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इसे रियाद में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के COP-16 में जारी किया गया है। इसका उद्देश्य भूमि के पुनरुद्धार और सूखे के प्रति प्रतिरोधकता को बढ़ाने के लिए वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देना तथा जन-केंद्रित दृष्टिकोण के माध्यम से कार्रवाई में तेजी लाना है।

  • सन 2000 के बाद से जलवायु परिवर्तन और भूमि व जल संसाधनों के असंधारणीय प्रबंधन के कारण सूखे की घटनाओं में 29% की वृद्धि हुई है।

सूखे के बारे में

  • सूखे को असामान्य रूप से लंबे समय तक कम जल उपलब्धता की स्थिति के रूप में परिभाषित किया जाता है। इससे जल की उपलब्धता, गुणवत्ता और मांग में असंतुलन हो जाता है।
  • हालिया सूखे के उदाहरण: अमेरिका के ग्रेट प्लेन्स में, स्पेन के बर्सिलोना में आदि।
  • सूखे के लिए जिम्मेदार कारण: इनमें असाधारण रूप से कम वर्षा; असंतुलित जल निकासी; प्रबल अल-नीनो आदि शामिल हैं। 

सूखे के प्रभाव

  • जल आपूर्ति: गंभीर सूखे के परिणामस्वरूप जल आपूर्ति में कमी हो सकती है, जिसके व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक परिणाम हो सकते हैं।
  • कृषि: फसलों के खराब होने और कम पैदावार के कारण खाद्यान्न की कमी एवं आर्थिक नुकसान हो सकता है।
  • जलविद्युत: बांधों और जलाशयों में जलस्तर घटने से बिजली उत्पादन में कमी हो सकती है, जिससे औद्योगिक गतिविधियां बाधित हो सकती हैं।
  • नेविगेशन: नदी का जलस्तर कम होने से अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन प्रभावित होता है, जिससे व्यापार और लॉजिस्टिक्स पर असर पड़ता है।
  • पारिस्थितिकी-तंत्र: जलीय और स्थलीय प्रजातियों का पर्यावास नष्ट होने से जैव विविधता को नुकसान होता है।

सूखा प्रबंधन के लिए उठाए गए कदम

  • वैश्विक स्तर पर: एकीकृत सूखा प्रबंधन कार्यक्रम; UNCCD की सूखा प्रतिरोध, अनुकूलन और प्रबंधन नीति (DRAMP) फ्रेमवर्क; वैश्विक सूखा सूचना प्रणाली आदि।
  • भारत: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति; राष्ट्रीय कृषि सूखा आकलन एवं निगरानी प्रणाली आदि।
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