‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण (One Health Approach) | Current Affairs | Vision IAS

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‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण (One Health Approach)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • फ्रांस के लियोन में आयोजित वैश्विक वन हेल्थ शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वन हेल्थ प्रतिबद्धताओं को गति देना और बहुपक्षवाद को बढ़ावा देना था।
  • डब्ल्यूएचओ ने चार प्रमुख कार्यों की घोषणा की: व्यावहारिक उपकरणों के लिए एक वैश्विक नेटवर्क, ओएचएचएलईपी के माध्यम से मजबूत वैज्ञानिक मार्गदर्शन, 2030 तक रेबीज का उन्मूलन और एवियन इन्फ्लूएंजा रणनीति।
  • भारत के राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य मिशन का लक्ष्य एकीकृत रोग नियंत्रण है, जिसमें अलग-अलग मंत्रालयों की भूमिका और निगरानी में कमियों जैसी चुनौतियां शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में फ्रांस के ल्योन में संयुक्त राष्ट्र (UN) समर्थित "वन हेल्थ" दृष्टिकोण पर एक वैश्विक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें विश्व भर के नेताओं, वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने भाग लिया।

अन्य संबंधित तथ्य

  • इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य कार्य-उन्मुख बहुपक्षवाद को बढ़ावा देना और 'वन हेल्थ' के लिए की गई प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन में तेजी लाना था।
  • इस शिखर सम्मेलन में, WHO ने 'वन हेल्थ' से संबंधित निम्नलिखित चार प्रमुख कार्य-योजनाओं की घोषणा की:
    • "वन हेल्थ" पर संस्थानों का एक नया वैश्विक नेटवर्क: यह नेटवर्क विश्व के लिए मार्गदर्शन को व्यावहारिक साधनों और जमीनी स्तर की कार्रवाइयों में बदलने की प्रक्रिया को बेहतर बनाएगा, WHO अकादमी के माध्यम से प्रशिक्षण को बढ़ावा देगा, और "वन हेल्थ" दृष्टिकोण के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्र-केंद्रित उपयोगी मॉडल तैयार करेगा।
    • वैश्विक कार्य-योजना का मार्गदर्शन करने के लिए सुदृढ़ विज्ञान: WHO और उसके चार प्रमुख साझेदारों (FAO, UNEP, WHO और WOAH) ने 'वन हेल्थ उच्च स्तरीय विशेषज्ञ कार्य-दल (OHHLEP) के विस्तार और उसके कार्यकाल को बढ़ाने की घोषणा की है। यह कार्यदल 'वन हेल्थ' के क्षेत्र में विश्व का प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार निकाय है। 
    • वर्ष 2030 तक रेबीज के उन्मूलन के लिए एक नई पहल 
    • एवियन इन्फ्लूएंजा के खतरों से निपटने के लिए एकीकृत रणनीति

'वन हेल्थ' दृष्टिकोण क्या है?

  • "वन हेल्थ" सहयोग-आधारित, बहु-क्षेत्रक और अंतर-विषयक दृष्टिकोण है। इसका लक्ष्य मनुष्यों, जानवरों, पादपों और हमारे साझा पर्यावरण के बीच के परस्पर संबंधों को समझते हुए स्वास्थ्य-देखभाल के लिए सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करना है।
  • इस दृष्टिकोण को सामुदायिक, उप-राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर लागू किया जा सकता है। यह साझा और प्रभावी गवर्नेंस, संचार, सहयोग और समन्वय पर निर्भर करता है।  
  • "वन हेल्थ" दृष्टिकोण मनुष्यों, जानवरों और पर्यावरण को जोड़कर, रोग नियंत्रण के संपूर्ण क्षेत्र की समस्या का समाधान कर सकता है—जिसमें बीमारी की रोकथाम, पहचान, निपटने की तैयारी, प्रभावी उपाय और प्रबंधन शामिल है। यह विश्व स्तर पर स्वास्थ्य की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

भारत में 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण की आवश्यकता क्यों है?

  • जूनोटिक रोगों की रोकथाम: मनुष्यों में होने वाली लगभग 60% नई संक्रामक बीमारियां वन्यजीवों या पालतू जानवरों से उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिए: कोविड-19, निपाह वायरस, आदि।
  • पशुधन संरक्षण: भारत, विश्व में सर्वाधिक पशुधन संख्या वाले देशों शामिल है। ब्रुसेलोसिस, खुरपका-मुंहपका रोग (FMD), लंपी स्किन डिजीज जैसी बीमारियां कृषि-अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाती हैं।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: जलवायु परिवर्तन के कारण प्रतिवर्ष 2,50,000 से अधिक लोगों की मृत्यु होने का अनुमान है। 
  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) का उदय: मनुष्यों और पशुओं में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से दवा-प्रतिरोधी रोगाणु उत्पन्न हो रहे हैं। 
  • पारिस्थितिकी तंत्र का निम्नीकरण: देश भर में खरपतवार, कीटों और बीमारियों के कारण प्रत्येक वर्ष 10-35% फसल नष्ट हो जाते हैं। 
  • आर्थिक नुकसान: अत्यधिक गर्मी के कारण श्रम क्षमता में कमी से होने वाला संभावित आय का नुकसान 2024 में 194 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। 

भारत में "वन हेल्थ" दृष्टिकोण के समक्ष चुनौतियां:

  • मंत्रालयों में समन्वय का अभाव: स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण और वन मंत्रालय स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। इनके विभागों की प्राथमिकताएं प्रायः एक-दूसरे से टकराती हैं।
  • निगरानी में कमी: 'एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम' जैसे वर्तमान प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से केवल डेटा रिपोर्ट करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, न कि समन्वित कार्य-योजना बनाने या कदम उठाने पर। 
  • जन जागरूकता की कमी: यह कई राज्यों में स्वाइन फ्लू और रेबीज के बार-बार होने वाले प्रकोप के दौरान स्पष्ट रूप से देखा गया है। 
  • क्षमता निर्माण से संबद्ध बाधाएं: डॉक्टरों, पशु चिकित्सकों, आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं और पर्यावरण संरक्षण अधिकारियों के लिए जूनोटिक रोगों के प्रबंधन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम अपर्याप्त हैं। 
    • उदाहरण के लिए, कोविड-19 महामारी के दौरान कई फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के पास रोग से निपटने की विशेष तैयारी का अभाव देखा गया। 
  • अनुसंधान और नवाचार की कमी: उदाहरण के लिए, निपाह और कोरोना वायरस के वाहक (होस्ट) चमगादड़ों पर अनुसंधान अभी भी प्रारंभिक चरण में है। 
  • स्थानीय स्तर पर कमजोर शासन: उदाहरण के लिए, शहरी क्षेत्रों के बाहरी हिस्सों में खराब अपशिष्ट प्रबंधन और बिना-विनियमन वाले पशु बाजार बीमारियों के प्रसार के खतरे को बढ़ाते हैं। 

भारत में प्रमुख पहलें

  • राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन के बारे में:
    • विजन: भारत में मानव, पशु और पर्यावरण क्षेत्रों को एक साथ लाकर एकीकृत रोग नियंत्रण और महामारी से निपटने की तैयारी प्रणाली विकसित करना, जिससे बेहतर स्वास्थ्य परिणाम, अधिक उत्पादकता और जैव विविधता का संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
    • अनुमोदन: इसे 2022 में प्रधानमंत्री की विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (PM-STIAC) की 21वीं बैठक में स्वीकृति दी गई थी। 
    • नोडल एजेंसी: यह प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA) के कार्यालय के तहत भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा संचालित है। 
    • एंकर संस्थान: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वन हेल्थ, नागपुर। 
  • NCDC में 'सेंटर फॉर वन हेल्थ' (CoH): यह भारत में 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है, इससे संबंधित प्रयासों का समन्वय करता है और विशिष्ट कार्यक्रमों (जैसे- रेबीज, जूनोसिस, लेप्टोस्पायरोसिस, और सर्पदंश से संबंधित) का संचालन करता है।
  • वन हेल्थ संयुक्त कार्य योजना (OH JPA): यह 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए चार सदस्यीय गठबंधन (FAO, UNEP, WHO और WOAH) द्वारा तैयार 2022-2026 के लिए एक सहयोगात्मक ढांचा है। 

आगे की राह

  • एकीकृत निगरानी प्रणाली: अलग-अलग मंत्रालयों और राज्यों के बीच रियल-टाइम आधार पर डेटा साझा करने के साथ मानव-पशु-पर्यावरण आधारित रोग पर निगरानी का एकीकृत नेटवर्क विकसित करने की आवश्यकता है।
  • मंत्रालयों के बीच समन्वय: स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, मत्स्य पालन और शहरी विकास मंत्रालयों के बीच स्थायी समन्वय तंत्र का गठन करना चाहिए।
  • अनुसंधान और नवाचार: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जैसे संस्थानों के माध्यम से जूनोटिक रोगों, जलवायु और स्वास्थ्य के बीच के संबंधों और AMR पर बहु-विषयक अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए।
  • समुदाय की भागीदारी: बीमारी के प्रति जागरूकता का प्रसार करने तथा स्वच्छता और पशुधन प्रबंधन प्रणालियों में पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय समुदायों को शामिल करना चाहिए।
  • क्षमता निर्माण: डॉक्टरों, पशु चिकित्सकों, पर्यावरण वैज्ञानिकों और फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए "वन हेल्थ" प्रशिक्षण मॉड्यूल शुरू करना चाहिए। 
  • जलवायु-अनुकूल स्वास्थ्य योजना: वेक्टर-जनित (रोग-वाहक) और जल-जनित बीमारियों से निपटने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन रणनीतियों में जलवायु अनुकूलन उपायों को एकीकृत करना चाहिए।
  • जैव विविधता संरक्षण: मानव-वन्यजीव संघर्ष और बीमारियों के प्रसार को कम करने के लिए वृक्षारोपण, पर्यावास पुनर्बहाली और संधारणीय भूमि-उपयोग योजना को बढ़ावा देना चाहिए। 
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: तकनीकी सहायता और सर्वोत्तम प्रणालियों को अपनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) जैसी वैश्विक संस्थाओं के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए। 

निष्कर्ष

वन हेल्थ दृष्टिकोण यह मानता है कि मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इसलिए नई महामारियों, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता ह्रास के इस दौर में सामूहिक प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं। एक सुदृढ़ और  सतत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण के लिए एकीकृत निगरानी, संस्थाओं के मध्य समन्वय और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करना बहुत महत्वपूर्ण होगा।

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प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (Principal Scientific Adviser) - भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सरकार को सलाह देते हैं।

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