खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता (SELF-SUFFICIENCY IN EDIBLE OILS) | Current Affairs | Vision IAS

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खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता (SELF-SUFFICIENCY IN EDIBLE OILS)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • संसदीय समिति की रिपोर्ट में भारत की खाद्य तेल आयात पर 56% निर्भरता को उजागर किया गया है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ रहा है।
  • निर्भरता के कारणों में वर्षा आधारित कृषि पर निर्भरता, उपज में अंतर, प्रसंस्करण की अक्षमताएं और कम बीज प्रतिस्थापन दर शामिल हैं।
  • सिफारिशों में एमएसपी खरीद का विस्तार, ताड़ के तेल को प्रोत्साहन देना, सिंचाई में सुधार और आत्मनिर्भरता के लिए तकनीकी एकीकरण शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

देश में "तिलहन एवं दलहन के उत्पादन तथा उपलब्धता" संबंधी संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट ने खाद्य तेलों पर भारत की उच्च आयात निर्भरता को रेखांकित किया है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। 

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:

  • उच्च आयात हिस्सेदारी: भारत अपनी खाद्य तेल आवश्यकताओं का 56% आयात करता है। वर्ष 2023-24 में भारत ने 15.66 मिलियन मीट्रिक टन खाद्य तेल का आयात किया था।
  • इसमें पाम आयल का योगदान 60%, सोयाबीन तेल का 20% और सूरजमुखी तेल का योगदान 20% है।
  • उत्पादन से अधिक बढ़ता उपभोग: वर्ष 2013-14 से 2022-23 तक प्रत्येक वर्ष के दौरान तिलहन का घरेलू उपभोग हमेशा उनकी घरेलू उपलब्धता से अधिक रहा है।
  • जनसंख्या वृद्धि, बदलते उपभोग प्रतिरूप और बढ़ते शहरीकरण के कारण वर्ष 2000-01 से 2020-21 तक खाद्य तेलों का प्रति व्यक्ति उपभोग दोगुना से अधिक हो गया है।

खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता के कारण

  • वर्षा आधारित कृषि पर अत्यधिक निर्भरता: भारत में 70 प्रतिशत से अधिक तिलहन फसलें वर्षा आधारित क्षेत्रों में उगाई जाती हैं। इससे यह क्षेत्र अनियमित मौसम, हीट वेव तथा संभावित एल-नीनो जैसी परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना रहता है।
  • उत्पादकता में अंतर: भारत की लगभग सभी खाद्य तेल फसलों की उत्पादकता प्रमुख वैश्विक उत्पादक देशों की तुलना में कम है। इसका एक प्रमुख कारण अन्य देशों में उपयोग की जाने वाली आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) तथा शाकनाशी-सहिष्णु किस्मों का अभाव है।
    • उदाहरणार्थ, भारत में मूंगफली की उत्पादकता 2,067 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि उज़्बेकिस्तान में यह 15,519 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है।
  • प्रसंस्करण संबंधी अक्षमताएं : भारतीय वनस्पति तेल उद्योग छोटे स्तर तथा निम्न-प्रौद्योगिकी आधारित संयंत्रों के कारण प्रभावित है।
  • वर्तमान में यह उद्योग अपनी खाद्य तेल शोधन क्षमता का केवल लगभग 30 प्रतिशत ही उपयोग कर पा रहा है।
  • निम्न बीज प्रतिस्थापन दर (SRR): बीज प्रतिस्थापन दर मूंगफली के लिए केवल 25 प्रतिशत से लेकर रेपसीड-सरसों के लिए 62 प्रतिशत तक है। यह सरकार द्वारा निर्धारित 80–85 प्रतिशत के लक्ष्य से बहुत कम है।
  • जैविक एवं अजैविक तनाव: परंपरागत कृषि प्रणालियों में खरपतवार, कीट एवं रोग तिलहन फसलों को निरंतर प्रभावित करते हैं। इससे उत्पादकता में 20 प्रतिशत या उससे अधिक की कमी आती है।

खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए सरकार के प्रयास

  • राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन (NMEO-OS): यह मिशन पारंपरिक तिलहन फसलों की उत्पादकता, बीज गुणवत्ता, प्रसंस्करण तथा बाज़ार संपर्क में सुधार लाने पर केंद्रित है।
  • राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-आयल पाम (NMEO-OP): यह मिशन आयल पाम की कृषि के विस्तार तथा घरेलू कच्चे पाम तेल के उत्पादन में वृद्धि पर केंद्रित है।
  • प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA): इस योजना के अंतर्गत मूल्य समर्थन योजना के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (NAFED) जैसी केंद्रीय नोडल एजेंसियों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर तिलहनों की खरीद सुनिश्चित की जाती है।
  • प्रभावी सीमा शुल्क में वृद्धि: सस्ते खाद्य तेलों के आयात को हतोत्साहित करने के लिए पाम, सूरजमुखी एवं सोयाबीन जैसे कच्चे खाद्य तेलों पर प्रभावी सीमा शुल्क 5.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 16.5 प्रतिशत कर दिया गया है।
  • किसान उत्पादक संगठन (FPOs): 10,000 FPO योजना के अंतर्गत तिलहन क्षेत्र के लिए विशेष रूप से 1,341 FPO गठित किए गए हैं, ताकि छोटे एवं सीमांत किसानों को बेहतर कृषि निवेश तथा बाज़ार संपर्क उपलब्ध कराया जा सके।
  • अन्य पहलें: बीज प्रमाणीकरण, अनुरेखण एवं समग्र भंडार (Seed Authentication, Traceability and Holistic Inventory: SATHI) पोर्टल तथा राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली आदि।

आगे की राह : समिति की सिफारिशें

  • खरीद व्यवस्था का विस्तार: प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) की मूल्य समर्थन योजना के अंतर्गत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर तिलहनों की खरीद को वर्तमान 25 प्रतिशत से बढ़ाकर राष्ट्रीय उत्पादन के 100 प्रतिशत तक विस्तारित किया जाए।
  • पाम आयल उत्पादन को प्रोत्साहन: ताज़े फलों के गुच्छों (FFBs) के लिए पर्याप्त व्यवहार्यता अंतर भुगतान (VGP) प्रदान किया जाए तथा रोपण सामग्री की लागत पर 80 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाए।
  • सिंचाई पद्धतियों में सुधार: वर्षा आधारित तिलहन क्षेत्रों में "प्रति बूंद अधिक फसल" योजना के दायरे का विस्तार किया जाए; लघु एवं सीमांत किसानों को ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों की खरीद हेतु अधिक सब्सिडी प्रदान की जाए तथा किसानों को सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के रख-रखाव का प्रशिक्षण दिया जाए।
  • आयात संबंधी सुरक्षा उपाय: घरेलू उत्पादन के आधार पर आयात शुल्क को गतिशील रूप से समायोजित किया जाए तथा यदि वैश्विक कीमतें 800 डॉलर प्रति टन से नीचे चली जाएं, तो पाम आयल आयात पर 20 प्रतिशत सुरक्षा शुल्क लगाया जाए।
  • 'भारत ऑयल' ब्रांड का शुभारंभ: बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव से निम्न एवं मध्यम आय वर्ग के परिवारों को संरक्षण प्रदान करने के लिए "भारत ऑयल" ब्रांड प्रारंभ किया जाए।
  • बीज मूल्य निर्धारण एवं विनियमन: बीजों की अधिकतम मूल्य सीमा निर्धारित करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की जाए, ताकि निजी कंपनियों द्वारा किसानों के शोषण को रोका जा सके।
    • इसके अतिरिक्त, आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के विनियमन, गुणवत्ता निगरानी तथा बीज संप्रभुता की सुरक्षा हेतु एक नया बीज विधेयक शीघ्र लागू किया जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का समावेशन: जलवायु-सहिष्णु, उच्च उत्पादकता वाली तथा कीट-प्रतिरोधी किस्मों के विकास हेतु जैव-प्रौद्योगिकी (जैसे क्रिस्पर-केस 9), मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन आदि में पर्याप्त निवेश किया जाए।

निष्कर्ष

खाद्य तेलों के आयात पर भारत की बढ़ती निर्भरता यह स्पष्ट करती है कि तकनीकी नवाचार, उन्नत सिंचाई व्यवस्था, बेहतर बीज गुणवत्ता तथा सुदृढ़ खरीद समर्थन के माध्यम से घरेलू तिलहन उत्पादन को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।

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मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन (MAS)

मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन (MAS) एक आणविक प्रजनन तकनीक है जो डीएनए मार्करों का उपयोग करके वांछित आनुवंशिक गुणों वाली फसल किस्मों का चयन करती है। यह पारंपरिक प्रजनन की तुलना में अधिक कुशल है।

क्रिस्पर-केस 9 (CRISPR-Cas9)

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प्रति बूंद अधिक फसल

यह एक सरकारी योजना है जिसका उद्देश्य सिंचाई की दक्षता को बढ़ाना है। इसके तहत किसानों को सूक्ष्म सिंचाई (जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर) को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि पानी की बचत हो और प्रति बूंद फसल उत्पादन बढ़े।

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