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महात्मा ज्योतिबा फुले (MAHATMA JYOTIBA PHULE)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • महात्मा ज्योतिबा फुले (1827-1890) ने निम्न जातियों और महिलाओं के लिए शिक्षा और सामाजिक समानता की वकालत की और 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की।
  • उन्होंने व्यावहारिक शिक्षा, किसानों के अधिकारों, विधवा पुनर्विवाह और अस्पृश्यता के उन्मूलन की वकालत की, जिससे डॉ. बी.आर. अंबेडकर प्रभावित हुए।
  • भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने स्कूलों की सह-स्थापना की, महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा दिया और अकाल राहत का आयोजन किया, जो एक चार-स्तंभ शैक्षिक ढांचे का प्रतीक है।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

यह वर्ष महात्मा ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती का प्रतीक है।

ज्योतिबा फुले के जीवन का संक्षिप्त परिचय

  • जन्म: 11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र (पुणे/सतारा जिले में या उसके निकट) के एक माली परिवार में हुआ था, जो शूद्र वर्ण से संबंधित था।
  • शिक्षा: उन्होंने शुरुआत में अपने पारिवारिक खेत पर काम करने के लिए एक मराठी स्कूल छोड़ दिया था। हालांकि, बाद में 1841 में उन्हें पुणे के स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में प्रवेश मिला, जहाँ से 1847 में उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की।
    • वे थॉमस पेन की पुस्तक 'राइट्स ऑफ मैन' (Rights of Man) से गहराई से प्रेरित थे।
  • उपाधि:
    • शोषितों के उत्थान के लिए जनता द्वारा 1888 में 'महात्मा' (महान आत्मा) की उपाधि दी गई।
    • भारतीय सामाजिक क्रांति के जनक
    • डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा इन्हें अपना 'गुरु' माना गया।
  • कृतियाँ/प्रकाशन:
    • गुलामगीरी (1873): इसमें निचली जातियों की गुलामी और शोषण का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया था।
    • शेतकऱ्यांचा आसूड (1883): इसमें "किसान का कोड़ा" (The Cultivator's Whip-cord) के माध्यम से किसानों के व्यवस्थागत शोषण का विश्लेषण किया गया।
    • ब्राह्मणांचे कसब (1869): इसमें ब्राह्मण पुरोहितों की शोषणकारी प्रथाओं को उजागर किया गया था।
    • सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक (1891): इसमें "सभी के लिए एक सच्चे धर्म" पर उनके दार्शनिक विचारों को रेखांकित किया गया था।
    • अन्य: तृतीय रत्न (1855), सत्सार भाग I और II (1885), इशारा (1885)।

प्रमुख योगदान

शैक्षिक सुधार:

  • विद्यालय: उन्होंने 1848 में पुणे में निचली जाति के लड़कों और लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। जहाँ सावित्रीबाई फुले ने पहली भारतीय महिला शिक्षिका के रूप में कार्य किया।
    • इसके बाद उन्होंने लड़कियों के लिए कई स्कूल खोले। साथ ही 1852 में वयस्क किसानों और श्रमिकों के लिए एक रात्रिकालीन पाठशाला (नाइट स्कूल) की शुरुआत की।
  • हंटर कमीशन (1882): ज्योतिबा ने एक ज्ञापन सौंपकर सभी के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की वकालत की। साथ ही, सरकार से उच्च शिक्षा की तुलना में आम जनता के लिए प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
  • उपयोगितावादी पाठ्यक्रम: उन्होंने किताबी ज्ञान के स्थान पर व्यावहारिक ज्ञान का समर्थन किया। उन्होंने सुझाव दिया कि पाठ्यक्रम में कृषि, स्वास्थ्य, नीतिशास्त्र और व्याकरण को शामिल किया जाना चाहिए, जिसमें ग्रामीण और शहरी पाठ्यक्रमों के बीच स्पष्ट अंतर हो।
  • शिक्षकों पर ध्यान: उन्होंने मांग की कि प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित हों, उन्हें अच्छा वेतन मिले और वे निचली जातियों से हों ताकि उन्हें रोजगार के अवसर मिल सकें।

सामाजिक सुधार:

  • सत्यशोधक समाज (Society of Truth Seekers): इसकी स्थापना 24 सितंबर, 1873 को की गई। इसका उद्देश्य ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध निचली जातियों को संगठित करना और सामाजिक समानता को बढ़ावा देना था।
  • सत्यशोधक विवाह पद्धति: इस पद्धति के अंतर्गत विवाह बिना ब्राह्मण पुरोहितों और बिना दहेज के संपन्न कराए जाते थे।
  • महिला अधिकार: उन्होंने 1860 में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का समर्थन किया । साथ ही, विधवाओं तथा बलात्कार पीड़ितों के बच्चों की सुरक्षा के लिए 1863 में 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' की स्थापना की।
    • उन्होंने और सावित्रीबाई ने एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंत राव को गोद लिया था।
  • अस्पृश्यता उन्मूलन: उन्होंने 1868 में अपना व्यक्तिगत पानी का कुआं अस्पृश्य समझे जाने वाले लोगों के लिए खोल दिया।

राजनीतिक सुधार:

  • पूना नगर पालिका: उन्होंने 1876 से 1882 तक इसके एक सदस्य के रूप में कार्य किया और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: उन्होंने निचली जातियों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) से दूर रहने की सलाह दी। उन्होंने सचेत किया कि यह मुख्य रूप से कुलीन उच्च जातियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है और वास्तविक रूप से आम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।
  • औपनिवेशिक सरकार के प्रति दृष्टिकोण:
    • शुरुआत में: फुले ने ब्रिटिश शासन का स्वागत किया क्योंकि इसने पेशवा शासन के अत्याचारों को समाप्त किया और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को पेश किया। इससे निचली जातियों के लिए शैक्षिक और व्यावसायिक अवसर खुले।
    • बाद में: उन्होंने प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा, शोषणकारी कराधान और किसान विरोधी नीतियों के लिए ब्रिटिश सरकार की आलोचना की।

धार्मिक और दार्शनिक सुधार:

  • वर्ण व्यवस्था की आलोचना: उन्होंने वर्ण व्यवस्था की दैवीय उत्पत्ति को चुनौती दी और तर्क दिया कि ब्राह्मण आर्य विजेता थे जिन्होंने यहाँ के मूल निवासी शूद्रों और अतिशूद्रों को अपने अधीन कर लिया था।
  • उन्होंने मूर्तिपूजा, कर्मकांड, भाग्यवाद और ईश्वर तथा भक्तों के बीच किसी पुरोहित मध्यस्थ की आवश्यकता को खारिज कर दिया
  • सार्वजनिक सत्य धर्म की वकालत: पारंपरिक हिंदू धर्म के स्थान पर उन्होंने सत्य की खोज, स्वतंत्रता और समानता पर आधारित एक सार्वभौमिक धर्म के रूप में 'सार्वजनिक सत्य धर्म' का प्रतिपादन किया।
  • तृतीय रत्न: शिक्षा को "तीसरे नेत्र" के रूप में देखा गया जिसने आम जनता को गंभीर रूप से सोचने, स्वतंत्र रूप से तर्क करने और ब्राह्मणवाद की शोषक विचारधाराओं को ध्वस्त करने में सक्षम बनाया।

आर्थिक सुधार:

  • धन का बहिर्गमन (Drain of Wealth): फुले ने किसान/ग्रामीण अर्थव्यवस्था से शहरी/ब्राह्मणवादी क्षेत्र की ओर धन के बहिर्गमन को रेखांकित किया।
  • प्रस्तावित समाधान: उन्होंने सिंचाई के लिए बांधों, तालाबों और जलाशयों के निर्माण, मृदा संरक्षण और पशु प्रजनन की योजनाओं, आधुनिक कृषि तकनीकों की शुरुआत और किसानों पर कर के बोझ को कम करने की मांग की।

सावित्रीबाई फुले 

  • जन्म: 3 जनवरी, 1831 को नायगाँव, महाराष्ट्र में।
  • शिक्षा: विवाह के बाद महात्मा ज्योतिराव फुले द्वारा शिक्षित की गईं और बाद में उन्होंने औपचारिक शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
  • शिक्षा और सामाजिक सुधार में योगदान:
    • आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका: उन्होंने लड़कियों और हाशिए पर मौजूद समुदायों को शिक्षित करने के लिए ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर काम किया। इस दौरान उन्हें पत्थर और गोबर फेंके जाने जैसे गंभीर सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा।
    • सावित्रीबाई का 4-स्तंभीय ढांचा: शिक्षा सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध, बाल-सुलभ (संवेदनशील), बौद्धिक रूप से तार्किक और सामाजिक रूप से सुधारवादी होनी चाहिए।
    • नवोन्मेषी शिक्षण पद्धति (Innovative Pedagogy): सावित्रीबाई ने स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की प्रवृत्ति को रोकने के लिए वजीफे (Stipends) की शुरुआत की। साथ ही, बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों को शामिल करने के लिए शिक्षक-अभिभावक बैठकों (PTM) की शुरुआत की।
    • महिला सेवा मंडल (1852): महिलाओं के नागरिक अधिकारों और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए इसकी स्थापना की गई।
    • संकट सहायता: सावित्रीबाई ने 1877 में अकाल राहत के लिए 52 अन्न केंद्रों (Food Centers) का आयोजन किया।
  • साहित्यिक योगदान:
    • काव्यफुले (1854): कविता संग्रह (मराठी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री)।
    • बावन कशी सुबोध रत्नाकर (1892)।
  • सत्यशोधक समाज में भूमिका: 1890 में ज्योतिराव फुले की मृत्यु के बाद उन्होंने सत्यशोधक समाज का नेतृत्व किया।
  • निधन: एक क्लिनिक (जिसकी स्थापना में उन्होंने मदद की थी) में संक्रमित मरीजों की सेवा करने के दौरान स्वयं बुबोनिक प्लेग की चपेट में आने के कारण 1897 में उनका निधन हो गया।

 

निष्कर्ष

महात्मा ज्योतिराव फुले एक दूरदर्शी और "भारतीय सामाजिक क्रांति के जनक" थे। उनके व्यावहारिक और गहन दार्शनिक दृष्टिकोण ने भारत में पिछड़ा वर्ग आंदोलन (Backward Class Movement) की नींव रखी। शिक्षा को सामाजिक न्याय का अंतिम अग्रदूत मानते हुए, उनके विचारों ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे भावी नेताओं को गहराई से प्रेरित किया, जो फुले को अपना गुरु मानते थे।

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बालहत्या प्रतिबंधक गृह

A shelter home established by Savitribai Phule for pregnant women in distress, aimed at preventing female infanticide. This initiative highlights her commitment to protecting vulnerable women and children.

धन का बहिर्गमन (Drain of Wealth)

यह एक आर्थिक सिद्धांत है, जिसे दादाभाई नौरोजी ने लोकप्रिय बनाया, लेकिन ज्योतिबा फुले ने भी इसे किसान/ग्रामीण अर्थव्यवस्था से शहरी/ब्राह्मणवादी क्षेत्र की ओर धन प्रवाह के संदर्भ में रेखांकित किया।

सार्वजनिक सत्यधर्म

महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा प्रतिपादित एक सार्वभौमिक धर्म का विचार, जो सत्य की खोज, स्वतंत्रता और समानता पर आधारित है। उन्होंने इसे पारंपरिक हिंदू धर्म के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।

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