उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना {Production Linked Incentive (PLI) Scheme} | Current Affairs | Vision IAS

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उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना {Production Linked Incentive (PLI) Scheme}

22 May 2026
1 min

In Summary

  • 2020 में शुरू की गई पीएलआई योजना का उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के अनुरूप वित्तीय प्रोत्साहनों के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
  • यह निवेश को आकर्षित करता है, भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकृत करता है, आयात प्रतिस्थापन, निर्यात और 14 क्षेत्रों में रोजगार सृजन को बढ़ावा देता है।
  • बाधाओं में क्षेत्रीय भिन्नताएं, सीमित लघु एवं मध्यम उद्यम भागीदारी, योजना की जटिलता, शासन संबंधी कमियां और उच्च-जटिलता वाले निर्यातों की ओर बदलाव की कमी शामिल हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना (PLISFPI) के सशक्त प्रदर्शन ने इस योजना को पुनः केंद्र में ला दिया है। इसके तहत संचयी निवेश 9,000 करोड़ रुपये के स्तर को पार कर गया है, जो कि 7,000 करोड़ रुपये के शुरुआती प्रतिबद्ध निवेश से कहीं अधिक है।

PLI योजना के बारे में 

  • प्रारंभ वर्ष: 2020
  • लक्ष्य: पात्र कंपनियों को उनकी वृद्धिशील बिक्री  के आधार पर वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करके घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को सुदृढ़ करना।
  • उद्देश्य: अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का समावेश करना, व्यापक स्तर की मितव्ययिता प्राप्त करना, लागत दक्षता सुनिश्चित करना और वैश्विक स्तर पर भारत की समष्टि आर्थिक विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना।
    • यह योजना आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण और मेक इन इंडिया पहल के अनुरूप है।
  • व्याप्ति एवं परिव्यय: यह 14 रणनीतिक क्षेत्रकों को शामिल करती है, जिसके लिए 1.97 लाख करोड़ रुपये का कुल वित्तीय परिव्यय निर्धारित किया गया है।  

PLI योजना का महत्व

ऐतिहासिक रूप से, भारत का विनिर्माण क्षेत्रक सीमित प्रौद्योगिकीय अवसंरचना, विखंडित आपूर्ति श्रृंखला और प्रमुख घटकों के लिए आयात पर भारी निर्भरता के कारण बाधित रहा है। इसकी वजह से उत्पादन लागत बढ़ी है और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी आई है। PLI योजना इन संरचनात्मक कमजोरियों को निम्नलिखित माध्यमों से संबोधित करती है:

  • निवेश आकर्षित करना: यह कंपनियों को भारत में बड़े पैमाने पर निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करती है। इससे चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में लागत संबंधी प्रतिकूलताएं कम होती हैं।
    • PLI ढांचा एक "उद्यमिता उत्प्रेरक (Entrepreneurial Catalyst)" के रूप में कार्य करता है। इसकी अभिकल्पना प्रारंभिक पूंजीगत जोखिमों को वहन करने, सार्वजनिक वस्तुओं का निर्माण करने और व्यवस्थित रूप से उच्च-मूल्य वाले निजी क्षेत्रक के निवेश को आकर्षित करने के लिए की गई है।
      • उदाहरण: भारत ने 2020-21 से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का FDI आकर्षित किया है।       
  • वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) एकीकरण: भारत मध्यवर्ती वस्तुओं के शुद्ध आयातक से धीरे-धीरे वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एक सक्रिय भागीदार बन रहा है।
    • उदाहरण: चिकित्सा उपकरणों के 57 उच्च-स्तरीय उत्पादों का अब घरेलू स्तर पर निर्माण किया जा रहा है।
  • पैमाने की मितव्ययिता प्राप्त करना: भारतीय कंपनियों को बड़े पैमाने पर लागत और गुणवत्ता के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाना।
    • उदाहरण: एप्पल जैसे मोबाइल फोन विनिर्माण ने भारत को एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
  • आयात प्रतिस्थापन: रणनीतिक क्षेत्रकों में आयात निर्भरता में लक्षित रूप से कमी लाना।
    • उदाहरण: भारत ने दूरसंचार उत्पादों में 60% आयात प्रतिस्थापन प्राप्त किया है; जैसे पेनिसिलिन G पोटेशियम का अब घरेलू उत्पादन हो रहा है।
  • निर्यात संवर्धन: निर्यात-उन्मुख विनिर्माण आधार तैयार करने में सहायता प्रदान करता है।
    • उदाहरण: मोबाइल फोन विनिर्माण ने भारत को शुद्ध आयातक से शुद्ध निर्यातक में परिवर्तित कर दिया है।
  • रोजगार सृजन: विनिर्माण क्लस्टरों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उत्पन्न करना।
  • MSMEs को बढ़ावा देना: उदाहरण के लिए, PLISFPI के तहत स्वीकृत 165 आवेदनों में से 69 आवेदक MSMEs (फरवरी 2026 तक) श्रेणी के हैं।
  • आत्मनिर्भर भारत को सुदृढ़ बनाना: रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, सक्रिय औषधीय अवयव (APIs) और ACC बैटरी जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक भेद्यता को कम करना।

केस स्टडी: दूरसंचार क्षेत्रक (आर्थिक समीक्षा 2025-26)

  • व्यापार संतुलन में व्युत्क्रम: निर्यात में 1.5% की औसत वार्षिक वृद्धि दर (AAGR) दर्ज की गई है। जबकि इसी अवधि के दौरान आयात में 18.5% (AAGR) की गिरावट आई।
  • आयात प्रतिस्थापन: PLI ढांचे के एक मुख्य उद्देश्य के रूप में विदेशी वस्तुओं को घरेलू विकल्पों से प्रतिस्थापित करने में समय से पूर्व महत्वपूर्ण उपलब्धि अर्जित हो गई।
  • मूल्य श्रृंखला एकीकरण: आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं का उपयोग करके उत्पादन क्षमता का विस्तार किया गया। इससे उच्च-मूल्य वाले निर्यातों के निर्माण और संवर्धन को बढ़ावा मिला। विनिर्माण क्षमता में सफलता बाजार की परिपक्वता की परिचायक है।

PLI योजनाओं से संबंधित बाधाएं

  • क्षेत्रवार भिन्नता: इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर पीवी और विशिष्ट इस्पात जैसे क्षेत्रकों में उच्च निर्यात वृद्धि दर्ज की गई, जबकि ऑटोमोबाइल और वस्त्र उद्योग जैसे क्षेत्रों में निर्यात वृद्धि मध्यम रही। इन क्षेत्रों में आयातित इनपुट और विदेशी तकनीक पर निर्भरता निरंतर बनी हुई है। (आर्थिक समीक्षा 2025-26)
  • लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs) की सीमित भागीदारी: उच्च निवेश सीमाएं प्रभावी रूप से लघु और मध्यम उद्यमों को बाहर कर देती हैं। इससे योजना का लाभ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित हो जाता है।
    • उदाहरण: एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, PLI योजना ने टू-व्हीलर EV बाजार में विकृति उत्पन्न कर दी है। इससे नवाचार-आधारित विनिर्माताओं के हाशिए पर जाने की संभावना बढ़ गई है।
  • अपर्याप्त रोजगार सृजन: पूंजी-प्रधान और स्वचालित विनिर्माण इकाइयों में अनुमान से कम प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होते हैं।
    • कई PLI  क्षेत्रक श्रम-गहनता के बजाय आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन और आयात प्रतिस्थापन को प्राथमिकता देते हैं
  • योजना की जटिलता: बहु-वर्षीय लक्ष्य, उत्पाद-वार सीमाएं और विकास के विभिन्न मानक अनुपालन के बोझ को बढ़ाते हैं।
    • उदाहरण: ऑडिट, प्रमाणन और बार-बार स्पष्टीकरण के लिए व्यापक दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकता।
  • शासन संबंधी खामियां: समान मानदंडों का अभाव, प्रोत्साहन प्रणाली एवं समय-सीमा में अस्पष्टता और एक केंद्रीकृत डेटाबेस की अनुपस्थिति पारदर्शिता को कम करती है।
  • संरचनात्मक सीमाएं: PLI योजना अभी तक उच्च-जटिलता वाले निर्यातों (जैसे उन्नत मशीनरी, परिशुद्ध इंजीनियरिंग वस्तुएं) की ओर परिवर्तनों को गति देने में सफल नहीं हुई है। भारत का निर्यात बास्केट अभी भी कम और मध्यम-जटिलता वाली वस्तुओं (परिष्कृत पेट्रोलियम, हीरे, चावल) तक सीमित है।
    • भारत आर्थिक जटिलता सूचकांक (ECI) में 44वें स्थान पर है, जो 2019 से अपरिवर्तित है।

आगे की राह

  • कार्यान्वयन तंत्र को सुदृढ़ करना: समर्पित PLI परियोजना स्वीकृति सेल के माध्यम से त्वरित स्वीकृति सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही, नौकरशाही में विलंब को कम करने और निवेशकों को निश्चितता प्रदान करने के लिए 'एकल खिड़की प्रणाली' का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।
  • योजना के ढांचे का सरलीकरण: लक्ष्यों को अनुकूलित करना और निवेशकों को प्रोत्साहन के पूर्वानुमानित एवं नियम-आधारित वितरण के लिए GST और सीमा शुल्क डेटा का उपयोग करके स्वचालित सत्यापन को प्राथमिकता देना चाहिए।
  • लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs) की पहुंच का विस्तार: व्यापक औद्योगिक विकास और आपूर्ति श्रृंखला को गहरा करने के लिए चुनिंदा क्षेत्रकों में MSMEs हेतु श्रेणीबद्ध निवेश सीमाएं शुरू की जा सकती हैं।
  • श्रम-गहन क्षेत्रों में विस्तार: वाणिज्य संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने PLI योजना का विस्तार रसायन, चमड़ा, परिधान और हस्तशिल्प जैसे श्रम-गहन क्षेत्रकों में करने की सिफारिश की है।
  • भौगोलिक विस्तार सुनिश्चित करना: संतुलित क्षेत्रीय विकास को समर्थन देने के लिए अल्प औद्योगिक राज्यों में विनिर्माण को आकर्षित करने के लिए विभेदक प्रोत्साहन की पेशकश की जानी चाहिए।
  • R&D और नवाचार के साथ जुड़ाव: PLI-समर्थित उत्पादन को घरेलू नवाचार पारितंत्र के साथ जोड़ा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) और अनुसंधान, विकास एवं नवाचार कोष (RDIF) का उपयोग।
    • इससे उच्च-जटिलता वाली वस्तुओं जैसे उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन आदि के विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

निष्कर्ष

PLI योजना आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हुए भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में प्रमुख औद्योगिक नीतिगत हस्तक्षेपों में से एक है। वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में व्यवधान के वर्तमान संदर्भ में, PLI योजना निवेश (FDI सहित) और एक जीवंत घरेलू बाजार का लाभ उठाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करती है।

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अनुसंधान, विकास एवं नवाचार कोष (RDIF)

यह एक कोष है जिसे अनुसंधान, विकास और नवाचार गतिविधियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है। यह नए विचारों और प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्साहित करने में मदद करता है।

नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF)

यह एक स्वायत्त संस्था है जो भारत में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय नियामक और समन्वयकारी निकाय के रूप में कार्य करती है, और विशेष प्रयोजन निधि (SPF) की संरक्षक होती है।

एकल खिड़की प्रणाली

यह एक सरकारी तंत्र है जो व्यवसायों को विभिन्न सरकारी एजेंसियों से परमिट, लाइसेंस और अन्य अनुमोदन प्राप्त करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करता है। इसका उद्देश्य नौकरशाही बाधाओं को कम करना और निवेश को प्रोत्साहित करना है।

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