सुर्ख़ियों में क्यों?
यह वर्ष महात्मा ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती का प्रतीक है।
ज्योतिबा फुले के जीवन का संक्षिप्त परिचय
- जन्म: 11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र (पुणे/सतारा जिले में या उसके निकट) के एक माली परिवार में हुआ था, जो शूद्र वर्ण से संबंधित था।
- शिक्षा: उन्होंने शुरुआत में अपने पारिवारिक खेत पर काम करने के लिए एक मराठी स्कूल छोड़ दिया था। हालांकि, बाद में 1841 में उन्हें पुणे के स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में प्रवेश मिला, जहाँ से 1847 में उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की।
- वे थॉमस पेन की पुस्तक 'राइट्स ऑफ मैन' (Rights of Man) से गहराई से प्रेरित थे।

- उपाधि:
- शोषितों के उत्थान के लिए जनता द्वारा 1888 में 'महात्मा' (महान आत्मा) की उपाधि दी गई।
- भारतीय सामाजिक क्रांति के जनक।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा इन्हें अपना 'गुरु' माना गया।
- कृतियाँ/प्रकाशन:
- गुलामगीरी (1873): इसमें निचली जातियों की गुलामी और शोषण का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया था।
- शेतकऱ्यांचा आसूड (1883): इसमें "किसान का कोड़ा" (The Cultivator's Whip-cord) के माध्यम से किसानों के व्यवस्थागत शोषण का विश्लेषण किया गया।
- ब्राह्मणांचे कसब (1869): इसमें ब्राह्मण पुरोहितों की शोषणकारी प्रथाओं को उजागर किया गया था।
- सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक (1891): इसमें "सभी के लिए एक सच्चे धर्म" पर उनके दार्शनिक विचारों को रेखांकित किया गया था।
- अन्य: तृतीय रत्न (1855), सत्सार भाग I और II (1885), इशारा (1885)।
प्रमुख योगदान
शैक्षिक सुधार:

- विद्यालय: उन्होंने 1848 में पुणे में निचली जाति के लड़कों और लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। जहाँ सावित्रीबाई फुले ने पहली भारतीय महिला शिक्षिका के रूप में कार्य किया।
- इसके बाद उन्होंने लड़कियों के लिए कई स्कूल खोले। साथ ही 1852 में वयस्क किसानों और श्रमिकों के लिए एक रात्रिकालीन पाठशाला (नाइट स्कूल) की शुरुआत की।
- हंटर कमीशन (1882): ज्योतिबा ने एक ज्ञापन सौंपकर सभी के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की वकालत की। साथ ही, सरकार से उच्च शिक्षा की तुलना में आम जनता के लिए प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
- उपयोगितावादी पाठ्यक्रम: उन्होंने किताबी ज्ञान के स्थान पर व्यावहारिक ज्ञान का समर्थन किया। उन्होंने सुझाव दिया कि पाठ्यक्रम में कृषि, स्वास्थ्य, नीतिशास्त्र और व्याकरण को शामिल किया जाना चाहिए, जिसमें ग्रामीण और शहरी पाठ्यक्रमों के बीच स्पष्ट अंतर हो।
- शिक्षकों पर ध्यान: उन्होंने मांग की कि प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित हों, उन्हें अच्छा वेतन मिले और वे निचली जातियों से हों ताकि उन्हें रोजगार के अवसर मिल सकें।
सामाजिक सुधार:
- सत्यशोधक समाज (Society of Truth Seekers): इसकी स्थापना 24 सितंबर, 1873 को की गई। इसका उद्देश्य ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध निचली जातियों को संगठित करना और सामाजिक समानता को बढ़ावा देना था।
- सत्यशोधक विवाह पद्धति: इस पद्धति के अंतर्गत विवाह बिना ब्राह्मण पुरोहितों और बिना दहेज के संपन्न कराए जाते थे।
- महिला अधिकार: उन्होंने 1860 में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का समर्थन किया । साथ ही, विधवाओं तथा बलात्कार पीड़ितों के बच्चों की सुरक्षा के लिए 1863 में 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' की स्थापना की।
- उन्होंने और सावित्रीबाई ने एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंत राव को गोद लिया था।
- अस्पृश्यता उन्मूलन: उन्होंने 1868 में अपना व्यक्तिगत पानी का कुआं अस्पृश्य समझे जाने वाले लोगों के लिए खोल दिया।
राजनीतिक सुधार:
- पूना नगर पालिका: उन्होंने 1876 से 1882 तक इसके एक सदस्य के रूप में कार्य किया और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: उन्होंने निचली जातियों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) से दूर रहने की सलाह दी। उन्होंने सचेत किया कि यह मुख्य रूप से कुलीन उच्च जातियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है और वास्तविक रूप से आम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।
- औपनिवेशिक सरकार के प्रति दृष्टिकोण:
- शुरुआत में: फुले ने ब्रिटिश शासन का स्वागत किया क्योंकि इसने पेशवा शासन के अत्याचारों को समाप्त किया और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को पेश किया। इससे निचली जातियों के लिए शैक्षिक और व्यावसायिक अवसर खुले।
- बाद में: उन्होंने प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा, शोषणकारी कराधान और किसान विरोधी नीतियों के लिए ब्रिटिश सरकार की आलोचना की।
धार्मिक और दार्शनिक सुधार:
- वर्ण व्यवस्था की आलोचना: उन्होंने वर्ण व्यवस्था की दैवीय उत्पत्ति को चुनौती दी और तर्क दिया कि ब्राह्मण आर्य विजेता थे जिन्होंने यहाँ के मूल निवासी शूद्रों और अतिशूद्रों को अपने अधीन कर लिया था।
- उन्होंने मूर्तिपूजा, कर्मकांड, भाग्यवाद और ईश्वर तथा भक्तों के बीच किसी पुरोहित मध्यस्थ की आवश्यकता को खारिज कर दिया।
- सार्वजनिक सत्य धर्म की वकालत: पारंपरिक हिंदू धर्म के स्थान पर उन्होंने सत्य की खोज, स्वतंत्रता और समानता पर आधारित एक सार्वभौमिक धर्म के रूप में 'सार्वजनिक सत्य धर्म' का प्रतिपादन किया।
- तृतीय रत्न: शिक्षा को "तीसरे नेत्र" के रूप में देखा गया जिसने आम जनता को गंभीर रूप से सोचने, स्वतंत्र रूप से तर्क करने और ब्राह्मणवाद की शोषक विचारधाराओं को ध्वस्त करने में सक्षम बनाया।
आर्थिक सुधार:
- धन का बहिर्गमन (Drain of Wealth): फुले ने किसान/ग्रामीण अर्थव्यवस्था से शहरी/ब्राह्मणवादी क्षेत्र की ओर धन के बहिर्गमन को रेखांकित किया।
- प्रस्तावित समाधान: उन्होंने सिंचाई के लिए बांधों, तालाबों और जलाशयों के निर्माण, मृदा संरक्षण और पशु प्रजनन की योजनाओं, आधुनिक कृषि तकनीकों की शुरुआत और किसानों पर कर के बोझ को कम करने की मांग की।
सावित्रीबाई फुले
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निष्कर्ष
महात्मा ज्योतिराव फुले एक दूरदर्शी और "भारतीय सामाजिक क्रांति के जनक" थे। उनके व्यावहारिक और गहन दार्शनिक दृष्टिकोण ने भारत में पिछड़ा वर्ग आंदोलन (Backward Class Movement) की नींव रखी। शिक्षा को सामाजिक न्याय का अंतिम अग्रदूत मानते हुए, उनके विचारों ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे भावी नेताओं को गहराई से प्रेरित किया, जो फुले को अपना गुरु मानते थे।
