सुर्ख़ियों में क्यों ?
हाल ही में लोकसभा ने जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया।
जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) विधेयक, 2026 के बारे में
- इसका उद्देश्य भारत की नियामक व्यवस्था को दंडात्मक मॉडल से "विश्वास-आधारित शासन" की ओर स्थानांतरित करना है।
- यह पूर्व में लागू जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) अधिनियम, 2023 पर आधारित है। इसके अंतर्गत 42 केंद्रीय विधियों के 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था।
- इसके अंतर्गत 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय अधिनियमों के 784 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।
- प्रमुख प्रावधान
- अपराधों का निरापराधीकरण: 1,000 से अधिक छोटे अपराधों के लिए कारावास के स्थान पर दीवानी अर्थदंड (सिविल पेनल्टी) का प्रावधान किया गया है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित करने पर जेल की बजाय 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाना।
- अपराधों को हटाना: कुछ कृत्यों को अपराध की सूची से हटाना। उदाहरण के लिए, दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 के तहत आग लगने की झूठी सूचना देना। दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 के अंतर्गत जन्म और मृत्यु की जानकारी न देना।
- जुर्माने और दंड में संशोधन: प्रत्येक तीन वर्ष में संबंधित न्यूनतम राशि में 10 प्रतिशत वृद्धि की जाएगी।
- क्रमिक प्रतिक्रिया व्यवस्था:
- पहली बार अपराध होने पर परामर्श (Advisory) दिया जाएगा।
- दूसरी बार अपराध होने पर चेतावनी (Warning) दी जाएगी।
- इसके बाद के उल्लंघनों पर दीवानी दंड लगाया जाएगा।
विश्वास-आधारित शासन (Trust-Based Governance) के बारे में
- विश्वास-आधारित शासन एक विशेष प्रकार की शासन व्यवस्था है। इसमें सार्वजनिक संस्थाओं से विश्वसनीय, उत्तरदायी, निष्पक्ष, पारदर्शी तथा सत्यनिष्ठ होने की अपेक्षा की जाती है। यह अत्यधिक नियंत्रण और दबाव के बजाय सहयोग तथा स्वैच्छिक अनुपालन (अपनी मर्जी से नियमों का पालन) को प्रोत्साहित करता है।
- मूल रूप से, इसका अर्थ है कि किसी भी संस्थागत संबंध की शुरुआत का आधार विश्वास ही होता है।
- OECD के अनुसार, विश्वास का अर्थ है "किसी व्यक्ति का यह मानना कि कोई अन्य व्यक्ति या संस्था, सकारात्मक व्यवहार के प्रति उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप ही कार्य करेगा/करेगी।"
विश्वास-आधारित शासन की आवश्यकता
- नियामकीय सुधार: भारत की शासन व्यवस्था में लंबे समय से अत्यधिक अनुपालन और अति-नियमन रहा है। इससे कार्य संपादन की लागत बढ़ती है और कठोर नौकरशाही नियंत्रण स्थापित होता है।
- भारत की नियामकीय व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर 1,536 कानून तथा 69,233 अनुपालन प्रावधान शामिल हैं।
- आर्थिक संवृद्धि: विश्वास-आधारित शासन अनावश्यक मंजूरियों और अनुपालन न करने पर आपराधिक मुकदमों के भय को कम करता है। यह नीतियों में अधिक निश्चितता भी लाता है। इस प्रकार यह "व्यापार सुगमता" (इज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस) को बेहतर बनाता है।
- फ्रांसिस फुकुयामा के अनुसार, विश्वास के उच्च स्तर वाले समाज विश्वास के निम्न स्तर वाले समाजों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक विकसित होते हैं।
- स्वैच्छिक अनुपालन: यह दंडात्मक प्रवर्तन के स्थान पर पारदर्शिता, डिजिटल प्रणालियों तथा स्व-प्रमाणन तंत्र के माध्यम से स्वैच्छिक अनुपालन को प्रोत्साहित करता है।
- वर्ष 2014 में शपथ-पत्रों के स्थान पर दस्तावेजों के स्व-प्रमाणन की व्यवस्था लागू की गई। इससे राजपत्रित अधिकारियों अथवा नोटरी द्वारा प्रमाणन की आवश्यकता समाप्त हुई। इससे आम नागरिकों का जीवन सरल हुआ और शासन के प्रति विश्वास को बढ़ावा मिला।
- स्व-प्रमाणन तंत्र जीन-जैक्स रूसो के सामाजिक अनुबंध सिद्धांत (Social Contract Approach) के अनुरूप है।
- न्यायालयों में लंबित मामले: भारत के सभी स्तरों की न्यायालयों में लगभग 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें से अधिकांश मामले (लगभग 85% से 87%) अधीनस्थ जिला न्यायालयों में लंबित हैं। नियमों को सरल बनाने से इन मुकदमों का बोझ भी कम होगा।
- प्रशासनिक दक्षता: यह व्यवस्था छोटे प्रक्रियात्मक उल्लंघनों की निगरानी में संसाधनों के अत्यधिक उपयोग को कम करती है। इस प्रकार विश्वास-आधारित व्यवस्था प्रशासन को बेहतर शासन परिणामों पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाती है।
- नागरिक-केंद्रितता: यह लोक प्रशासन में सुलभता तथा उत्तरदायित्व को बढ़ाता है। इससे शासन अधिक भागीदारीपूर्ण और नागरिक-अनुकूल बनता है।
विश्वास-आधारित शासन से संबंधित चुनौतियां
- प्रवर्तन संबंधी चुनौतियां: अत्यधिक विनियमन का उन्मूलन तथा स्व-अनुपालन पर अत्यधिक निर्भरता हानिकारक हो सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण, श्रम कल्याण और वित्तीय विनियमन जैसे गंभीर मामलों में उल्लंघनों के विरुद्ध डर या निवारक प्रभाव कमजोर हो सकता है।
- संस्थागत बाधाएं: प्रभावी विश्वास-आधारित शासन के लिए मजबूत संस्थाएं, प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा सुदृढ़ डिजिटल अवसंरचना आवश्यक है। हालांकि, मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता की कमी प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
- उदाहरण के लिए, संसदीय रिपोर्ट के अनुसार, CBI में लगभग 15% पद रिक्त हैं।
- डिजिटल विभाजन: डिजिटल शासन पर अत्यधिक निर्भरता ग्रामीण जनसंख्या, छोटे व्यवसायों तथा डिजिटल साक्षरता से वंचित नागरिकों के लिए बाधा उत्पन्न कर सकती है। इंटरनेट की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध न होने से असमानता और सामाजिक बहिष्करण की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के आंकड़ों के अनुसार, केवल 24% ग्रामीण परिवारों के पास इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 66% है।
- साइबर सुरक्षा: शासन के तीव्र डिजिटलीकरण से डेटा अतिक्रमण/चोरी (Data Breaches), साइबर हमलों तथा व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग का जोखिम बढ़ जाता है।
- उदाहरण के लिए, साइबर सुरक्षा की घटनाएं 2022 में 10.29 लाख से बढ़कर 2024 में 22.68 लाख हो गईं।
- अविश्वास की औपनिवेशिक विरासत: भारत की औपनिवेशिक नौकरशाही ने संदेह और अत्यधिक नियंत्रण की संस्कृति को जन्म दिया था। यह पुरानी मानसिकता विश्वास-आधारित शासन को अपनाना कठिन बनाती है।

आगे की राह
- सहकारी संघवाद को प्रोत्साहित करना: केंद्र और राज्यों को मिलकर कार्य करना चाहिए। उन्हें विनियमों में तालमेल व समन्वय स्थापित करना चाहिए और अनुपालन व्यवस्थाओं को सरल बनाना चाहिए। पूरे देश में एकसमान व्यवस्था लागू करने के लिए शासन की सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करना चाहिए।
- नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देना: हितधारक परामर्श, शिकायत निवारण तंत्र तथा सार्वजनिक प्रतिक्रिया तंत्र को संस्थागत स्वरूप प्रदान करना चाहिए। इस प्रकार पारदर्शिता, जवाबदेही तथा सहभागी शासन को सुदृढ़ किया जा सकता है।
- संस्थागत क्षमता को मजबूत करना: प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ सिविल सेवकों की क्षमता भी बढ़ाई जानी चाहिए। रिक्त पदों को भरा जाना चाहिए और डिजिटल अवसंरचना में निवेश करना चाहिए। प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए 'परिणाम-उन्मुख' शासन प्रथाओं को अपनाना आवश्यक है।
- प्रौद्योगिकी आधारित शासन को अपनाना: डिजिटल लेन-देन एक ऑडिट ट्रेल (Audit Trail) बनाते हैं। यह अनैतिक व्यवहार को हतोत्साहित करता है तथा वास्तविक समय में अनियमितताओं की पहचान करने में सहायता करता है।
- डिजिटल समावेशन: इंटरनेट संपर्क, डिजिटल साक्षरता तथा ई-गवर्नेंस सेवाओं की सुलभता में सुधार आवश्यक है, ताकि विश्वास-आधारित शासन के लाभ ग्रामीण और कमजोर वर्गों तक पहुंच सकें।
- व्यापक अनुपालन सुधार: डिजिटलीकरण, AI-सक्षम अनुपालन प्रणाली, अनावश्यक नियमों की समाप्ति, निरीक्षणों की संख्या में कमी, अनुपालन लागत में कमी तथा पारदर्शी प्रवर्तन तंत्र के माध्यम से विश्वास-आधारित शासन को मजबूत किया जाना चाहिए।