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जनगणना 2027 (Census 2027)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • भारत की जनगणना 2027, जो पूरी तरह से डिजिटल रूप में की जाने वाली पहली जनगणना है, में 1931 के बाद से व्यापक जाति गणना शामिल है।
  • इसका उद्देश्य कल्याणकारी योजनाओं को लक्षित करने, सीमा निर्धारण करने और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को समझने के लिए सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को अद्यतन करना है।
  • चुनौतियों में डिजिटल बहिष्कार, गोपनीयता संबंधी चिंताएं, जातिगत आंकड़ों की पद्धतिगत जटिलताएं और उत्तर-दक्षिण राजनीतिक तनाव शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने भारत की जनगणना 2027 के प्रथम चरण की शुरुआत की है। यह विश्व का सबसे बड़ा प्रशासनिक और सांख्यिकीय अभियान है।

अन्य संबंधित तथ्य 

  • जनगणना मूल रूप से वर्ष 2021 में आयोजित होनी थी। यह कोविड-19 महामारी के कारण विलंबित हो गई और अब की जा रही है।
  • यह भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना होगी। 1931 के बाद पहली बार इसमें व्यापक जातिगत गणना भी शामिल होगी। 

भारत में जनगणना

  • सांविधानिक आधार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत सातवीं अनुसूची में संघ सूची की प्रविष्टि 69 के अंतर्गत जनसंख्या का प्रावधान किया गया है। 
  • विधिक उपबंध: भारत में जनगणना, जनगणना अधिनियम, 1948 और जनगणना नियम, 1990  के प्रावधानों के तहत आयोजित की जाती है।
  • संचालन/आयोजक: यह गृह मंत्रालय के अधीन 'भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय' द्वारा आयोजित की जाती है। 

भारत में जनगणना का संक्षिप्त इतिहास

  • प्राचीन एवं मध्यकालीन युग: ऋग्वेद (800–600 ईसा पूर्व), कौटिल्य के अर्थशास्त्र (इसमें कराधान उद्देश्यों के लिए जनगणना संबंधी विचारों का उपयोग किया गया।) तथा सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान मुगल प्रशासन पर अबुल फजल की कृति 'आइन-ए-अकबरी' में इसका विवरण मिलता है। 
  • ब्रिटिश काल: भारत में पहली व्यवस्थित व आधुनिक जनगणना 1865 से 1872 के बीच आयोजित की गई थी। हालांकि यह सभी क्षेत्रों में एक साथ नहीं हुई थी।
    • पहली देशव्यापी समकालिक (सभी क्षेत्रों में एक साथ) जनगणना 1881 में जनगणना आयुक्त डब्ल्यू.सी. प्लोडेन के नेतृत्व में आयोजित की गई।
    • तब से भारतीय जनगणना प्रत्येक दस वर्ष में आयोजित की जाती रही है। हालांकि, कोविड-19 महामारी के कारण 2021 में होने वाली जनगणना समय पर नहीं की जा सकी।
  • स्वतंत्रता के बाद: जनगणना अधिनियम, 1948 के माध्यम से जनगणना को सांविधिक आधार प्रदान किया गया तथा इसे संघ सूची का विषय बनाया गया।
    • जनगणना 2027 देश के इतिहास में 16वीं और स्वतंत्रता के बाद 8वीं जनगणना होगी।

जनगणना 2027 में नया क्या है?

  • पहली पूर्णतः डिजिटल गणना: पहली बार आंकड़ों का संग्रह कागजी प्रणाली के बजाय मोबाइल अनुप्रयोगों के माध्यम से किया जाएगा।
    • सरकार ने लगभग वास्तविक समय निगरानी के लिए जनगणना प्रबंधन एवं निगरानी प्रणाली (Census Management & Monitoring System - CMMS) पोर्टल शुरू किया है। इसके साथ ही निम्नलिखित उपकरण भी विकसित किए गए हैं: 
      • मकान सूचीकरण एवं मकानों की गणना (Houselisting and Housing Census - HLO) मोबाइल ऐप, तथा 
      • हाउसलिस्टिंग ब्लॉक क्रिएटर (HLBC) नामक वेब-आधारित मैपिंग उपकरण।
  • स्व-गणना: एक नया वेब-आधारित पोर्टल लोगों को 16 विभिन्न भाषाओं में स्व-गणना (Self-Enumeration) करने का विकल्प प्रदान करेगा।
  • जातिगत गणना: भारतीय जनगणना 2027 की एक प्रमुख विशेषता के रूप में जातिगत गणना उभरकर सामने आई है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 की जनगणना तक, इस प्रक्रिया में केवल अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) की ही व्यवस्थित गणना की जाती थी।
  • जनगणना दो अलग-अलग चरणों में आयोजित: प्रथम चरण (मकान सूचीकरण एवं मकानों की गणना) अप्रैल से सितंबर 2026 तक आयोजित होगा। द्वितीय चरण (जनसंख्या की गणना) फरवरी 2027 से होगा।

जनगणना का महत्त्व

  • कल्याण और नीति निर्माण को पुनः आधार प्रदान करना: पिछले 15 वर्षों में, भारत की कल्याणकारी रूपरेखा मुख्यतः आंशिक नमूना सर्वेक्षणों पर आधारित रही है।
    • नई जनगणना एक अद्यतित तथा व्यापक सामाजिक-आर्थिक मानचित्र प्रदान करेगी, जो निम्नलिखित के लिए महत्वपूर्ण होगा:
      • सब्सिडी के सटीक लक्षित वितरण,
      • वंचित वर्गों की सही पहचान तथा 
      • आधुनिक जनसंख्या की आवश्यकताओं के अनुरूप सार्वजनिक अवसंरचना का विकास। 
  • परिसीमन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व: यह आंकड़े आगामी परिसीमन प्रक्रिया का आधार बनेंगे।
    • यह महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 को विधानसभाओं में लागू करने के लिए भी आवश्यक है।
  • नई जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों को समझना: वर्ष 2011 के बाद भारत की जनसांख्यिकी में बड़े बदलाव हुए हैं। यह जनगणना घटती प्रजनन दर तथा तीव्र गति से बढ़ती वृद्ध जनसंख्या जैसे महत्वपूर्ण बदलावों को दर्ज करेगी। यह भारत की देखभाल अर्थव्यवस्था (केयर इकोनॉमी), स्वास्थ्य प्रणाली तथा वृद्धजन देखभाल सेवाओं के पुनर्गठन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • नगरीकरण और प्रवासन का आकलन: शहरों के आसपास के क्षेत्रों का तेजी से विकास और अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार हो रहा है। ऐसे में GPS टैगिंग और डिजिटल परिसंपत्ति मानचित्रण से शहरी योजनाकारों को मदद मिलेगी। वे बेहतर परिवहन, आवास और जलवायु-अनुकूल अवसंरचना का निर्माण कर सकेंगे। 

जनगणना 2027 के समक्ष चुनौतियां 

  • डिजिटल बहिष्करण और गोपनीयता: स्व-गणना मोबाइल स्वामित्व तथा डिजिटल साक्षरता पर निर्भर करती है। यह उन क्षेत्रों में एक बड़ी चुनौती हो सकती है जहां महिलाएं और वंचित समुदाय तकनीकी तक पहुंच में पीछे हैं।
    • इसके अतिरिक्त, जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत विधिक रक्षोपाय होने के बावजूद, डिजिटल ढांचे में बदलाव से कई चिंताएं उत्पन्न होती हैं। इनमें साइबर सुरक्षा, संभावित डेटा उल्लंघन और संवेदनशील जानकारी को संभालने के संबंध में जनता का विश्वास शामिल है।
  • जातिगत आंकड़ों की कार्यप्रणाली संबंधी जटिलताएं: जातिगत आंकड़ों का संकलन अत्यंत जटिल है। इसका कारण यह है कि भारत में जाति व्यवस्था गहराई से स्थानीयकृत और विविध है। यह प्रायः उपजाति की पहचान से आकार लेती है।
    • लाखों स्व-पहचानों को विश्लेषणात्मक दृष्टि से सार्थक श्रेणियों में परिवर्तित करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। यह गहरे राजनीतिक विभाजन को भी जन्म दे सकती है।
  • उत्तर-दक्षिण तनाव: दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है। अब उन्हें आशंका है कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन से संसद में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व उत्तरी राज्यों की तुलना में काफी कम हो जाएगा।

निष्कर्ष

जनगणना 2027 केवल आंकड़ों की एक सांख्यिकीय गणना नहीं है। यह भारत के विकासात्मक और राजनीतिक ढांचे का एक संरचनात्मक पुनर्गठन है। "विकसित भारत 2047" की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आयोजित की जा रही है। डिजिटल रूप से सशक्त यह प्रक्रिया भारत की आधुनिक वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए एक अभूतपूर्व दर्पण प्रस्तुत करती है। यदि इसे पूर्ण पारदर्शिता और सुदृढ़ रक्षोपायों के साथ संपन्न किया जाए, तो इसमें व्यापक बदलाव लाने की क्षमता है। यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को पुनः समायोजित कर सकती है। इससे जनकल्याणकारी योजनाओं के वितरण की सटीकता में सुधार होगा। साथ ही, यह आने वाले दशक के लिए देश के वास्तविक सामाजिक-आर्थिक संरचना को भी प्रकट करेगी।

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