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भारत के रक्षा निर्यात (India’s Defence Exports)

22 May 2026
1 min

In Summary

  • वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात ने 38,424 करोड़ रुपये का सर्वकालिक उच्च स्तर छू लिया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 62.66% की वृद्धि है।
  • इस वृद्धि को गति देने वाले प्रमुख कारकों में डीएपी 2026, डीपीईपीपी 2020 जैसे नीतिगत सुधार, आयात प्रतिबंध, उदारीकृत एफडीआई और आईडेक्स जैसी नवाचार पहल शामिल हैं।
  • तकनीकी अंतराल, आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता, निजी कंपनियों के लिए बुनियादी ढांचे की बाधाएं और सीमित वैश्विक विपणन प्रयासों सहित चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों? 

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया।

अन्य संबंधित तथ्य

  • इसमें पिछले वर्ष की तुलना में 62.66% की वृद्धि हुई है।
  • रक्षा क्षेत्रक के सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs) और निजी क्षेत्रक का योगदान क्रमशः 55% और 45% रहा है।

भारत के रक्षा क्षेत्र का अवलोकन

  • वित्त वर्ष 2024-25 में रिकॉर्ड उत्पादन ₹1.54 लाख करोड़ रहा, जो 2014-15 की तुलना में 174% अधिक है।
    • DPSU का योगदान 77% रहा, जबकि निजी क्षेत्रक का योगदान 23% रहा। 
    • अब 65% सैन्य उपकरणों का निर्माण देश में ही किया जा रहा है। 
  • निर्यात: पिछले दशक में रक्षा निर्यात में अत्यधिक वृद्धि हुई है, जो 2013-14 की तुलना में 34 गुना बढ़ोतरी को दर्शाता है। 
    • रक्षा मंत्रालय का लक्ष्य 2029 तक वार्षिक निर्यात से 50,000 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त करना है।
    • प्रमुख बाजार: भारत अब 100 से अधिक देशों को आपूर्ति करता है।
      • शीर्ष तीन गंतव्य बाजार (2023-24 में): संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया।
      • भारत ने दक्षिणपूर्व एशिया में भी प्रमुख रणनीतिक साझेदारियां की हैं, जैसे कि फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति करना तथा श्रीलंका, नेपाल और भूटान जैसे मित्र दक्षिण एशियाई देशों को निर्यात करना।
    • प्रमुख निर्यात उत्पाद: मिसाइल एवं वायु रक्षा प्रणाली (ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, आकाश SAMs); विमानन एवं ड्रोन (डोर्नियर-228 विमान, चेतक हेलीकॉप्टर); तोपखाना एवं गोला-बारूद (होवित्जर); नौसेना एवं पैदल सेना के उपकरण (फास्ट इंटरसेप्टर नौकाएं, अपतटीय गश्ती पोत, रडार, थर्मल इमेजर और बुलेटप्रूफ जैकेट)। 

भारत के रक्षा निर्यात में वृद्धि के प्रमुख कारण

  • नीति और खरीद संरचना 
    • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2026 का मसौदा: प्राथमिकता वाली श्रेणियों के लिए स्वदेशी सामग्री को 50 से बढ़ाकर 60% किया गया है।
    • रक्षा उत्पादन और निर्यात संवर्धन नीति (DPEPP) 2020: विनिर्माण पारितंत्र को सुदृढ़ कर 2025 तक ₹1,75,000 करोड़ के कारोबार का लक्ष्य है।
  • आयात पर प्रतिबंध 
    • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियां: 5,000 से अधिक वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने हेतु पाँच सूचियां जारी की गईं, ताकि निर्धारित समय सीमाओं के भीतर स्थानीय स्रोतों से खरीद  को अनिवार्य बनाया जा सके।
    • सृजन (SRIJAN)स्वदेशीकरण पोर्टल: 2020 में शुरू किया गया, यह प्लेटफॉर्म घरेलू उद्योग और स्टार्टअप को पूर्व में आयातित रक्षा वस्तुओं को स्थानीय स्तर पर विकसित करने के लिए आमंत्रित करता है।
  • बजटीय और वित्तीय सुधार: सरकार ने स्थानीय बाजार की मांग को सुनिश्चित करने के लिए वित्त वर्ष 2024-25 में रक्षा पूंजी बजट का 75% हिस्सा घरेलू उद्योग के लिए आरक्षित किया।
    • उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): स्वचालित मार्ग के तहत FDI की सीमा को बढ़ाकर 74% कर दिया गया, जिसे उन्नत प्रौद्योगिकियों के लिए सरकारी अनुमोदन के माध्यम से 100% तक बढ़ाया जा सकता है। 
  • नवाचार और अनुसंधान एवं विकास
    • iDEX: स्टार्टअप और MSME को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। सशस्त्र बलों ने iDEX समर्थित फर्मों से 2,400 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त की है।
    • प्रौद्योगिकी विकास कोष (TDF): DRDO उन्नत एयरोस्पेस और रक्षा क्षमताओं के लिए स्टार्टअप/MSME को 50 करोड़ रुपये तक का अनुदान प्रदान करता है।
    • समर्पित अनुसंधान एवं विकास बजट: अनुसंधान को लोकतांत्रिक बनाने के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25% हिस्सा निजी क्षेत्रक और शिक्षण संस्थानों के लिए आरक्षित किया गया है ।
      • DRDO ने भारतीय उद्योग के साथ परीक्षण सुविधाएं और पेटेंट भी बिना किसी शुल्क के साझा किए हैं।
  • संस्थागत और अवसंरचना सुधार:
    • आयुध कारखाना बोर्डों (OFBs) का निगमीकरण: दक्षता और स्वायत्तता बढ़ाने के लिए 41 आयुध कारखानों को सात कॉर्पोरेट DPSUs में परिवर्तित किया गया। 
    • रक्षा औद्योगिक गलियारे (DICs): उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में स्थापित, जो लॉजिस्टिक्स को अनुकूलित करने और निवेश आकर्षित करने में सहायक हैं। 

रक्षा में आत्मनिर्भरता का महत्व:

  • रणनीतिक स्वायत्तता: आत्मनिर्भरता भारत को आपूर्ति में व्यवधान से बचाती है और क्षेत्रीय एवं वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए लचीलापन प्रदान करती है।
  • आर्थिक विकास:
    • व्यापार संतुलन: आयातक से उत्पादक बनने से विदेशी मुद्रा का संरक्षण होता है और व्यापार असंतुलन दूर होता है।
    • गुणक प्रभाव: MSME के एकीकरण से सहायक उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता है, नवाचार को बढ़ावा मिलता है तथा उच्च-कौशल रोजगार सृजित होते हैं।
  • क्षमता विकास: हथियारों के अधिग्रहण से ध्यान हटकर स्वदेशी बौद्धिक संपदा और गहन तकनीकी क्षमताओं के निर्माण पर केंद्रित हुआ है।
    • द्वि-उपयोगी तकनीक: रक्षा क्षेत्रक में अनुसंधान एवं विकास का प्रभाव AI, सामग्री और दूरसंचार जैसे नागरिक क्षेत्रों पर भी पड़ता है।
  • कूटनीतिक प्रभाव: रक्षा निर्यात द्विपक्षीय संबंधों और बहुपक्षीय सुरक्षा साझेदारियों को मजबूत करते हैं। उदाहरण के लिए, फिलीपींस और वियतनाम को ब्रह्मोस की आपूर्ति।

रक्षा निर्यात को और बढ़ाने में चुनौतियां 

  • तकनीकी कमियां: वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अनुसंधान एवं विकास पर खर्च कम बना हुआ है (रक्षा व्यय का 5.5%-6.5%)।
  • आपूर्ति श्रृंखला और विदेशी निर्भरता: विदेशी जेट इंजनों (जैसे, एलसीए तेजस के लिए GE इंजन) पर निर्भरता उत्पादन कार्यक्रम को वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं के अधीन करती है।
  • अवसंरचना एवं समान अवसर: निजी कंपनियों को भूमि अधिग्रहण और परस्पर विरोधी नियमों का सामना करना पड़ता है।
    • DPSUs को दी जाने वाली तरजीही व्यवस्था निजी क्षेत्रक के लिए वास्तव में समान अवसर सुनिश्चित करने में बाधा डालती है।
  • निर्यात संबंधी सीमाएँ: कमजोर वैश्विक विपणन और सीमित अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों के कारण विकास बाधित होता है।

निष्कर्ष

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए घरेलू रक्षा आधार का निर्माण अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैश्विक अनिश्चितता के इस दौर में आत्मनिर्भरता आपूर्ति की निरंतरता, परिचालन तत्परता और बाह्य भू-राजनीतिक दबावों से स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।

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द्वि-उपयोगी तकनीक

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