नदी बेसिन प्रबंधन (आरबीएम) योजना | Current Affairs | Vision IAS

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संक्षिप्त समाचार

22 May 2026

केंद्र सरकार ने ₹2183 करोड़ की अनुमानित लागत के साथ 16वें वित्त आयोग की अवधि (2026-27 से 2030-31) के दौरान इस योजना को जारी रखने की मंजूरी दी है। यह योजना पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है।

नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना के बारे में  

  • शुरुआत: इसे 2014 में केंद्रीय क्षेत्रक योजना के रूप में शुरू की गई थी।
  • प्रशासन: केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के तहत जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग द्वारा प्रशासित।
  • भौगोलिक दायरा और प्राथमिकता वाले क्षेत्र: रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और जल-समृद्ध लेकिन कम विकसित क्षेत्र, विशेष रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र, और जम्मू-कश्मीर/ लद्दाख में सिंधु नदी बेसिन।
    • उपर्युक्त बेसिनों (नदी घाटियों) को राष्ट्रीय जल सुरक्षा, सीमा पार जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और पारिस्थितिकी संधारणीयता के महत्व के कारण प्राथमिकता दी गई है।
  • संस्थागत संरचना: योजना के निम्नलिखित दो व्यापक घटक हैं:
    • ब्रह्मपुत्र बोर्ड: पूर्वोत्तर क्षेत्र में बेसिन-स्तरीय योजना और बाढ़ प्रबंधन के लिए।
    • जल संसाधन विकास योजना की जांच (IWRDS): इसे निम्नलिखित के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है:
      • केंद्रीय जल आयोग (CWC): यह सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन जैसी जल संसाधन परियोजनाओं के लिए सर्वेक्षण, जांच और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करता है।
      • राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA): यह राष्ट्रीय स्तर पर जल संसाधन योजना पर ध्यान केंद्रित करती है, विशेष रूप से नदी जोड़ो परियोजना के तहत।

नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना के तहत कार्यवाही के प्रमुख क्षेत्र:

  • बेसिन योजना: जल संसाधनों के संरक्षण और उपयोग के मार्गदर्शन के लिए दीर्घकालिक मास्टर प्लान बनाना और उन्हें अद्यतन करना।
  • बाढ़ और नदी-कटाव प्रबंधन: भूमि, समुदायों और अवसंरचनाओं की रक्षा के लिए संरचनात्मक और बायो-इंजीनियरिंग उपायों को लागू करना।
  • जल-निकासी मार्ग का विकास: ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में भूमि उत्पादकता बढ़ाने के लिए जलभराव वाले क्षेत्रों में जल अपवाह में सुधार करना।
  • समुदाय-आधारित उपाय: स्थानीय जल संरक्षण प्रथाओं, पारिस्थितिकी तंत्र विकास और स्प्रिंग शेड (झरना क्षेत्र) प्रबंधन में सुधार के लिए वैज्ञानिक और स्वदेशी तरीकों का मिश्रण करना।

केंद्र सरकार ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित किया

  • ये नियम प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 में संशोधन करते हैं, जिन्हें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया गया था।

संशोधन नियम 2026 के द्वारा प्रमुख परिवर्तन

  • अनिवार्य पुनर्नवीनीकृत सामग्री: उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को अपनी पैकेजिंग में क्रमिक रूप से अधिक मात्रा में पुनर्नवीनीकृत प्लास्टिक का उपयोग करना होगा। 
    • जैसे कि श्रेणी I की प्लास्टिक पैकेजिंग में 2025-26 तक कम से कम 30% पुनर्चक्रित सामग्री का उपयोग अनिवार्य है, जिसे 2028-29 तक बढ़ाकर 60% करना होगा।
    • यदि भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) या केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) जैसे सांविधिक निकाय कुछ उपयोगों के लिए पुनर्नवीनीकृत प्लास्टिक को प्रतिबंधित करते हैं, तो छूट लागू होगी।
    • खाद्य पदार्थों के संपर्क में आने वाली पैकेजिंग (फूड-कॉन्टैक्ट) में पुनर्चक्रित प्लास्टिक के उपयोग के जो लक्ष्य वित्त वर्ष 2025-26 में पूरे नहीं हो पाए, उन्हें अधिकतम तीन वर्षों तक आगे ले जाया जा सकता है।
  • स्पष्ट परिभाषाएँ: संशोधन में "एंड ऑफ लाइफ डिस्पोजल", "पुनः उपयोग" और "प्लास्टिक अपशिष्ट संसाधक" जैसी शब्दावलियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, ताकि नियमों में किसी प्रकार की अस्पष्टता न रहे।
  • पुनः उपयोग के दायित्व: श्रेणी I (कठोर) की प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए पुनर्चक्रित सामग्री के न्यूनतम पुनः उपयोग के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं (जैसे बड़े पेयजल कंटेनरों के लिए 85% तक)।
  • सख्त मानक: पुनर्नवीनीकृत पैकेजिंग को भारतीय मानक IS 14534:2023 के अनुरूप होना चाहिए और उस पर पुनर्नवीनीकृत सामग्री को दर्शाने वाले विशेष लेबल होने चाहिए।
  • विनियमन एवं क्रियान्वयन: इसे शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) द्वारा विकेंद्रीकृत रूप से लागू किया जाएगा, जिसकी निगरानी राज्य स्तरीय समिति करेगी। साथ ही पंजीकृत पर्यावरण ऑडिटर द्वारा डिजिटल ट्रैकिंग और ऑडिट किया जाएगा।

प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के बारे में

  • उद्देश्य: प्लास्टिक अपशिष्ट के उत्पादन को कम करना, पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से अपशिष्टों का निपटान सुनिश्चित करना।
  • मुख्य प्रावधान:
    • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रह, पुनर्चक्रण और निपटान के लिए जिम्मेदार होते हैं।
    • सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध (2022 में संशोधन): प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए कुछ चिन्हित सिंगल-यूज प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
      • प्लास्टिक मोटाई मानक: पुनः उपयोग को बढ़ावा देने और अपशिष्ट फैलाव (लिटरिंग) को कम करने के लिए अनुमत सिंगल यूज प्लास्टिक की न्यूनतम मोटाई 120 माइक्रोन निर्धारित की गई है।
    • निगरानी (2025 संशोधन): 1 जुलाई 2025 से, सभी प्लास्टिक पैकेजिंग पर बारकोड या QR कोड होना अनिवार्य है, जिससे उत्पादन से लेकर निपटान तक डिजिटल तरीके से निगरानी संभव हो सके।
    • स्थानीय निकायों की भूमिका: शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) और ग्राम पंचायतें प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रह, पृथक्करण और प्रसंस्करण के लिए जिम्मेदार हैं।

शेखा झील पक्षी अभयारण्य भारत का 99वां रामसर स्थल बन गया है।

  • रामसर स्थल वे स्थल हैं जिन्हें रामसर कन्वेंशन (1971) के तहत 'अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की सूची' में सूचीबद्ध किया गया है।

शेखा झील पक्षी अभयारण्य के बारे में:

  • अवस्थिति: अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में।
  • यह ताजे जल का बारहमासी जलाशय है। इसका अस्तित्व 1852 में ऊपरी गंगा नहर के निर्माण के बाद सामने आया था। 
  • प्राप्त प्रमुख पक्षी: इंडियन रिवर टर्न (स्टर्ना औरंटिया) और सारस क्रेन (ग्रूस एंटीगोन)। 
  • इसे बर्डलाइफ इंटरनेशनल द्वारा एक 'महत्वपूर्ण पक्षी और जैव विविधता क्षेत्र' (IBA) के रूप में नामित किया गया है।

केंद्र सरकार ने कोच्चि स्थित रेफरल केंद्र "भवसागर" और अगरकर अनुसंधान संस्थान को गहरे समुद्री जीवों के राष्ट्रीय भंडार  के रूप में अधिसूचित किया है 

  • कोच्चि के 'समुद्री सजीव संसाधन एवं पारिस्थितिकी केंद्र' (CMLRE) में स्थित "भवसागर" रेफरल सेंटर में 3,500 से अधिक वर्गिकीय रूप से पहचाने गए और भू-संदर्भित वाउचर नमूने मौजूद हैं।
  • अगरकर अनुसंधान संस्थान (पुणे) को MACS सूक्ष्मजीव संग्रह और राष्ट्रीय कवक संवर्धन संग्रह के लिए नामित किया गया है। 
    • जैव विविधता अधिनियम के तहत, यह भंडार:
      • जैविक नमूनों को सुरक्षित रूप से संरक्षित करेगा, 
      • गहरे समुद्र की खोजी गई नई प्रजातियों के संरक्षक के रूप में कार्य करेगा, और
      • संयुक्त राष्ट्र महासागर-विज्ञान दशक (2021-2030) के अनुरूप गहरे समुद्र के जीवों की वर्गिकी में विशेषज्ञता सुनिश्चित करेगा।

गहरे समुद्र (Deep Sea) के बारे में

  • परिभाषा: यह महासागर के उन क्षेत्रों को दर्शाता है जो 200 मीटर से अधिक गहरे होते हैं, जो ट्वाइलाइट ज़ोन से लेकर वितलीय मैदान (abyssal plains) और गहरे समुद्री नितल तक फैले होते हैं। 
  • यह पृथ्वी पर प्राचीनतम और सबसे बड़ा बायोम है, जो पृथ्वी के जीवन-योग्य स्थान का लगभग 90-95% हिस्सा है।

समुद्री पर्यावरण की रक्षा करने वाले वैश्विक ढांचे

  • संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि अभिसमय (UNCLOS): यह समुद्री पर्यावरण की रक्षा करने और समुद्री संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को प्रबंधित करने के लिए वैश्विक विधिक व्यवस्था है।
  • जैव विविधता अभिसमय (CBD): यह अभिसमय जैव विविधता के संरक्षण, इसके घटकों के संधारणीय उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत साझाकरण को बढ़ावा देता है।
  • सतत विकास लक्ष्य (SDG)-14: यह "जलीय जीवन" के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • खुला समुद्र संधि यानी हाई सीज ट्रीटी: इसे राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता (BBNJ) समझौता भी कहा जाता है। यह कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है। यह संधि राष्ट्रों के अधिकार क्षेत्र के बाहर के जलीय पारितंत्र की रक्षा करती है।   

हाल ही में आयोजित अपनी 77वीं बैठक में, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने जैव विविधता अधिनियम, 2002 के कार्यान्वयन को सुदृढ़ करने के लिए नए फ्रेमवर्क को मंजूरी दी। 

  • यह नया फ्रेमवर्क, 'पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) फंड के उपयोग की प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करके और नामित रिपॉजिटरी (संग्रहागारों) के लिए संशोधित दिशानिर्देशों के माध्यम से, BDA, 2002 को और अधिक सशक्त बनाता है।

नया जैव-विविधता फ्रेमवर्क  

  • ABS फंड का उपयोग:
    • पहचान योग्य स्रोत:
      • जब संसाधन पहचान योग्य संस्थानों या रिपॉजिटरी से प्राप्त किए जाते हैं, तो ABS फंड का 25-40% हिस्सा उन्हें दिया जाएगा।
      • शेष 60-75% हिस्सा राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) और संघ राज्य क्षेत्रों की जैव विविधता परिषदों (UTBCs) के माध्यम से स्थानीय समुदायों के साथ साझा किया जाएगा।
    • अज्ञात स्रोत: यदि जैव संसाधनों तक पहुंच मध्यवर्तियों या व्यापारियों के माध्यम से प्राप्त की जाती है, तो ABS फंड का उपयोग सीधे जैव विविधता संरक्षण और प्रबंधन के लिए किया जाएगा।
  • संशोधित रिपॉजिटरी दिशा-निर्देश: इसमें संसाधनों की पहचान और निगरानी के लिए डिजिटल रिकॉर्ड रखने को बढ़ावा  देने जैसे प्रावधान शामिल हैं।

 'पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS)’  क्या है?

  • ABS से तात्पर्य है कि आनुवंशिक संसाधनों तक कैसे पहुँचा जा सकता है और उनके उपयोग से होने वाले लाभों को उन संसाधनों का उपयोग करने वाले समुदायों/देशों (उपयोगकर्ता) और संसाधनों को प्रदान करने वालों (प्रदाता) के बीच कैसे साझा किया जाता है।
  • ABS फ्रेमवर्क: यह जैव विविधता अभिसमय (CBD) के अंतर्गत विनियमित होता है।
    • बॉन दिशानिर्देश और नागोया प्रोटोकॉल (2010) 'पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS)’ से संबंधित हैं।
  • भारत में यह जैव विविधता अधिनियम, 2002 के साथ-साथ पहुँच और लाभ साझाकरण (ABS) विनियम, 2025 के तहत विनियमित होता है।
  • कलाई-II HEP (अरुणाचल प्रदेश): यह लोहित नदी पर प्रस्तावित है। लोहित, ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख सहायक नदी है। यह पूर्वी तिब्बत में उत्पन्न होती है और अरुणाचल प्रदेश से होकर असम में बहती है। 
  • कमला HEP (अरुणाचल प्रदेश): यह कमला नदी पर स्थित है, जो सुबनसिरी नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सभी राज्य और केंद्रीय प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे 31 दिसंबर, 2027 के बाद नए या अतिरिक्त HFC उत्पादन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी देना बंद कर दें।

  • यह निर्देश किगाली संशोधन के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।

किगाली संशोधन (2016) के बारे में

  • इसके तहत, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के पक्षकार देश HFCs के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध रूप से कम करने पर सहमत हुए थे।
    • ध्यातव्य है कि HFCs को ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) के ऐसे विकल्प के रूप में पेश किया गया था जो ओजोन को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
      • हालांकि HFCs ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुँचाते, लेकिन इनकी वैश्विक तापवृद्धि क्षमता (GWP) बहुत अधिक (CO₂ की तुलना में 12 से 14,000 गुणा) है
  • प्रमुख लक्ष्य:
    • पक्षकार देश 2040 के दशक के अंत तक HFCs के उपयोग को 80-85% तक कम करने पर सहमत हुए।
    • भारत वर्ष 2032 के बाद से 4 चरणों में HFCs के उपयोग में चरणबद्ध रूप से कमी करेगा: 2032 में 10%, 2037 में 20%, 2042 में 30% और 2047 में 85% की संचयी कमी

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) के बारे में

  • यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
    • इसे वियना अभिसमय के तहत लागू किया गया। वियना अभिसमय को 1985 में अपनाया गया था।  
  • शामिल पदार्थ: यह प्रोटोकॉल क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) और हैलोन जैसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) को लक्षित करता है।
  • 1992 तक, इसे सार्वभौमिक रूप से अनुमोदित कर दिया गया था, अर्थात संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश इस पर हस्ताक्षर कर चुके थे। इसमें 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों' (Common but Differentiated Responsibilities) के सिद्धांत को लागू किया गया।

केंद्र सरकार ने विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) में सिंथेटिक हाइड्रोकार्बन के मिश्रण की अनुमति दी है। इससे भविष्य में विमानन ईंधन के रूप में इथेनॉल के उपयोग का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।  

  • व्यापक रूप से जेट ईंधन के रूप में ज्ञात ATF को मुख्य रूप से कच्चे तेल को परिशोधित करके उत्पादित किया जाता है। 

संधारणीय विमानन ईंधन (SAF) के बारे में: 

  • संधारणीय विमानन ईंधन एक प्रकार का तरल ईंधन है। इसे अपशिष्ट तेल और वसा, नगरपालिका अपशिष्ट और गैर-खाद्य फसलों सहित कई स्रोतों (फीडस्टॉक) से उत्पादित किया जा सकता है।
  • महत्व: यह कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 80% तक कम करता है। 
  • SAF को विभिन्न स्तरों पर मिश्रित किया जा सकता है। फीडस्टॉक और उत्पादन विधि के आधार पर इसकी सीमा 10% से 50% के बीच होती है।
  • भारत कोर्सिया (CORSIA) मैंडेट के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए 2027 तक जेट ईंधन में 1 प्रतिशत SAF मिश्रित करने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य 2028 तक 2 प्रतिशत और 2030 तक 5 प्रतिशत हो जाएगा। 
    • अंतरराष्ट्रीय विमानन के लिए कार्बन ऑफसेटिंग और रिडक्शन योजना (CORSIA) का नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय नागरिक विमानन संगठन (ICAO) द्वारा किया जाता है। 
    • घरेलू उड़ानों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के लिए अब तक कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है।

भारत आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए फ्लेक्स फ्यूल वाहनों को तेजी से अपनाने पर विचार कर रहा है।

फ्लेक्स फ्यूल वाहनों (FFVs) के बारे में:

  • FFVs संशोधित वाहन हैं। ये वर्तमान में पूरी तरह से केवल गैसोलीन या गैसोलीन और इथेनॉल के किसी भी मिश्रण (83% या E83 तक) पर चलने में सक्षम हैं। 
    • आधुनिक FFVs को अब इस तरह डिज़ाइन किया जा रहा है कि वे उच्च इथेनॉल मिश्रणों, जैसे E100 (शुद्ध एथेनॉल), पर भी चल सकें
  • इनमें सामान्य पेट्रोल-वाहनों की तरह ही पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन होता है। लेकिन इनमें इथेनॉल के अनुकूल फ्यूल सिस्टम और अलग प्रकार का पावरट्रेन कैलिब्रेशन होता है, जिससे ये पेट्रोल के साथ-साथ इथेनॉल मिश्रण पर भी सुचारू रूप से चल सकें।
  • उच्च इथेनॉल मिश्रणों पर चलते समय ये बेहतर ऐक्सीलरेशन परफॉरमेंस दर्शाते हैं।

केंद्र सरकार ने तेल रिसाव के विषाक्त अवशेषों से होने वाले समुद्री प्रदूषण से निपटने के लिए टार-बॉल्स प्रबंधन नियम, 2026 का मसौदा अधिसूचित किया है। 

मुख्य प्रावधान: 

  • सम्पूर्ण प्रक्रिया (लाइफ-साइकिल ) को शामिल करता है: इसमें उत्पादन, संग्रह, भंडारण, परिवहन, उपचार और निपटान शामिल हैं।
  • ‘प्रदूषक द्वारा भुगतान’ का सिद्धांत: यह तेल उत्पादन से जुड़े ऑपरेटरों पर जिम्मेदारी तय करता है। इसमें पर्यावरण को हुए नुकसान की प्रतिपूर्ति का प्रावधान भी शामिल है। 
  • हितधारकों की जिम्मेदारियां: इसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और तटरक्षक बल जैसे निकायों की भूमिकाएं निर्धारित की गई हैं। 
  • आपदा घोषणा: गंभीर मामलों में निगरानी, रिपोर्टिंग और ‘राज्य आपदा’ घोषित करने का अधिदेश देता है। 

टार-बॉल्स (Tar balls) के बारे में:

  • ये तेल रिसाव और समुद्र में जहाजों की दुर्घटनाओं के बाद तेल के अपक्षय (weathering) के कारण बने चिपचिपे पदार्थ हैं। 
  • इनका निर्माण तब होता है जब तेल जल और अन्य संदूषकों के साथ मिलता है। यह प्रक्रिया भौतिक, रासायनिक और जैविक होती है। 
  • इन्हें खतरनाक अपशिष्ट के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनका सुरक्षित रख-रखाव और निपटान आवश्यक है।

अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने अंटार्कटिक की कुछ प्रजातियों की संकटापन्न प्रजातियों की लाल सूची (Red List) को संशोधित किया है। 

एम्परर पेंगुइन (Aptenodytes forsteri):

  • संशोधित IUCN स्थिति: एंडेंजर्ड, जो पहले 'नियर थ्रेटेन्ड' थी।
  • कारण: जलवायु परिवर्तन। 
  • विशेषताएं: यह पेंगुइन की 18 प्रजातियों में सबसे बड़ी है। इसमें शल्क जैसी परतों वाले पंखों के रूप में उत्कृष्ट इन्सुलेशन और शरीर में वसा का बड़ा भंडार होता है। 

फर सील (Arctocephalus gazella):

  • संशोधित IUCN स्थिति: एंडेंजर्ड, जो पहले 'लीस्ट कंसर्न' थी।
  • कारण: जलवायु परिवर्तन।
  • विशेषताएं: ये सबसे छोटी सील हैं और सी लॉयन से निकटता से संबंधित हैं। ये चारों फ्लिपर्स (पंख/पाद) पर चलने में सक्षम हैं और जमीन पर प्रजनन करती हैं। वसा की परतों वाली अन्य सील के विपरीत, गर्मी प्रदान करने के लिए इनके पास फर का मोटा कोट होता है।

सदर्न एलीफेंट सील (Mirounga leonina): 

  • संशोधित IUCN स्थिति: वल्नरेबल, जो पहले 'लीस्ट कंसर्न' थी।
  • कारण: बर्ड फ्लू (एवियन इन्फ्लूएंजा)।
  • विशेषताएं: ये पृथ्वी पर सील की सबसे बड़ी प्रजाति हैं। व्हेल के अलावा ये पृथ्वी पर सबसे बड़े स्तनपायी हैं और इनमें ब्लबर (वसा) की मोटी परत होती है। 

यह पहल मार्च 2026 में ब्राजील के कैम्पो ग्रांडे में आयोजित “वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS)” के पक्षकारों के 15वें सम्मेलन (COP15) में शुरू की गई।

प्रवासी प्रजातियों के दोहन पर वैश्विक पहल (GTI) के बारे में

  • परिचय: यह सरकारों, संरक्षण संगठनों, स्थानीय समुदायों आदि के बीच एक सहयोगात्मक वैश्विक पहल है। इसका उद्देश्य प्रवासी प्रजातियों के अवैध और असंधारणीय दोहन के कारणों को दूर करना है।
    • “विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति पर रिपोर्ट 2024” के अनुसार, अवैध और असंधारणीय दोहन की वजह से CMS के तहत सूचीबद्ध 1,200 प्रजातियों में से 70% के अस्तित्व को खतरा है।
      • रिपोर्ट के अनुसार, शिकार, भोजन के लिए मात्स्यिकी, बिक्री, खेल, औषधि बनाने में इस्तेमाल  जैसे घरेलू कारक प्रवासी प्रजातियों के दोहन के प्रमुख कारण हैं।
  • उद्देश्य: देशों को जैव विविधता-संरक्षण की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करना। जैसे कि कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क के तहत प्रजातियों की पुनर्बहाली करना और विलुप्ति को रोकना
  • कार्य के 4 प्रमुख क्षेत्र:
    • डेटा और निगरानी में सुधार;
    • विधिक और नीतिगत फ्रेमवर्क को मजबूत करना;
    • सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाना;
    • जागरूकता का प्रसार।
  • साझेदार संगठन: जैव विविधता अभिसमय (CBD), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र (UNEP-WCMC), प्रकृति के लिए विश्व वन्यजीव कोष (WWF) और TRAFFIC, आदि।

वैज्ञानिकों ने अरुणाचल प्रदेश में मेंढक की एक नई प्रजाति, 'लिम्नोनेक्ट्स मोतीझील' की खोज की है। 

लिम्नोनेक्ट्स मोतीझील के बारे में:

  • यह एक ऐसे समूह से संबंधित है जिसे आमतौर पर 'फ़ैंग्ड फ्रॉग्स' कहा जाता है। यह नाम नर के निचले जबड़े में छोटे, फ़ैंग जैसे उभारों के कारण दिया गया है। 
  • ये मेंढक पूरे दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाते हैं। ये अपनी असामान्य प्रजनन आदतों के लिए जाने जाते हैं।
  • पानी में या पत्तियों पर अंडे देने वाले अधिकतर मेंढकों के विपरीत, यह प्रजाति जंगल की सतह पर बिखरी पत्तियों के नीचे मिट्टी से घोंसला बनाती है। 
    • यह भारत में इस समूह के मेंढकों में पहले कभी दर्ज नहीं किया गया व्यवहार है।
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हाल ही में, वैज्ञानिकों ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक हिमालय की तलहटी में जीवाश्मों की खोज की है। 

  • यह भारत में गौरामी मछली का पहला जीवाश्म रिकॉर्ड है और विश्व स्तर पर इंडोनेशिया के सुमात्रा में खोजे गए जीवाश्म के बाद दूसरा ज्ञात रिकॉर्ड है। 
  • ये जीवाश्म लगभग 5 मिलियन वर्ष पुराने (अतिनूतन युग या प्लायोसीन युग) हैं।
  • यह एक ऐसे क्षेत्र में जलीय जीवाश्मों की पहली खोज है जिसे पहले केवल स्थलीय अवशेषों के लिए जाना जाता था। 
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भारत में चमगादड़ों का पहला आकलन इनके समक्ष खतरों और डेटा संबंधी प्रमुख समस्याओं को रेखांकित करता है। 

  • यह रिपोर्ट नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन, बैट कंज़र्वेशन इंटरनेशनल आदि द्वारा तैयार की गई है। 

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु: 

  • प्रजातीय विविधता: लगभग 135 चमगादड़ प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें से 16 प्रजातियां स्थानिक (endemic) हैं।
    • IUCN द्वारा सात प्रजातियों को थ्रीटेंड (संकटापन्न) श्रेणियों के तहत सूचीबद्ध किया गया। 
  • खतरे: शहरीकरण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 का स्रोत होने का कलंक मुख्य खतरे हैं। 

चमगादड़ों के बारे में:

  • चमगादड़ स्तनपायी जीव हैं जो जीवित बच्चों को जन्म देते हैं। इनके शरीर बालों से ढके होते हैं और ये गर्म रक्त वाले होते हैं।
  • ये एकमात्र ऐसे स्तनपायी हैं जो उड़ने में सक्षम हैं। 
  • प्रतिध्वनि निर्धारण (Echolocation): अधिकांश चमगादड़ पूर्ण अंधकार में उड़ने के लिए उच्च-आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करते हैं। वे इसी तकनीक की सहायता से शिकार भी करते हैं। 
  • महत्व: ये परागण, कीट नियंत्रण और बीज प्रसार जैसी प्रमुख पारितंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं।
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हाल ही में, किए गए एक अध्ययन में अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन के संभावित क्षरण की चेतावनी दी गई है, जिसका वैश्विक जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है

अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) क्या है?

  • यह समुद्री धाराओं की एक प्रणाली है, जो अटलांटिक महासागर में जल का परिसंचरण करती है। यह प्रणाली गर्म जल को उत्तर की ओर और ठंडे जल को दक्षिण की ओर ले जाती है।
  • यह परिसंचरण तापमान और लवणता के अंतर से संचालित होता है। इस अंतर से जल के घनत्व में अंतर पैदा होता है। इसे थर्मोहैलाइन सर्कुलेशन कहा जाता है।
  • AMOC की प्रक्रिया
    • AMOC मेक्सिको की खाड़ी से गर्म और खारा जल उत्तरी अटलांटिक तक ले जाता है। इस वजह से पश्चिमी यूरोप का तापमान कनाडा या रूस की तुलना में अधिक सामान्य (कम ठंडा) रहता है।
    • ठंडा और अधिक सघन जल नीचे डूब जाता है और अटलांटिक महासागर के पश्चिमी हिस्से के समुद्री नितल के साथ दक्षिण की ओर बहता है।
    • बाद में यह गहरा जल अंततः उद्वेलन (Upwelling) के माध्यम से फिर से ऊपर उठता है, गर्म होता है, और चक्र को फिर से शुरू करता है।
  • महत्व: AMOC महासागरीय धाराओं की "वैश्विक कन्वेयर बेल्ट" का हिस्सा है, जो संपूर्ण अटलांटिक महासागर में जल, ऊष्मा और पोषक तत्वों का वितरण करता है। 

AMOC क्यों कमजोर हो रहा है?

  • जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र में ताजे जल का प्रवेश: ग्रीनलैंड की पिघलती बर्फ की चादर से लगभग 5,000 घन किलोमीटर ताजा जल उत्तरी अटलांटिक महासागर के उप-ध्रुवीय क्षेत्र में प्रवेश कर गया है।
    • यह ताजा जल समुद्री जल की लवणता और घनत्व को कम कर देता है। परिणामस्वरूप, AMOC के गहराई की ओर जाने तथा परिसंचरण के लिए आवश्यक सघन जल कम पड़ जाता है। इससे अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन कमजोर पड़ जाता है। 

AMOC के बंद या कमजोर होने के संभावित परिणाम क्या हैं?

  • जलवायु में अस्थिरता उत्पन्न होना: अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन के कमजोर होने या बंद हो जाने से जलवायु में बड़ा बदलाव (टिपिंग पॉइंट) आ सकता है, जिसका प्रभाव पूरे विश्व  पर पड़ेगा। 
    • वैश्विक तापमान में बदलाव: यूरोप में कड़ाके की ठंड पड़ सकती है और खेती में नुकसान हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, AMOC के बंद होने से आर्कटिक क्षेत्र का तापमान लगभग 7°C तक कम हो सकता है।
      • यह दक्षिणी महासागर को कार्बन अवशोषण करने वाले क्षेत्र के बजाय कार्बन उत्सर्जन वाले क्षेत्र में बदल सकता है। इससे विश्व का तापमान और बढ़ सकता है। 
  • वर्षा के पैटर्न में बदलाव: AMOC दोनों गोलार्धों के बीच गर्मी का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके कमजोर या बंद होने से उष्णकटिबंधीय वर्षा पट्टी (tropical rain belt) दक्षिण की ओर खिसक सकती है। इससे:
    • अफ्रीका के साहेल क्षेत्र और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ सकता है।
    • भारत में मानसून प्रभावित हो सकता है, जो खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
  • समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: समुद्री सतह के जल तक कम पोषक तत्व पहुंचेंगे, जिससे समुद्री खाद्य श्रृंखला को नुकसान होगा।

 

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यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक कार्य विभाग (DESA) ने जारी की है। इसमें विकास के वित्तपोषण को सही दिशा में मोड़ने में “सेविला प्रतिबद्धता’ (Sevilla Commitment) की भूमिका को रेखांकित किया गया है।

रिपोर्ट में रेखांकित मुख्य मुद्दे

  • वैश्विक अर्थव्यवस्था की नाजुक स्थिति: वैश्विक स्तर पर मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है और इसमें गिरावट की आशंका बनी हुई है।
    • प्रत्येक चार में से एक विकासशील देश की प्रति व्यक्ति आय 2019 के स्तर से भी कम है। 
    • मध्य पूर्व में जारी संघर्ष से ऊर्जा की कीमतों, व्यापार और वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
  • वित्तीय दबाव: कई विकासशील देशों को ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेना पड़ रहा है, कर्ज चुकाने/रीफाइनेंस (रोलओवर) का जोखिम बढ़ गया है। पिछले दो दशकों में विकासशील देशों में कर राजस्व में बहुत कम वृद्धि हुई है।
  • अधिक विभाजित विश्व: इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और विकास में सहयोग की संरचना प्रभावित हो रही है। सीमा-पार भुगतान प्रणालियों में बदलाव दिख रहा है, जैसे स्विफ्ट (SWIFT) प्रणाली के विकल्पों का उभरना

प्राथमिक कार्रवाइयाँ और सिफारिशें

  • वित्तपोषण का विस्तार: सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की प्राप्ति के लिए वित्तपोषण और निवेश में लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की कमी है। इस कमी को दूर करने के लिए घरेलू निजी क्षेत्र को मजबूत करना और अर्थव्यवस्था में विविधता को बढ़ावा देना जरूरी है।
  • वित्तपोषण को सतत विकास के परिणामों से जोड़ना: यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निजी और सार्वजनिक, दोनों प्रकार का वित्तपोषण उच्च गुणवत्ता वाला हो और उसका वास्तविक प्रभाव पड़े, साथ ही, यह देश की अपनी विकास रणनीतियों के अनुरूप हो।
  • लचीलापन (रेजिलिएंस) बढ़ाना: मजबूत घरेलू संस्थानों का निर्माण करना चाहिए। कर्ज, बीमा और निवेश जैसे वित्तीय उत्पादों में जोखिम का पहले से आकलन करना चाहिए, ताकि लचीलापन बढ़े और नुकसान कम हो सके।
  • बहु-स्तरीय सहयोग आधारित दृष्टिकोण को अपनाना:  राष्ट्रीय विकास बैंकों, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना चाहिए और इनके बीच मजबूत संबंध बनाना चाहिए।
  • बहुपक्षवाद की भूमिका: एक स्थिर, पूर्वानुमान योग्य और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। इससे जोखिम कम होंगे और निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

सेविला प्रतिबद्धता के बारे में

  • अंगीकरण: इसे 2025 में स्पेन के सेविला में आयोजित चौथे अंतरराष्ट्रीय विकास वित्तपोषण सम्मेलन (FfD4) में अपनाया गया। इसका उद्देश्य  SDGs को प्राप्त करने के लिए विकासशील देशों में 4 ट्रिलियन डॉलर के वार्षिक वित्तपोषण की कमी को दूर करना है।
  • प्रमुख विशेषताएँ: वैश्विक वित्तपोषण ढांचे में 280 कार्य योजनाओं का समावेश किया गया है।
  • सेविला प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन (SPA): यह FFD4 में शुरू किया गया एक स्वैच्छिक और बहु-हितधारक तंत्र है। इसका उद्देश्य सेविला प्रतिबद्धता का शीघ्र क्रियान्वयन है।

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स्प्रिंग शेड (झरना क्षेत्र) प्रबंधन

वनों के कटाव को रोककर और उपयुक्त वनस्पति लगाकर झरनों के आसपास के क्षेत्रों का प्रबंधन करना ताकि उनके जल प्रवाह को बनाए रखा जा सके।

बायो-इंजीनियरिंग उपाय

यह पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार इंजीनियरिंग विधियाँ हैं जो प्राकृतिक प्रणालियों का उपयोग करके या उनके साथ मिलकर बाढ़ और नदी-कटाव जैसे मुद्दों को संबोधित करती हैं, जैसे कि वनस्पति का उपयोग करना।

दीर्घकालिक मास्टर प्लान

यह एक व्यापक योजना है जो जल संसाधनों के स्थायी संरक्षण और उपयोग के लिए भविष्य की रणनीतियों और दिशानिर्देशों को रेखांकित करती है।

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