां और योजनाएं: राष्ट्रीय सौर मिशन, पीएम-कुसुम (PM-KUSUM), राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और जैव-ऊर्जा कार्यक्रमों जैसी योजनाओं के माध्यम से सुदृढ़ नीतिगत समर्थन मिला है।
- विनियामक सुधार: नवीकरणीय ऊर्जा खरीद बाध्यता (RPO), हरित ऊर्जा मुक्त पहुंच नियम (2022) और भारतीय कार्बन बाजार जैसे उपायों ने स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित किया है।
- अवसंरचनात्मक सहायता: हरित ऊर्जा गलियारे (Green Energy Corridor) का विस्तार, पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत रूफटॉप सोलर और पवन चक्की के स्थलों के मानचित्रण ने नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण में सुधार किया है।
- घरेलू विनिर्माण: उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के माध्यम से भारत ने स्थानीय विनिर्माण को गति दी है। उदाहरण के लिए, सौर मॉड्यूल क्षमता वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान 38 गीगावाट से बढ़कर 74 गीगावाट हो गई।
- निवेश और प्रोत्साहन: स्वचालित मार्ग के तहत 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स, और कर प्रोत्साहन जैसी नीतियों ने इस क्षेत्रक में निजी निवेश बढ़ाया है।
- बैटरी और भंडारण विकास: वैश्विक बैटरी परिनियोजन में 46% की वृद्धि हुई और कीमतों में 45% की कमी आई, जिससे चौबीसों घंटे (RTC) अक्षय ऊर्जा आपूर्ति संभव हुई है।
- अनुकूल भूगोल: भारत के कई राज्यों में वर्ष में 300 से अधिक धूप वाले दिन होते हैं। साथ ही, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में लंबी तटरेखा और शक्तिशाली पवन गलियारे उपलब्ध हैं।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड (OSOWOG) जैसी पहलों ने वैश्विक सौर सहयोग और निवेश को बढ़ावा दिया है।
प्रमुख चिंताएं
- वित्तीय बाधाएं: भारत को 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिए 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की आवश्यकता होगी।
- आयात निर्भरता: उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 1.6 बिलियन डॉलर मूल्य के 35 मिलियन सौर मॉड्यूल आयात किए, जिनमें से अधिकांश चीन से थे।
- वैश्विक आपूर्ति जोखिम: दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रसंस्करण क्षमता पर चीन का लगभग 90% नियंत्रण है, जो आपूर्ति श्रृंखला में असुरक्षा पैदा करता है।
- अक्षय ऊर्जा की अनिरंतरता: सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर हैं। सौर ऊर्जा उत्पादन दिन में अधिकतम होता है, जबकि मांग प्रायः शाम के समय अधिक होती है।
- पारेषण संबंधी बाधाएं: ऊर्जा-समृद्ध राज्यों जैसे तमिलनाडु में भी ग्रिड अवसंरचना अपर्याप्त है, जिससे ऊर्जा निकासी में समस्या होती है।
- भूमि अधिग्रहण संबंधी समस्याएं: बड़ी अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए विशाल भूमि की आवश्यकता होती है, जिससे परियोजनाओं में देरी, स्थानीय संघर्ष और खाद्य सुरक्षा की चिंताएं उत्पन्न होती हैं।
- उदाहरण के लिए: सौर ऊर्जा को परमाणु ऊर्जा की तुलना में 300 गुना अधिक भूमि की आवश्यकता हो सकती है (आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24)।
आगे की राह
- घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन: आयात निर्भरता कम करने के लिए PLI योजनाओं के माध्यम से सौर पैनल, पवन टरबाइन, बैटरी और हरित हाइड्रोजन उपकरणों के स्थानीय उत्पादन का विस्तार किया जाना चाहिए।
- ऊर्जा भंडारण का विस्तार: स्थिर विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बैटरी स्टोरेज, पंप-स्टोरेज हाइड्रोपावर और हाइब्रिड नवीकरणीय प्रणालियों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
- हरित वित्तपोषण में वृद्धि: ग्रीन बॉन्ड, निजी निवेश और बहुपक्षीय वित्तपोषण के माध्यम से धन के प्रवाह को सुगम बनाया जाना चाहिए।
- ग्रिड अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: पारेषण नेटवर्क को अपग्रेड किया जाना चाहिए तथा बेहतर एकीकरण के लिए AI/ML जैसी प्रौद्योगिकियों का उपयोग करते हुए स्मार्ट ग्रिड विकसित की जानी चाहिए।
- भूमि अधिग्रहण का सरलीकरण: नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि बैंकों का निर्माण किया जाना चाहिए और केंद्र-राज्य समन्वय में सुधार करना ताकि अधिग्रहण की प्रक्रिया सरल हो सके।