निगमित सेवा क्षेत्र उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण (ASISSE) | Current Affairs | Vision IAS

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संक्षिप्त समाचार

22 May 2026

In Summary

  • एनएसओ ने वित्त वर्ष 2024-25 के लिए निगमित सेवा क्षेत्र उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण (एएसआईएसएसई) शुरू किया।
  • ASISSE, कंपनी अधिनियम/एलएलपी अधिनियम के तहत पंजीकृत निगमित सेवा उद्यमों को कवर करता है और नीति निर्माण के लिए GSTN डेटा का उपयोग करता है।
  • यह व्यापक गैर-कृषि आर्थिक आंकड़ों के लिए एएसआई और एएसयूएसई का पूरक है।

In Summary

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने सेवा क्षेत्रक के निगमित उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण (ASISSE) का कार्य शुरू किया है।

ASISSE के बारे में:

  • यह सभी राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्रों में निगमित सेवा उद्यमों को शामिल करने वाला पहला वार्षिक सर्वेक्षण है (संदर्भ वर्ष: वित्तीय वर्ष 2024-25)। 
  • शामिल उद्यम: कंपनी अधिनियम, 1956 या कंपनी अधिनियम, 2013 अथवा सीमित देयता भागीदारी अधिनियम, 2008 के अंतर्गत पंजीकृत सेवा क्षेत्रक के निगमित उद्यम। 
    • शामिल क्षेत्रक: व्यापार, परिवहन, IT, स्वास्थ्य, शिक्षा और हॉस्पिटैलिटी। 
  • उद्देश्य: नीति निर्धारण और आर्थिक विश्लेषण के लिए विश्वसनीय डेटाबेस तैयार करना। 
  • यह सर्वेक्षण डेटा संग्रह के लिए वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GSTN) डेटाबेस का उपयोग करता है। लगभग 1.21 लाख उद्यमों का सर्वेक्षण किया गया।  
  • यह सर्वेक्षण गैर-कृषि अर्थव्यवस्था के समग्र क्षेत्रक के डेटा प्राप्त करने के लिए ASI (उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण) और ASUSE (असंगठित क्षेत्र के उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण) के पूरक के रूप में कार्य करेगा।

आयकर अधिनियम, 2025 को छह दशक पुराने आयकर अधिनियम, 1961 के स्थान पर लागू किया गया है। इस नए अधिनियम के निम्नलिखित उद्देश्य हैं;

  • कर प्रणाली में पूर्वानुमेयता (प्रिडिक्टिबिलिटी) और पारदर्शिता बढ़ाना, 
  • नियमों के अनुपालन का बोझ कम करना, तथा 
  • करदाताओं को आयकर रिटर्न दाखिल करने की सरल और सुव्यवस्थित प्रक्रिया प्रदान करना।

आयकर अधिनियम 2025 के प्रमुख प्रावधान

  • सरल भाषा और ढांचा: अधिनियम में धाराओं की संख्या 819 की जगह 536 रह गई है जबकि आवेदनों यानी फॉर्म्स की संख्या 390 से कम होकर 190 रह गई है।
  • न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) और वैकल्पिक न्यूनतम कर (AMT) के प्रावधानों को दो उप-खंडों में विभाजित किया गया है।
    • न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT): इसका उद्देश्य ऐसी कंपनियों को भी टैक्स के दायरे में लाना है, जो अच्छा मुनाफा और लाभांश (डिविडेंड) कमाने के बावजूद अलग-अलग कर छूट और रियायतों की वजह से कोई टैक्स नहीं देती थीं।
    • वैकल्पिक न्यूनतम कर (AMT): इसके प्रावधान MAT जैसे ही होते हैं, लेकिन ये कर गैर-कॉर्पोरेट करदाताओं (जैसे व्यक्ति, साझेदारी फर्म आदि) पर लागू होते हैं।
      • न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) के प्रावधान केवल कॉर्पोरेट करदाताओं पर लागू होते हैं।
  • "कर वर्ष (टैक्स ईयर)" की अवधारणा: पहले की अलग-अलग वित्तीय वर्ष (FY) और आकलन वर्ष (Assessment Year: AY) की अवधारणाओं को मिलाकर एकीकृत शब्द “कर वर्ष (टैक्स ईयर)” कर दिया गया है।
  • आयकर के मूल तत्वों में स्थिरता:
    • व्यक्तियों और कंपनियों के लिए कर दरों और संरचनाओं में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
    • अपराध और दंड से संबंधित प्रावधानों में भी कोई परिवर्तन नहीं है।
    • अधिकतर परिभाषाओं को यथावत रखा गया है।
    • सूचना संग्रह और कर आकलन की प्रक्रिया को फेसलेस बनाया गया है।
  • अघोषित आय (Undisclosed Income): आयकर छापों से जुड़े मामलों के आकलन के लिए अघोषित आय की परिभाषा में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को भी शामिल कर दिया गया है। पहले इसमें नकद, सोना-चांदी (बुलियन), आभूषण या अन्य कीमती वस्तुएं शामिल थीं। 
  • वर्चुअल डिजिटल स्पेस तक पहुंच: अब आयकर अधिकारियों को तलाशी और जब्ती की कार्यवाही के दौरान वर्चुअल डिजिटल स्पेस तक पहुंच की अनुमति है।
    • “वर्चुअल डिजिटल स्पेस” में ईमेल सर्वर, सोशल मीडिया अकाउंट, ऑनलाइन निवेश और ट्रेडिंग अकाउंट तथा संपत्ति स्वामित्व से संबंधित विवरण रखने वाली वेबसाइट्स शामिल हैं।

हाल ही में भारत ने आयकर अधिनियम, 2025 के तहत आयकर नियम, 2026 में संशोधन किया है। यह 1 अप्रैल 2017 से पहले किए गए निवेशों को GAAR से बाहर रखने के लिए किया गया है। 

  • इससे ग्रैंडफादरिंग को लेकर चल रही अस्पष्टता दूर हो गई है।
    • ग्रैंडफादरिंग से निवेशों को पुराने कर नियमों का लाभ मिलता है। यह बाद के बदलावों के बावजूद निर्दिष्ट तिथि से पहले के निवेशों पर लागू होती है।  

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक का बैंकिंग लाइसेंस रद्द किया।

  • RBI के अनुसार, पेटीएम पेमेंट्स बैंक ‘बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949’ के तहत 'पेमेंट्स बैंकों के लिए लाइसेंसिंग दिशा-निर्देश' का अनुपालन करने में विफल रहा।

पेमेंट्स बैंक के बारे में

  • अवधारणा: नचिकेत मोर समिति ने 2014 में वित्तीय समावेशन को बढ़ाने हेतु "पेमेंट्स बैंक" स्थापित करने की सिफारिश की थी।
  • परिभाषा: पेमेंट बैंक एक ऐसा वित्तीय संस्थान होता है जिसे छोटे स्तर पर कार्य करने और कम जोखिम (खासकर लोन न देने के कारण) के लिए स्थापित किया जाता है। इसे  डिफरेंशिएटेड बैंकिंग लाइसेंस (DBL) के तहत स्थापित किया जाता है।
    • डिफरेंशिएटेड बैंकिंग लाइसेंस (DBL) विशेष प्रकार के लाइसेंस होता है जिनका उद्देश्य अलग-अलग ग्राहक समूहों की जरूरतों को पूरा करना है।
      • DBL के तहत अन्य संस्थान: लघु वित्त बैंक (Small Finance Banks)।
  • उद्देश्य: पेमेंट्स बैंकों का मुख्य उद्देश्य वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना है, यानी उन लोगों तक बैंकिंग सेवाएं पहुँचाना जो अभी तक बैंकिंग प्रणाली से बाहर हैं या कम सेवाएं प्राप्त कर रहे हैं। जैसे कि-अप्रवासी मजदूर, कम आय वाले परिवार, आदि। 
    • लाभ: डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना, छोटे लेनदेन के लिए सुरक्षित विकल्प प्रदान करना और नकदी पर निर्भरता कम करना।
  • विनियामक ढांचा:
    • पंजीकरण: कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत।
    • गवर्नेंस: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949; आरबीआई अधिनियम, 1934; विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999; भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 द्वारा।
  • पूंजी आवश्यकता: न्यूनतम चुकता पूंजी (Paid-up capital) 100 करोड़ रुपये होनी चाहिए। 
    • पहले पांच वर्षों के लिए प्रमोटरों की हिस्सेदारी 40% या इससे अधिक होनी चाहिए।
  • फंड निवेश: पेमेंट बैंकों को अपने डिमांड डिपॉजिट का कम से कम 75% हिस्सा वैधानिक तरलता अनुपात (SLR)-पात्र सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना होता है। शेष 25% राशि को अन्य निर्धारित वाणिज्यिक बैंकों में जमा के रूप में रखना होता है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों को रुपये में नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव्स अनुबंधों से प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया है। 

नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव्स के बारे में: 

  • यह एक डेरिवेटिव अनुबंध है, जहां दो पक्ष रुपये के लिए भविष्य की विनिमय दर पर सहमत होते हैं। हालांकि, वे अंतर का निपटान नकद में करते हैं, जो आमतौर पर अमेरिकी डॉलर में होता है।
  • ये व्यापार RBI के नियंत्रण से बाहर, ऑफशोर होते हैं। 
  • इन्हें उन प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित किया गया था, जिन्होंने ऑनशोर बाजारों तक पहुंच को बाधित किया था। इनका व्यापक रूप से उन विदेशी निवेशकों, हेज फंडों और वैश्विक बैंकों द्वारा उपयोग किया जाता है, जो भारतीय रुपया बाजार तक स्वतंत्र रूप से नहीं पहुंच सकते।

हाल ही में, एक निजी बैंक ने एडिशनल टियर-1 (AT-1) बॉण्ड की कथित गलत बिक्री में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की है।

AT-1 बॉण्ड के बारे में

  • यह बैंकों द्वारा अपने पूंजी आधार को बढ़ाने के लिए जारी किया जाने वाला एक प्रकार का ऋण लिखत होता है।
  • प्रमुख विशेषताएं:
    • शाश्वत (Perpetual): एक निश्चित परिपक्वता अवधि वाले नियमित बॉण्ड (सरकारी, कॉर्पोरेट आदि) के विपरीत, AT-1 बॉण्ड की कोई परिपक्वता अवधि नहीं होती है।
    • इक्विटी में परिवर्तनीय: वित्तीय संकट की स्थिति में इन्हें इक्विटी (शेयर) में बदला जा सकता है।
    • उच्च जोखिम, उच्च प्रतिफल (High Risk, High Reward): उच्च जोखिम वाले बॉण्ड होने के कारण, ये पारंपरिक बॉण्ड की तुलना में उच्च ब्याज दर प्रदान करते हैं।
  • जारीकर्ता: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के निर्देश पर बैंकों द्वारा।

RBI ने भारतीय रुपये में बैंकों की NOP पर एक सीमा लगाई है। इसे प्रत्येक कारोबारी दिन के अंत में 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दिया गया है।

  • पहले यह सीमा बैंक की कुल पूंजी का 25% थी, जो अब काफी कम कर दी गई है।

‘नेट ओपन पोजीशन’ के बारे में:

  • यह बैंक की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों और देनदारियों के बीच के अंतर को दर्शाता है। 
    • यह मुद्रा के उतार-चढ़ाव के प्रति बैंक के जोखिम की सीमा को दर्शाता है। उच्च NOP, मुद्रा पर अधिक जोखिम का संकेत है। 

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा ऋण में निवेश और क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप की बिक्री की सीमाएं अधिसूचित की है। 

  • सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs), राज्य सरकार की प्रतिभूतियों (SGSs) और कॉरपोरेट बॉण्ड में FPI द्वारा निवेश की सीमाएं अपरिवर्तित बनी हुई हैं।

क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप के बारे में:

  • परिभाषा: यह एक वित्तीय डेरिवेटिव लिखत है। यह किसी निवेशक को अपने क्रेडिट जोखिम को दूसरे निवेशक के साथ स्वैप (अदला-बदली) या ऑफसेट करने की अनुमति देता है।
  • कार्यप्रणाली: यह बॉण्ड में निवेश पर बीमा की तरह कार्य करता है। इसमें खरीदार नियमित प्रीमियम का भुगतान करता है और चूक (डिफॉल्ट) या पुनर्गठन की स्थिति में विक्रेता भुगतान करता है। 
  • उपयोग: इसका उपयोग हेजिंग, सट्टेबाजी और आर्बिट्राज तथा क्रेडिट जोखिम प्रबंधन के लिए किया जाता है। 
  • जोखिम: काउंटरपार्टी से जुड़े जोखिम और जटिलता।

भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने बीमा क्षेत्रक के लिए Ind AS आधारित वित्तीय रिपोर्टिंग ढांचा पेश किया है। 

  • इसका उद्देश्य भारतीय बीमा क्षेत्रक को विश्व स्तर पर स्वीकृत मानकों के अनुरूप करना है।
  • यह जीवन, सामान्य, स्वास्थ्य बीमाकर्ताओं और पुनर्बीमाकर्ताओं सहित सभी श्रेणियों पर लागू होता है। 

Ind AS ढांचे के बारे में:

  • परिचय: ये भारत में स्थानीय लेखांकन प्रणालियों को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानकों (IFRS) के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए लागू किए गए मानक हैं।
  • प्राथमिक लक्ष्य: भारतीय कंपनियों द्वारा तैयार किए गए वित्तीय विवरणों को वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कराना सुगम बनाना, पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाना। 
  • कार्यान्वयन: इसे कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) द्वारा कार्यान्वित किया जाता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने पेटेंट वाली दवाओं और संबंधित सामग्रियों के आयात पर 100% एड वेलोरम शुल्क लगाने की घोषणा की है। 

  • इसमें "वर्तमान की" जेनेरिक दवाएं शामिल नहीं होंगी। इसलिए भारत पर इसका सीमित प्रभाव पड़ेगा। 
  • अमेरिका भारतीय दवा निर्यात का सबसे बड़ा बाजार है। इसकी कुल हिस्सेदारी लगभग 40% है। 

एड वेलोरम शुल्क के बारे में: 

  • एड वेलोरम टैरिफ एक प्रकार का सीमा शुल्क है। इसकी गणना आयातित वस्तुओं के कुल मूल्य के प्रतिशत के रूप में की जाती है। 
  • यह निश्चित शुल्क वाले टैरिफ के विपरीत है जो वजन या मात्रा पर आधारित होते हैं। ये टैरिफ उत्पाद के घोषित मूल्य के आधार पर घटते-बढ़ते रहते हैं।
  • इन टैरिफों का उपयोग व्यापार को विनियमित करने, घरेलू उद्योगों की रक्षा करने और सरकारी राजस्व उत्पन्न करने के लिए व्यापक रूप से किया जाता है।

‘फंड ऑफ फंड्स 2.0’ वर्ष 2016 में स्टार्टअप इंडिया कार्य योजना के तहत शुरू की गई ‘स्टार्टअप्स के लिए फंड ऑफ फंड्स 1.0 (FFS 1.0)’ योजना पर आधारित है। यह विभिन्न चरणों और क्षेत्रकों के स्टार्टअप्स के लिए वेंचर कैपिटल (VC) प्राप्त करना सक्षम बनाता है।

  • वेंचर कैपिटल (VC) शुरुआती चरण का इक्विटी वित्तपोषण है, जो उच्च विकास की क्षमता वाले स्टार्टअप्स को सक्रिय मार्गदर्शन के साथ प्रदान किया जाता है।

स्टार्टअप्स इंडिया FoF 2.0 योजना की मुख्य विशेषताएं

  • कुल कोष: ₹10,000 करोड़
  • मंत्रालय: केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय
  • पात्रता: 16वें और 17वें वित्त आयोग की अवधियों से संबंधित वैकल्पिक निवेश कोष (AIFs)।
    • वैकल्पिक निवेश कोष ऐसे निजी निवेश कोष हैं जो समझदार और बड़े निवेशकों (भारतीय या विदेशी) से धन जुटाते हैं और उस धन को तय की गई निवेश नीति के अनुसार अलग-अलग जगहों पर निवेश करते हैं।
  • संरचना: यह योजना भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) में पंजीकृत AIFs के फंड में योगदान देगी, ताकि वे ‘स्टार्टअप्स’ के शेयर (इक्विटी) और उनसे जुड़े निवेश साधनों में पैसा लगा सकें।
  • योजना के लिए AIFs की चयन प्रक्रिया: स्टार्टअप प्रणाली के अनुभवी सदस्यों से बनी वेंचर कैपिटल निवेश समिति (VCIC) द्वारा स्क्रीनिंग की जाएगी। 
  • निगरानी और शासन: एक ‘अधिकार प्राप्त समिति (EC)’ द्वारा, जिसकी अध्यक्षता उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) के सचिव करेंगे।
  • कार्यान्वयन: भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI)। SIDBI स्टार्टअप्स के लिए फंड ऑफ फंड्स 1.0 की कार्यान्वयन एजेंसी भी है।
    • इसके अतिरिक्त, कार्यान्वयन के लिए अन्य घरेलू कार्यान्वयन एजेंसी/एजेंसियों का भी चयन किया जाएगा।
  • AIFs के कार्यक्षेत्र के आधार पर सहायता:  
    • डीप टेक का समर्थन करने वाले AIF: इसके तहत ऐसे स्टार्टअप्स को सहायता दी जाएगी जो जटिल समस्याओं के नए समाधान विकसित करते हैं, जिनमें अधिक समय, शोध और खर्च की आवश्यकता है।
    • लघु AIF (माइक्रो VC/वेंचर कैपिटलिस्ट): शुरुआती विकास चरण के स्टार्टअप्स को सहायता दी जाएगी। 
    • प्रौद्योगिकी-संचालित नवाचारी विनिर्माण स्टार्टअप का समर्थन करने वाले AIF: इसमें “मेक इन इंडिया” के तहत विनिर्माण-उन्मुख चैंपियन क्षेत्रक के स्टार्टअप्स को सहायता दी जाएगी। ।
    • ऐसे AIFs को सहायता दी जाएगी जो किसी एक क्षेत्रक या चरण तक सीमित नहीं होते, बल्कि हर तरह के स्टार्टअप्स में निवेश कर सकते हैं।

पश्चिमी समर्पित माल-ढुलाई गलियारा (WDFC) 1,506 किमी लंबी परियोजना है। यह परियोजना उत्तर प्रदेश के दादरी को महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट टर्मिनल (JNPT) से जोड़ती है।

समर्पित माल-ढुलाई गलियारा (DFC) के बारे में

  • शुरुआत: इस परियोजना की परिकल्पना 2005 में की गई थी। इसका उद्देश्य केवल माल ढुलाई के लिए विशेष रेलवे लाइनों का निर्माण करना है।
  • दो DFCs: पूर्वी समर्पित माल-ढुलाई गलियारा (EDFC) और पश्चिमी समर्पित माल-ढुलाई गलियारा (WDFC) परियोजनाओं को 2008 में मंजूरी दी गई थी।
    • EDFC: लुधियाना (पंजाब) से सोननगर (बिहार) तक, जिसकी लंबाई 1337 किलोमीटर है।
      • उपर्युक्त दोनों गलियारों के साथ, रेल मंत्रालय ने तीन नए DFC के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट पर कार्य शुरू किया है। वर्तमान में ये परियोजनाएं विचाराधीन हैं। ये हैं:
  • ईस्ट-कोस्ट कॉरिडोर: खड़गपुर से विजयवाड़ा तक।
  • ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर: 
    • पालघर-भुसावल-नागपुर-खड़गपुर-दनकुनी
    • राजखरसावां-कालीपहाड़ी-अंडाल।
      • उत्तर-दक्षिण उप-कॉरिडोर: विजयवाड़ा-नागपुर-इटारसी।
  • DFCCIL: 2006 में स्थापित ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (DFCCIL)’ रेल मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत एक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) है।
    • यह DFC के योजना-निर्माण, विकास, वित्तीय संसाधनों को जुटाने, निर्माण, रखरखाव और संचालन का कार्य करता है।

समर्पित माल-ढुलाई गलियारा का महत्व

  • भीड़भाड़ में कमी: यात्री और माल-ढुलाई यातायात सम्मिलित रूप से रेल परिचालन की दक्षता को प्रभावित करते हैं। DFC इस समस्या को दूर कर सकता है।
  • ट्रेन की गति और माल ढुलाई उत्पादकता में वृद्धि: इन गलियारों को 100 किमी/घंटा तक की गति से चलने वाली उच्च क्षमता वाली मालगाड़ियों के संचालन के लिए तैयार किया गया है।
  • लॉजिस्टिक्स लागत में कमी: भीड़भाड़, देरी और अनिश्चित पारगमन समय उद्योगों के लिए लागत बढ़ाते हैं। DFC इस लागत को कम कर सकता है।
  • स्वच्छ और सुरक्षित परिवहन: संपूर्ण DFC नेटवर्क पूरी तरह से विद्युतीकृत है। इसलिए वस्तुओं की आवाजाही को सड़क मार्ग से रेल मार्ग पर स्थानांतरित करने से उत्सर्जन कम होगा।
  • अवसंरचना विकास के राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूपसमर्पित माल-ढुलाई गलियारा वर्ष 2030 तक भविष्य के लिए तैयार रेल नेटवर्क बनाने की राष्ट्रीय रेल योजना का एक महत्वपूर्ण घटक है। 

केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) ने ‘अर्बन चैलेंज फंड (UCF)’ के परिचालन हेतु दिशा-निर्देश जारी किए।

  • अर्बन चैलेंज फंड के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ, क्रेडिट पुनर्भुगतान गारंटी उप-योजना (CRGSS) के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं।
  • अर्बन चैलेंज फंड का उद्देश्य बेहतर शहरी अवसंरचनाओं के विकास के लिए बाजार से धन जुटानानिजी भागीदारी बढ़ाना और नागरिक-केंद्रित सुधार करना है। 

अर्बन चैलेंज फंड (UCF) के बारे में

  • योजना का प्रकार: केंद्र प्रायोजित योजना।
  • आवंटित निधि: ₹1 लाख करोड़ (यह अगले पांच वर्षों में ₹4 लाख करोड़ के कुल निवेश की सुविधा प्रदान करेगा)।
  • वित्तपोषण प्रणाली:
    • परियोजना लागत का 25% अर्बन चैलेंज फंड के माध्यम से प्रदान किया जाएगा।
    • कम से कम 50% वित्त बाजार स्रोतों से जुटाया जाना चाहिए, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
  • शेष 25% वित्तपोषण राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों/शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) द्वारा किया जा सकता है या बाजार से जुटाया जा सकता है।
  • ध्यान देने योग्य मुख्य क्षेत्र: 'शहरों का रचनात्मक विकास', 'विकास केंद्रों के रूप में शहर' और 'जल एवं स्वच्छता'।
  • पात्र शहर:
    • 10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले सभी शहर (2025 के अनुमान)।
    • राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों की वे सभी राजधानियां जो उपर्युक्त श्रेणी में शामिल नहीं हैं।
  • 1 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले प्रमुख औद्योगिक शहर।
  • कार्यान्वयन अवधि: वित्तीय वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक (योजना अवधि बढ़ाई जा सकती है)।
  • अमृत 2.0/ स्वच्छ भारत मिशन (SBM) 2.0/ अन्य केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत पहले से वित्तपोषित परियोजनाएं इस फंड के तहत वित्तपोषण प्राप्त करने के लिए पात्र नहीं हैं

UCF के कार्यान्वयन के मार्गदर्शक सिद्धांत

  • बाजार-आधारित वित्तपोषण: राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए अधिक धन बाजार से जुटाया जाएगा, केंद्र का योगदान सीमित रहेगा।
  • चैलेंज के आधार पर शहरों का चयन: परियोजनाओं का चयन प्रतिस्पर्धा के आधार पर होगा जिसमें परियोजना के प्रभाव और सुधारों का ध्यान रखा जाएगा।
  • सुधार-के आधार पर वित्तपोषण: फंड तभी जारी किया जाएगा जब शासन, वित्त और नियोजन के स्तर पर सुधार किए जाएंगे।
  • परिणाम-आधारित दृष्टिकोण: वित्तीय सहायता को कार्य के प्रदर्शन, तय लक्ष्यों और स्पष्ट रूप से मापे जा सकने वाले परिणामों से जोड़ा गया है।

क्रेडिट पुनर्भुगतान गारंटी उप-योजना (CRGSS) के बारे में

  • यह योजना शहरी स्थानीय निकायों (ULBs), विशेष रूप से छोटे शहरों को क्रेडिट गारंटी के माध्यम से बाजार से वित्त जुटाने में सक्षम बनाती है।
  • लक्षित लाभार्थी: टियर-II, टियर-III शहर, और पूर्वोत्तर एवं पहाड़ी क्षेत्रों के शहर।
  • इस योजना के तहत केंद्र सरकार पहली बार ऋण लेने वाले शहरों को ₹7 करोड़ तक या ऋण राशि के 70 प्रतिशत (जो भी कम हो) की गारंटी प्रदान करेगी।

 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना-III (PMGSY-III) को मार्च 2028 तक जारी रखने की मंजूरी दी।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) की मुख्य विशेषताएं:

  • शुरुआत: 25 दिसंबर, 2000 को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत एक प्रमुख केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में।
  • उद्देश्य: असंबद्ध ग्रामीण बस्तियों को बारहमासी सड़कों से जोड़कर निर्धनता कम करना।  इसके लिए जनसंख्या मानक इस प्रकार हैं: 
    • मैदानी क्षेत्रों में 500 या उससे अधिक की आबादी वाली ग्रामीण बस्ती।
  • विशेष श्रेणी के क्षेत्रों (जैसे पूर्वोत्तर राज्य, हिमालयी राज्य, रेगिस्तानी क्षेत्र और चुनिंदा पिछड़े जिले) में 250 या उससे अधिक की आबादी
  • योजना के प्रमुख चरण:
    • PMGSY-चरण I (2000): पात्र असंबद्ध (सड़क से नहीं जुड़ी) बस्तियों को प्रारंभिक बारहमासी सड़क संपर्क प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
    • PMGSY-चरण II (2013): इस चरण में ध्यान नई सड़कें बनाने से हटाकर मौजूदा ग्रामीण सड़कों के सुधार (अपग्रेडेशन) पर दिया गया। इसका लक्ष्य 50,000 किलोमीटर लंबी ग्रामीण सड़क नेटवर्क को बेहतर बनाना था, ताकि परिवहन की दक्षता बढ़े और आर्थिक केंद्रों को बेहतर तरीके से जोड़ा जा सके
      • वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सड़क निर्माण (2016): वामपंथी उग्रवाद से गंभीर रूप से प्रभावित नौ राज्यों के 44 जिलों को लक्षित किया गया ताकि सामाजिक-आर्थिक विकास सुनिश्चित हो तथा सुरक्षा बलों के आवागमन और तैनाती को सुगम बनाया जा सके।
    • PMGSY-चरण III (2019): गांवों को सीधे ग्रामीण कृषि बाजारों, उच्च माध्यमिक विद्यालयों और अस्पतालों से जोड़ने के लिए 1,25,000 किलोमीटर के मुख्य मार्गों और प्रमुख ग्रामीण संपर्कों में सुधार का लक्ष्य रखा गया।
      • विस्तार: इस चरण को अब मार्च 2025 से बढ़ाकर मार्च 2028 तक कर दिया गया है।
    • PMGSY-चरण IV (2024-25 से 2028-29): पूर्व में असंबद्ध 25,000 बस्तियों को जोड़ने के लिए अतिरिक्त 62,500 किलोमीटर सड़कों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है।

"भारत में भूमि असमानता: प्रकृति, इतिहास और बाजार" शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में भारत के दस प्रमुख राज्यों का डेटा शामिल है। इन दस राज्यों में भारत की 75% ग्रामीण आबादी बसती है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

  • अत्यधिक संपत्ति संकेंद्रण: शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास कुल भूमि-क्षेत्र का 44% हिस्सा है।
  • व्यापक भूमिहीनता: भारत के लगभग 46% ग्रामीण परिवार पूरी तरह से भूमिहीन हैं।
  • ग्राम-स्तरीय भूमि गिनी गुणांक: यह 71.1 के अत्यधिक उच्च स्तर पर है।
  • बड़े भूस्वामी: एक औसत गांव में सबसे बड़े भूस्वामी के नियंत्रण में गांव की लगभग 12.4% भूमि है।
  • क्षेत्रीय आधार पर असमानताएं:
    • सर्वाधिक असमानता: केरल में (भूमि गिनी गुणांक 90)।
    • न्यूनतम असमानता: कर्नाटक और राजस्थान में (भूमि गिनी गुणांक 65 से नीचे)।
    • भूमिहीनता की दर: पंजाब में सर्वाधिक (73%)।

भारत में भूमि असमानता के मुख्य कारक

  • उच्च उत्पादकता: उच्च उत्पादकता बड़े भू-जोतों के विस्तार में मदद करती है और भूमिहीनता को बढ़ावा देती है।
  • इतिहास:
    • औपनिवेशिक काल: पूर्व में ब्रिटिश ज़मींदारी व्यवस्था के अधीन रहे क्षेत्रों में "रियासतों" (देशी राज्यों) की तुलना में अधिक असमानता देखी जाती है।
    • सामाजिक स्तरीकरण: जिन गांवों में अनुसूचित जाति (SC) की आबादी अधिक है, वहाँ ऐतिहासिक भूमिहीनता के कारण अधिक असमानता देखी जाती है।
  • बाजार (आर्थिक एकीकरण): कस्बों, प्रमुख राजमार्गों, रेलवे, बैंकों और कृषि मंडियों जैसे आर्थिक केंद्रों से निकटता उच्च भूमि असमानता से जुड़ी है।
    • आर्थिक एकीकरण खेती की तुलना में गैर-कृषि कार्यों से आय में बदलाव लाता है। इससे लघु कृषकों को लगता है कि उनकी लघु आकार और कम लाभ वाली जमीन बेकार है, इसलिए वे उसे बड़े भू स्वामियों को बेचने के लिए प्रेरित हो जाते हैं।

हाल ही में, विकासशील देशों ने IMF-विश्व बैंक स्प्रिंग मीटिंग्स 2026 में पहली बार 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' शुरू किया।

बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म के बारे में:

  • उद्देश्य: यह पीयर लर्निंग और ऋण प्रबंधन क्षमता निर्माण के लिए एक समर्पित मंच है। यह संप्रभु ऋण समझौतों में उधार लेने वालों की आवाज को मजबूत करने का कार्य करता है।  
    • यह ऋण पुनर्गठन मंच नहीं है। 
  • सदस्य: 30 संस्थापक सदस्य (भारत सहित); अध्यक्ष- मिस्र। 
  • सचिवालय: संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास (UNCTAD)। 
  • महत्व: यह उन उधार-लेने वालों को एक औपचारिक समन्वय तंत्र प्रदान करता है जिनका विदेशी ऋण 2024 में 11.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। 
    • संप्रभु ऋण समझौतों पर लंबे समय से ऋणदाता के नेतृत्व वाले तंत्रों का प्रभुत्व रहा है। पेरिस क्लब इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

मंत्रिस्तरीय सम्मेलन WTO में सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है। यह सम्मेलन वैश्विक व्यापार नियमों पर निर्णय लेने के लिए प्रत्येक दो वर्षों में आयोजित होता है।

MC14 में लिए गए प्रमुख निर्णय

  • लघु अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण: सदस्य देशों के प्रतिनिधि मंत्रियों ने लघु अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक व्यापार प्रणाली में बेहतर तरीके से एकीकृत करने पर सहमति जताई।
  • विशेष एवं विभेदक व्यवहार (Special & Differential Treatment: S&DT) सिद्धांत को मजबूत करना:  सैनिटरी और फाइटो-सैनिटरी (SPS) उपायों तथा व्यापार में तकनीकी बाधाओं (TBT) पर समझौतों में S&DT के प्रावधानों के कार्यान्वयन को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
    • सैनिटरी और फाइटो-सैनिटरी समझौता खाद्य पदार्थों की सुरक्षा (फूड सेफ्टी) तथा पशु और पादपों के स्वास्थ्य मानकों के लिए मूलभूत नियम निर्धारित करता है।
      • सैनिटरी (मानव और पशु स्वास्थ्य) तथा फाइटोसैनिटरी (पादप स्वास्थ्य) उपाय घरेलू स्तर यानी देश में उत्पादित खाद्य पदार्थ या स्थानीय पशु एवं पादप की बीमारियों पर लागू होते हैं। साथ ही ये उपाय अन्य देशों से आने वाले उत्पादों पर भी लागू होते हैं।
    •  व्यापार में तकनीकी बाधाओं (TBT) पर समझौते का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी विनियम, मानक और अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाएं भेदभावपूर्ण न हों और व्यापार में अनावश्यक बाधाएं उत्पन्न न करें।
  • मात्स्यिकी सब्सिडी पर समझौता वार्ता: सदस्य देशों के मंत्रियों ने मात्स्यिकी सब्सिडी पर व्यापक नियम तैयार करने के लिए 15वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC15) तक वार्ता जारी रखने पर सहमति व्यक्त की।

14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में लंबित  प्रमुख मुद्दे

  • ई-कॉमर्स मोरेटोरियम: इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के हस्तांतरण पर ‘सीमा शुल्क लगाने पर रोक’ से संबंधित समझौते को आगे बढ़ाने पर चर्चा जारी है।
    • भारत ने इस रोक को आगे बढ़ाने का विरोध किया, क्योंकि इससे राजस्व में लगभग 1 अरब डॉलर वार्षिक की हानि होती है और यह समझौता  विकसित देशों के पक्ष में झुका हुआ है।
  • विकास हेतु निवेश सुविधा (Investment Facilitation for Development: IFD): इस प्रस्ताव का उद्देश्य IFD को WTO फ्रेमवर्क में 'एनेक्स 4' समझौते के रूप में शामिल करना है। 
    • एनेक्स 4 में प्लूरिटेरल व्यापार समझौते शामिल हैं जो WTO के केवल उन सदस्यों पर बाध्यकारी हैं जिन्होंने उन्हें स्वीकार किया है
    • IFD  'सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (Most-Favoured-Nation: MFN) दर्जे पर आधारित है। इसका उद्देश्य IFD के पक्षकार देशों के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को सुगम बनाना है। WTO के सभी सदस्य इसके सदस्य बन सकते हैं।
    • भारत ने IFD को WTO फ्रेमवर्क में शामिल करने का विरोध किया, क्योंकि इससे WTO की कार्यात्मक सीमाएं और सर्वसम्मति-आधारित निर्णय प्रक्रिया कमजोर हो सकती है।

UN-ESCAP द्वारा 'एशिया और प्रशांत का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण 2026' रिपोर्ट जारी की गई है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  • अनुमान: इस वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर 6.4% (2025 में 7.4% के बाद) और 2027 में 6.6% रहने का अनुमान है। 

UN-ESCAP के बारे में

  • मुख्यालय: बैंकॉक (थाईलैंड)
  • यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक अंतर-सरकारी मंच है। 
  • स्थापना: इसकी स्थापना 1947 में एशिया और सुदूर पूर्व के लिए आर्थिक आयोग (ECAFE) के रूप में हुई थी। 
  • मूल निकाय: यह संयुक्त राष्ट्र के 5 क्षेत्रीय आयोगों में से एक है और आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) को रिपोर्ट करता है।
  • सदस्यता: इसमें 53 सदस्य देश और 9 एसोसिएट सदस्य शामिल हैं।
    • इसमें एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बाहर के देश भी शामिल हैं। उदाहरण के लिए, UK और फ्रांस जैसे देश।
    • भारत इसका संस्थापक सदस्य है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी नवीनतम WEO रिपोर्ट में वित्त वर्ष 27 के लिए भारत के GDP संवृद्धि पूर्वानुमान को थोड़ा बढ़ाकर 6.5% कर दिया है। 

  • वैश्विक संवृद्धि दर कम होकर 2026 में 3.1% और 2027 में 3.2% रहने का अनुमान है। 
  • भारत मौद्रिक (नॉमिनल) GDP के संदर्भ में विश्व की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं से बाहर होकर छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। प्रथम स्थान पर अमेरिका, चीन, जर्मनी, जापान और यूके हैं।

WEO के बारे में:

  • यह निकट और मध्यम अवधि में विश्व अर्थव्यवस्था का विश्लेषण और अनुमान प्रस्तुत करता है। 
  • यह वर्ष में दो बार प्रकाशित होता है और इसके बीच में अपडेट जारी किए जाते हैं।
  • IMF द्वारा प्रकाशित अन्य रिपोर्ट्स: ग्लोबल फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट, फिस्कल मॉनिटर।

मध्य पूर्व के तनाव के बीच उच्च ऊर्जा लागत के कारण मार्च 2026 में खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 128.5 अंक हो गया। 

FAO-खाद्य मूल्य सूचकांक:

  • यह खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा प्रकाशित एक माप है। यह खाद्य वस्तुओं की एक टोकरी की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में मासिक परिवर्तनों को मापता है।
  • आधार वर्ष: 2014-16
  • संरचना: इसमें पाँच प्रमुख वस्तु (जिंस) समूह शामिल हैं—अनाज, वनस्पति तेल, डेयरी, मांस और चीनी।

KABIL ने अर्जेंटीना में पांच लिथियम ब्लॉकों के डीप एक्सप्लोरेशन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त कर ली है। 

  • लिथियम एक नरम और चांदी जैसी सफेद क्षारीय धातु है और इसका घनत्व सभी धातुओं में सबसे कम है। 
  • अर्जेंटीना, बोलीविया और चिली (लिथियम त्रिकोण) विश्व में 75 प्रतिशत से अधिक लिथियम आपूर्ति करते हैं।

KABIL के बारे में:

  • परिचय: इसकी स्थापना 2019 में हुई थी। यह नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (NALCO), हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) और मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड की एक संयुक्त उद्यम कंपनी है।  
  • यह कंपनी केंद्रीय खान मंत्रालय के तत्वावधान में कार्य करती है।
  • उद्देश्य: यह कंपनी भारत में लिथियम सहित रणनीतिक खनिजों की आपूर्ति के लिए विदेशों में इनके निक्षेप की पहचान, अधिग्रहण, विकास, प्रसंस्करण और व्यावसायिक उपयोग करती है।

केंद्रीय खान मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 'पूंजीगत निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना' (SASCI) के तहत शामिल 5,000 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना शुरू की है।

  • इस प्रोत्साहन योजना का उद्देश्य खदानों के संचालन को सुविधाजनक बनाना और इसमें तेजी लाना, खनिज उत्पादन में वृद्धि करना, राज्यों द्वारा राजस्व संग्रह को बढ़ाना देना और खनन क्षेत्र के समग्र शासन में सुधार करना है।
  • राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को तीन सुधार क्षेत्रों के तहत योजनागत प्रोत्साहन प्रदान की जाती है। ये क्षेत्र हैं;  खनन सुधारों का कार्यान्वयन, खदान संचालन, और राज्य खनन तत्परता सूचकांक (SMRI) आधारित सुधार।

SASCI के बारे में

  • योजना का प्रकार: केंद्रीय क्षेत्रक योजना।
  • संबंधित मंत्रालय: केंद्रीय वित्त मंत्रालय।
  • उद्देश्य: पूंजीगत व्यय के लिए राज्य सरकारों को 50  वर्षों के लिए ब्याज मुक्त ऋण के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान करना।

केंद्रीय संचार मंत्री ने 2026-31 के लिए प्रौद्योगिकी विकास और निवेश संवर्धन (TDIP) योजना के संशोधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। 

  • संशोधित दिशा-निर्देशों ने योजना के दायरे का विस्तार किया है। अब इसमें स्टार्टअप, MSMEs, शिक्षाविदों, अनुसंधान संस्थानों और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को भी शामिल किया गया है। 

TDIP योजना के बारे में:

  • उद्देश्य: इसे भारतीय दूरसंचार संस्थाओं को नवाचार को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक सहायता ढांचे के रूप में डिजाइन किया गया है। इसका लक्ष्य 5G एडवांस्ड और 6G सहित अगली पीढ़ी की दूरसंचार प्रौद्योगिकियों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।
  • कार्यान्वयन एजेंसी: दूरसंचार मानक विकास सोसाइटी, भारत (TSDSI), भारत का दूरसंचार उत्कृष्टता केंद्र (TCoE) और टेलीकम्युनिकेशंस कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड (TCIL)।

पश्चिम एशिया संकट के बीच सरकार ने RELIEF योजना के दायरे का विस्तार किया है। 

RELIEF योजना के बारे में:

  • यह निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) के तहत एक समयबद्ध उपाय है।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य भारतीय निर्यातकों को उच्च माल ढुलाई लागत और बढ़ते बीमा प्रीमियम से निपटने में मदद करना है। इसके साथ ही, यह युद्ध से संबंधित निर्यात जोखिमों में सहायता प्रदान करती है।
  • नोडल और कार्यान्वयन एजेंसी: ECGC लिमिटेड (पूर्व में भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम लिमिटेड), जो पूर्णतः भारत सरकार (वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय) के स्वामित्व में है। 
  • मुख्य विशेषताएं:
    • MSME-केंद्रित सहायता: उच्च लॉजिस्टिक्स लागत और अधिभार के लिए प्रतिपूर्ति सहायता सुनिश्चित करना।
    • निर्यात चक्र कवरेज: शिपमेंट योजना और बीमा आदि के लिए एंड-टू-एंड  सहायता प्रदान करना।

केंद्र सरकार ने RoSCTL योजना को 30 सितंबर, 2026 तक बढ़ाने की घोषणा की है।

योजना के बारे में:

  • प्रारंभ: इसे 2019 में केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया था।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य कपड़ा निर्यात को शून्य-रेटेड (Zero-rate) बनाना है। यह उन सभी राज्य और केंद्रीय करों की छूट देता है जो किसी अन्य योजना के अंतर्गत नहीं आते हैं। 
  • तंत्र: छूट ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप्स के रूप में जारी की जाती है। इन्हें बेचा जा सकता है या सीमा शुल्क भुगतान के लिए उपयोग किया जा सकता है। 
  • लाभ: इसमें लचीलापन, निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार और लागत में कमी शामिल है।

केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय ने ‘विश्व सूत्र –विश्व के लिए भारत के बुनकर’ नामक एक पहल शुरू की है। 

विश्व सूत्र के बारे में

  • यह पहल राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान के सहयोग से विकास आयुक्त (हथकरघा) कार्यालय द्वारा शुरू की गई है। 
  • उद्देश्य: भारतीय हथकरघा को समकालीन वैश्विक डिजाइन ढांचे में प्रस्तुत करना।

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ASUSE (असंगठित क्षेत्र के उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण)

यह सर्वेक्षण भारत के असंगठित क्षेत्र में उद्यमों की आर्थिक गतिविधियों पर डेटा एकत्र करता है। असंगठित क्षेत्र अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह सर्वेक्षण इसके आकार, संरचना और योगदान को समझने में मदद करता है।

ASI (उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण)

यह भारतीय अर्थव्यवस्था के विनिर्माण क्षेत्र के वार्षिक आंकड़ों को एकत्र करने के लिए एक प्रमुख सर्वेक्षण है। यह कारखाना प्रतिष्ठानों के प्रदर्शन, उत्पादकता और अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक मापदंडों पर जानकारी प्रदान करता है।

वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GSTN) डेटाबेस

यह एक सूचना प्रौद्योगिकी अवसंरचना है जो भारत में वस्तुओं और सेवाओं पर कर (GST) के प्रशासन और फाइलिंग की सुविधा प्रदान करती है। ASISSE जैसे सर्वेक्षण इस डेटाबेस का उपयोग डेटा संग्रह के लिए करते हैं, जिससे दक्षता बढ़ती है।

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