नीतिशास्त्र और राजनीति: लोकतांत्रिक नैतिकता का संकट (Ethics and Politics: The Crisis of Democratic Ethics) | Current Affairs | Vision IAS

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नीतिशास्त्र और राजनीति: लोकतांत्रिक नैतिकता का संकट (Ethics and Politics: The Crisis of Democratic Ethics)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • राजनीति के अपराधीकरण, धनशक्ति और विचार-विमर्श आधारित लोकतंत्र के क्षरण के कारण आधुनिक लोकतंत्र नैतिक संकट का सामना कर रहा है।
  • मूल कारणों में संरचनात्मक मुद्दे जैसे कि विजेता-सब-कुछ-ले-जाता है प्रणाली और सांस्कृतिक कारक जैसे कि अनैतिक उम्मीदवारों के प्रति मतदाताओं की सहनशीलता शामिल हैं।
  • आगे बढ़ने का रास्ता ईमानदारी को संस्थागत रूप देने, सार्वजनिक सेवा मूल्यों को बढ़ावा देने, दृष्टिकोण में बदलाव लाने और राजनीति में 'ट्रस्टीशिप' को पुनर्जीवित करने में निहित है।

In Summary

प्रस्तावना 

एक गहरा नैतिक संकट आधुनिक लोकतंत्र को खोखला कर रहा है, यह लोक नैतिकता और राजनीतिक शक्ति के बीच बढ़ते अंतर को उजागर करता है। यह पश्चिमी देशों के लॉबिंग घोटालों और 45% भारतीय विधायकों पर आपराधिक मामलों से स्पष्ट होता है। साथ ही, यह पोप-ट्रंप प्रकरण जैसी खारिज कर दी गई मानवीय अपीलों और गाजा व यूक्रेन में बड़े पैमाने पर आम नागरिकों की मौतों के निष्क्रिय तर्कसंगत औचित्य में भी स्पष्ट होता है। 'यथार्थवादी राजनीति' (Realpolitik) एक वैश्विक नैतिक संकट को जन्म दे रही है। अंततः, यह प्रवृत्ति समकालीन लोकतांत्रिक राजनीति में तेजी से होते नैतिक क्षरण के गंभीर मुद्दे को रेखांकित करती है।

नैतिकता का पतन (The Moral Decline)

  • राजनीति का अपराधीकरण (Criminalisation of Politics): यह अपराधियों और राजनेताओं के बीच के गठजोड़ से परिभाषित होता है। 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 45% भारतीय विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 29% पर गंभीर आरोप शामिल हैं।
    • उम्मीदवारों द्वारा की गई घोषणा (डिस्क्लोज़र) पर उच्चतम न्यायालय (SC) के निर्देशों और वोहरा समिति के निष्कर्षों के बावजूद, राजनीतिक दल 'जिताऊ क्षमता' (Winnability) के कारक के आधार पर दागी उम्मीदवारों को चुनाव में उतारना जारी रखते हैं।
  • धनबल और चुनावी नैतिकता (Money Power and Electoral Ethics): अत्यधिक चुनावी खर्च, अपारदर्शी दलीय वित्तपोषण (Party Funding) और दाताओं व नीति निर्माताओं के बीच 'क्विड प्रो क्वो' (प्रतिफल के बदले लाभ) की स्थिति प्रतिस्पर्धी लोकतांत्रिक समानता को विकृत करती है।
    • उच्चतम न्यायालय ने 2024 में कॉरपोरेट-राजनीतिक गठजोड़ पर अंकुश लगाने के लिए अपारदर्शी चुनावी बॉन्ड को रद्द कर दिया। इसके साथ ही, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 2024 के आम चुनाव के दौरान रिकॉर्ड ₹8,889 करोड़ जब्त किए।
  • विमर्शात्मक लोकतंत्र का क्षरण (Erosion of Deliberative Democracy): यह संसद में बार-बार होने वाले व्यवधानों, बिना बहस के विधेयकों को पारित करने और प्रश्नकाल में आई गिरावट से सिद्ध होता है। पार्टी व्हिप का कड़ाई से अनुपालन सांसदों के अंतःकरण के मत (Conscience Vote) को कमजोर करता है।
    • 17वीं लोकसभा में रिकॉर्ड स्तर पर सबसे कम बैठकें हुईं। साथ ही, वर्ष 2023 में 146 विपक्षी सांसदों के निलंबन के बाद बिना किसी बहस के नई आपराधिक संहिताएं (Criminal Codes) पारित कर दी गईं।
  • लोकलुभावनवाद, मुफ्त उपहार (फ्रीबीज) और नैतिक जोखिम (Populism, Freebies & Moral Hazard): वहनीय न होने वाले मुफ्त उपहारों (फ्रीबीज) का वादा करने की नैतिकता, वास्तविक कल्याण और वित्तीय उत्तरदायित्व के बीच तनाव पैदा करती है। जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु मामले में कहा था, कल्याणकारी अधिकारों और लोकलुभावन चुनावी घूस के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है।
    • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 2022 के एक बुलेटिन में चेतावनी दी गई थी कि वित्तीय तनाव से जूझ रहे राज्य तत्काल चुनावी जीत के लिए दी जाने वाली सब्सिडियों के वित्तपोषण हेतु आने वाली पीढ़ियों पर असहनीय कर्ज का बोझ डाल रहे हैं।
  • संस्थागत नियंत्रण (Institutional Capture): नियंत्रण और संतुलन की नैतिकता का क्षरण तब होता है जब नियामक निकायों, जाँच एजेंसियों और न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ता है। इससे सिविल सेवकों और संस्थाओं की तटस्थता प्रभावित होती है।
    • प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जैसी एजेंसियां अपनी स्वायत्तता से जुड़ी चिंताओं का सामना कर रही हैं।

राजनीति में नैतिकता के क्षरण के मूल कारण 

संरचनात्मक/व्यवस्थागत कारण (Structural/Systemic Causes)

सांस्कृतिक/अभिवृत्ति संबंधी कारण (Cultural/Attitudinal Causes)

  • 'विजेता को ही सब कुछ' (Winner-takes-all) वाली चुनावी प्रणाली, जो किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करने को पुरस्कृत करती है।
  • चुनावों की अत्यधिक लागत, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।
  • राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का अभाव; उम्मीदवारों का चयन योग्यता के बजाय प्रभाव के आधार पर होना।
  • धीमी न्यायिक प्रक्रियाएं, जो दागी राजनेताओं को दशकों तक सक्रिय रहने की अनुमति देती हैं।
  • रीयल-टाइम प्रकटीकरण (Disclosures) की कमी से युक्त अपारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण
  • जाति/समुदाय के प्रति निष्ठा के कारण आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के प्रति मतदाताओं की सहिष्णुता
  • अनैतिक राजनीति का सामान्यीकरण होना, जैसे—"सब चोर हैं" की मानसिकता।
  • अल्पकालिक राजनीतिक स्मृति; घोटालों के बाद मीडिया का ध्यान तुरंत दूसरे मुद्दों पर केंद्रित हो जाना।
  • राजनीतिक अधिकारों और कर्तव्यों के संबंध में नागरिक शिक्षा (Civic Education) का अभाव
  • मूल्यों (Values) के बजाय प्रलोभनों से प्रेरित लेन-देन आधारित मतदान

 

नैतिक विफलता और व्यवस्थागत प्रभाव (Ethical Failure & Systemic Impacts)

  • सद्गुण नीतिशास्त्र - अरस्तू (Virtue Ethics - Aristotle): यह न्याय और विवेक जैसे अंतर्निहित सद्गुणों की मांग करता है।
    • नैतिक विफलता का प्रभाव: जनप्रतिनिधियों द्वारा कानून की परवाह न करते हुए काम करना यह संदेश देता है कि "सिद्धांतों पर शक्ति भारी है"। यह सामाजिक नैतिकता को नष्ट करता है और एक ऐसा हतोत्साहित करने वाला माहौल (Chilling Effect) बनाता है जो ईमानदार उम्मीदवारों को राजनीति में प्रवेश करने से रोकता है।
  • कर्तव्यशास्त्र - कांट (Deontology - Kant): यह सत्यनिष्ठा और चुनावी वादों के प्रति पूर्ण निष्ठा की मांग करता है।
    • नैतिक विफलता का प्रभाव: राजनीतिक सुविधा के लिए इन मूल कर्तव्यों को छोड़ देना जनता में गहरा अविश्वास (Cynicism) पैदा करता है। इससे नागरिक भागीदारी घटती है और लोकतांत्रिक वैधता कमजोर होती है।
  • परिणामवाद - मिल (Consequentialism - Mill): यह "अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम कल्याण" (Greatest good for the greatest number) का लक्ष्य रखता है।
    • नैतिक विफलता का प्रभाव: राजनेता अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए अनैतिक साधनों को सही ठहराने हेतु इसका दुरुपयोग करते हैं। इससे दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों का स्थान वित्तीय रूप से विनाशकारी लोकलुभावनवाद ले लेता है।
  • सामाजिक समझौता - रूसो (Social Contract - Rousseau): यह राजनेताओं को संप्रभु जनता की इच्छा के न्यासी (Trustees) के रूप में देखता है।
    • नैतिक विफलता का प्रभाव: इस अमूर्त विश्वास को तोड़ने से नियामक नियंत्रण (Regulatory Capture) की स्थिति पैदा होती है, जहाँ दागी विधायक सार्वजनिक हित के बजाय धनी दाताओं को प्राथमिकता देते हैं और संसदीय बहस के स्तर को गिराते हैं।
  • निष्पक्षता के रूप में न्याय - जॉन रॉल्स (Justice as Fairness - John Rawls): यह व्यक्तिगत या दलीय लाभ को अलग रखकर, 'अज्ञानता के पर्दे' (Veil of Ignorance) के पीछे से सामाजिक सिद्धांतों को तैयार करने की मांग करता है।
    • नैतिक विफलता का प्रभाव: राजनेता ऐसी नीतियां बनाते हैं जो स्पष्ट रूप से उन्हें या उनके वित्तीय समर्थकों को लाभ पहुँचाती हैं। यह संरचनात्मक असमानताओं को गहरा करता है और न्यायसंगत शासन के स्थान पर साठगांठ वाले पूंजीवाद (Crony Capitalism) को स्थापित करता है।

विभिन्न हितधारक और उनसे जुड़ी नैतिक चिंताएँ (Different Stakeholders and associated ethical concerns)

हितधारक (Stakeholders)

चिंताएँ (Concerns)

विधायक / निर्वाचित राजनेता

जनता की इच्छा के न्यासी के रूप में कार्य करना; कानून बनाना और चुनावी प्रासंगिकता बनाए रखना।

हितों के टकराव (Conflict of Interest), दंडमुक्ति (Impunity) और साठगांठ की प्रवृत्ति; अल्पकालिक लाभ (लोकलुभावनवाद) के लिए परिणामवाद का दुरुपयोग किया जा सकता है और एक भ्रष्ट यथास्थिति को सुधारने के नैतिक प्रोत्साहन की कमी होती है।

मतदाता / नागरिक

नागरिक कर्तव्यों में भाग लेना, नेताओं को जवाबदेह ठहराना और "अधिकतम कल्याण" का लाभ उठाना।

बढ़ता अविश्वास और नागरिक भागीदारी में गिरावट; लेन-देन आधारित मुफ्त उपहारों और पहचान-आधारित मतदान को स्वीकार करके मतदाताओं की मिलीभगत, जो अभिवृत्ति संबंधी संकट को दर्शाती है।

धनी दाता / वित्तीय समर्थक

राजनीतिक अभियानों को वित्तपोषित करना और अनुकूल नीतिगत माहौल की तलाश करना।

नियामक नियंत्रण (Regulatory Capture) और साठगांठ वाले पूंजीवाद को बढ़ावा देना; सार्वजनिक हित के बजाय स्पष्ट रूप से अपने पक्ष में बनाई गई नीतियों से लाभ उठाना, जिससे संरचनात्मक असमानताएं गहरी होती हैं।

न्यायपालिका

कानून के शासन को बनाए रखना, दंडमुक्ति को समाप्त करना और त्वरित जवाबदेही सुनिश्चित करना।

कर्मचारियों की भारी कमी और न्यायिक विलंब से दंडमुक्ति की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है, जिससे निवारक प्रभाव (Deterrence) समाप्त होता है और न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कम होता है।

राजनीतिक दल

जनता के हितों को संगठित करना, उम्मीदवारों का चयन करना और सरकार बनाना।

कमजोर आंतरिक लोकतंत्र के कारण भाई-भतीजावाद और अपारदर्शिता को बढ़ावा मिलना; ईमानदारी के बजाय चुनावी 'जिताऊ क्षमता' को प्राथमिकता देना और पारदर्शिता के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन करना।

नागरिक समाज और स्वतंत्र प्रेस

एक सतर्क सजग प्रहरी (Watchdog) के रूप में कार्य करना और संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखना।

पूर्ण सत्यनिष्ठा की मांग करने में चुनौतियों का सामना करना; मतदाताओं को लेन-देन की निष्ठा से हटाकर मूल्य-आधारित मतदान की ओर ले जाने के लिए जमीनी स्तर पर नागरिक शिक्षा को निरंतर बढ़ावा देने की आवश्यकता।

सिविल सेवक

शासन का संचालन करना और सार्वजनिक नीतियों को निष्पक्ष रूप से लागू करना।

राजनीतिक दबाव के प्रति संवेदनशील होना; अनैतिक लोकलुभावन एजेंडों का विरोध करने के लिए उनकी पूर्ण निष्पक्षता की सख्त सुरक्षा की आवश्यकता होना।

 

आगे की राह

  • शुचिता और जवाबदेही को संस्थागत बनाना: विधायी हितों के टकराव को हल करने के लिए एक बाध्यकारी सांविधिक आचार संहिता (Statutory Code of Ethics) लागू की जानी चाहिए। साथ ही, सांठगांठ को रोकने के लिए वास्तविक समय (Real-time) के डिजिटल वित्तीय प्रकटीकरण को अनिवार्य किया जाना चाहिए और निर्वाचित पदाधिकारियों की त्वरित जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की जानी चाहिए।
  • सार्वजनिक सेवा के मूल्यों को बढ़ावा देना: चुनावी 'जिताऊ क्षमता' के स्थान पर सत्यनिष्ठा को प्राथमिकता देकर नैतिक नेतृत्व विकसित किया जाना चाहिए। साथ ही, अनैतिक लोकलुभावनवाद के विरुद्ध सहानुभूतिपूर्ण कल्याण और राजकोषीय विवेक के बीच संतुलन बनाने के लिए भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) का उपयोग किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, सिविल सेवकों और न्यायपालिका की पूर्ण निष्पक्षता को कड़ाई से सुरक्षित किया जाना चाहिए।
  • समाज में मनोवृत्ति संबंधी परिवर्तन लाना: मतदाता के व्यवहार को लेन-देन आधारित निष्ठा से मूल्य-आधारित मतदान की ओर स्थानांतरित करने के लिए जमीनी स्तर पर नागरिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। साथ ही, नागरिक समाज तथा स्वतंत्र प्रेस को संवैधानिक नैतिकता बनाए रखने वाले सतर्क प्रहरियों के रूप में सशक्त किया जाना चाहिए।
  • 'ट्रस्टीशिप' और नैतिक नेतृत्व को पुनर्जीवित करना: महात्मा गांधी के न्यासिता (Trusteeship) के दर्शन को अपनाकर राजनीतिक संस्कृति में मौलिक बदलाव लाया जाना चाहिए। साथ ही, निर्वाचित प्रतिनिधियों को इस रूप में पुनर्गठित किया जाना चाहिए कि वे अपने पद को शक्ति के प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र विश्वास के रूप में देखें, जो उच्च भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और केवल जनहित के प्रबंधकों के रूप में कार्य करने के नैतिक साहस की मांग करता है।

निष्कर्ष

अरस्तू ने तर्क दिया था कि मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है, और राजनीतिक जीवन की गुणवत्ता समाज की नैतिकता को दर्शाती है। इसका नैतिक पतन लोकतंत्र के सामान्य कल्याण के मूल सिद्धांत के लिए खतरा है। राजनीतिक नैतिकता को बहाल करने के लिए संस्थागत सुधार, सख्त जवाबदेही और नागरिकों द्वारा पूर्ण ईमानदारी की मांग की आवश्यकता है। अंततः, भारत के संवैधानिक दृष्टिकोण को साकार करने के लिए राजनीति को व्यक्तिगत लाभ के माध्यम के बजाय सार्वजनिक न्यासिता (Trusteeship) के रूप में चुनना अनिवार्य है।

अपनी सीख का परीक्षण करें 

आप एक राज्य में होने वाले चुनावों के दौरान एक अत्यंत संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में जिला मजिस्ट्रेट (DM) और जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के रूप में तैनात हैं। सत्तारूढ़ दल ने श्री X को मैदान में उतारा है, जो अत्यधिक धनबल और जबरन वसूली के आरोपों सहित कई लंबित आपराधिक मामलों वाला एक स्थानीय बाहुबली है।

अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए, श्री X के अभियान को स्थानीय धनी ठेकेदारों के एक सिंडिकेट द्वारा भारी वित्तपोषण प्रदान किया जा रहा है, जो भविष्य में 'क्विड प्रो क्वो' (प्रतिफल के बदले लाभ) की उम्मीद रखते हैं। इसके अलावा, अपनी रैलियों के दौरान श्री X मतदाताओं से ऐसे मुफ्त उपहारों के वादे कर रहे हैं जिन्हें पूरा करना वित्तीय रूप से वहनीय नहीं है। उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि पर सवाल उठाने के बजाय, मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इन वादों के प्रति अत्यधिक आकर्षित दिख रहा है और जातिगत पहचान के आधार पर उनके पीछे लामबंद हो रहा है।

इसी बीच, आपको राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से श्री X के खिलाफ आदर्श आचार संहिता (MCC) को लागू करने में ढिलाई बरतने के अनौपचारिक और सूक्ष्म निर्देश प्राप्त होते हैं। आप जानते हैं कि सख्त कार्रवाई करने से आपका प्रतिशोधपूर्ण स्थानांतरण (Vindictive Transfer) हो सकता है या आपके करियर की प्रगति रुक सकती है।

प्रश्न:

  1. इस मामले में शामिल प्रमुख हितधारकों और उनके संबंधित हितों की पहचान कीजिए।
  2. इस परिदृश्य में मौजूद नैतिक दुविधाएं और व्यवस्थागत नैतिक मुद्दे क्या हैं?
  3. जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में, आप क्या कदम उठाएंगे? संवैधानिक नैतिकता और सार्वजनिक न्यासिता के सिद्धांतों के आधार पर अपने कदमों का औचित्य सिद्ध कीजिए।

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