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कृषि में भारत की सुदृढ़ उत्पादन प्रणालियां (INDIA’S RESILIENT PRODUCTION SYSTEMS IN AGRICULTURE)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • भारत ने 2024-25 में 357.73 मिलियन मीट्रिक टन का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन हासिल किया, जिसमें कृषि का सकल बाजार मूल्य (जीवीएसी) में लगभग एक-पांचवां योगदान रहा।
  • सरकार की प्रमुख पहलें लचीली कृषि के लिए उत्पादन, ऋण, मूल्य समर्थन, बाजार सुधार और विस्तार सेवाओं का समर्थन करती हैं।
  • चुनौतियों में जलवायु संबंधी संवेदनशीलता, आयात पर निर्भरता, छोटे किसानों की आर्थिक असुरक्षा, बाजार की अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला की अक्षमताएं शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

भारत में वर्ष 2024-25 में 357.73 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) का अभूतपूर्व खाद्यान्न उत्पादन हुआ।

भारत में कृषि की स्थिति

  • कृषि और इससे संबद्ध क्रियाएं चालू कीमतों पर देश के सकल मूल्य वर्धित का लगभग पांचवां हिस्सा हैं। 
  • भारत के पास विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कृषि भू-क्षेत्र है।

भारत अग्रणी उत्पादक (विश्व में प्रथम)

  • दलहन, मिलेटस और चावल
  • मसाले
  • सूखे प्याज (विश्व के कुल उत्पादन में लगभग 25% का योगदान)
  • नारियल। 

विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक:

  • गेहूं
  • फल और सब्जियां
  • उच्च मूल्य वाली नकदी फसलें गन्ना, कपास, चाय

 

सुदृढ़ उत्पादन प्रणालियों को सहायता देने के लिए उठाए गए कदम: 

  • उत्पादकता और इनपुट आधारित रणनीतियां: जैसे- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM), 
  • दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन (2025–31), राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन (NMEO) आदि। 
  • ऋण, मशीनीकरण और प्रौद्योगिकी: जैसे- किसान क्रेडिट कार्ड, कस्टम हायरिंग सेंटर, आदि।
  • मूल्य समर्थन और जोखिम प्रबंधन: जैसे- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) आदि। 
  • विपणन में सुधार, अवसंरचना और सामूहिकीकरण: जैसे- ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM), कृषि अवसंरचना कोष (AIF), किसान उत्पादक संगठन (FPOs), आदि। 
  • विस्तार सेवाएं: जैसे- कृषोन्नति योजना के अंतर्गत कृषि विस्तार उप-मिशन। 
  • वित्तीय और बजटीय सहायता: 2026-27 में कृषि विभाग के लिए बजट आवंटन बढ़कर 1,30,561.38 करोड़ रुपये हो गया।

भारतीय कृषि के समक्ष विद्यमान चुनौतियां:

  • जलवायु और पर्यावरण से संबंधित चुनौतियां: जैसे- प्राकृतिक आपदाओं तथा कीट और रोगों के प्रकोप के कारण फसलों का नुकसान। 
  • आवश्यक वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भरता: जैसे- दलहन और खाद्य तेल।
  • लघु भू-जोत वाले कृषकों की आर्थिक असुरक्षा: भारतीय कृषि में लघु और सीमांत कृषकों की संख्या सर्वाधिक है।  इन्हें कम संसाधन मिल पाते हैं।
  • बाजार में उतार-चढ़ाव और व्यापार में बाधाएं: किसानों को प्रायः बाज़ार से जुड़े जोखिमों और फसलों के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है।
    • जब भारतीय किसान अपनी वस्तुएं विदेशों में बेचते हैं, तो उन्हें कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसमें मुख्य रूप से टैरिफ (आयात शुल्क) और गैर-टैरिफ बाधाएं शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर, यूरोपीय संघ (EU) के सख्त नियम, जिन्हें सैनिटरी और फाइटो-सैनिटरी (SPS) मानक  कहा जाता है।  
  • आपूर्ति श्रृंखला और फसल कटाई के बाद की चुनौतियां: उचित तरीके से भंडारण न होने के कारण अनाज, फल और सब्जियां बड़ी मात्रा में खराब हो जाती हैं।
  • अन्य कारक: खेतों में आवश्यकता से अधिक या असंतुलित मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करने से मृदा की उपजाऊ क्षमता धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जिसे मृदा निम्नीकरण (सॉइल डिग्रेडेशन) कहा जाता है।

आगे की राह

  • डिजिटल बाज़ार तक पहुंच: ई-नाम (e-NAM) जैसे इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल्स का विस्तार करना चाहिए। इससे स्थानीय मंडियों को एक साझा राष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जा सके।
  • सामूहिकता को बढ़ावा: किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के गठन और आधुनिकीकरण पर ध्यान देना चाहिए। यह किसानों को सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति, विकेंद्रीकृत यानी स्थानीय स्तर पर अनाज भंडारण की सुविधा और साझा संसाधनों के माध्यम से सशक्त बनाता है।
  • कृषि मशीनीकरण: 'कस्टम हायरिंग सेंटर्स' (CHCs) के माध्यम से लघु कृषकों को आधुनिक कृषि मशीनें किराए पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे किसान बिना अधिक लागत के कृषि की आधुनिक तकनीकों को अपना सकते हैं।
  • जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धति को बढ़ावा: कृषि में ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर प्रणाली के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही, ऐसी फसलों की कृषि को बढ़ावा देना चाहिए जो जलवायु परिवर्तन का सामना कर सके और सूखे की स्थिति में भी अच्छी पैदावार दें।
  • डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग: कृषि में आधुनिक उपकरणों और डेटा का विश्लेषण करने वाली प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना चाहिए। इससे कृषि कार्य बेहतर तरीके से हो सके और पैदावार का सटीक अनुमान लगाया जा सके।
  • उर्वरक क्षेत्रक में सुधार: उर्वरकों के संधारणीय उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए ताकि मृदा स्वास्थ्य (मृदा कार्बन) में सुधार हो सके और पोषक तत्वों के असंतुलित उपयोग को संतुलित किया जा सके। इससे फसल विविधीकरण में भी सहायता मिलेगी। 

 

 

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