अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) द्वारा 'कोल 2024: एनालिसिस एंड फोरकास्ट टू 2027' रिपोर्ट प्रकाशित की गई | Current Affairs | Vision IAS
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इस रिपोर्ट में कोयले के ग्रेड और क्षेत्र के अनुसार कोयले की मांग, आपूर्ति एवं व्यापार के रुझानों तथा पूर्वानुमानों को प्रस्तुत किया गया है।

कोयले के उपयोग की दिशा

  • कोयले की मांग: उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में कोयले की मांग में गिरावट होने की उम्मीद है। हालांकि, कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं जैसे भारत, चीन, इंडोनेशिया में इसमें वृद्धि देखने को मिल सकती है।
    • भारत में आर्थिक संवृद्धि से जुड़ी विद्युत की उच्च मांग के चलते, कोयले की मांग में सबसे अधिक वृद्धि होने की संभावना है।
  • कोयले का उत्पादन: वैश्विक स्तर पर, 2024 में कोयले का उत्पादन अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचने और फिर 2027 तक स्थिर होने की उम्मीद है।
    • भारत वैश्विक स्तर पर कोयले के उत्पादन वृद्धि में सबसे बड़ा योगदानकर्ता बन सकता है।
    • भारत में 2023 में कोयले का उत्पादन 10% की वृद्धि के साथ 1 बिलियन टन से अधिक हो गया था।
    • 2024 में कोयला उत्पादन में 8% की वृद्धि होने की उम्मीद है।

कोयले के लगातार उपयोग के लिए जिम्मेदार कारक:

  • बढ़ती मांग: आर्थिक संवृद्धि के लक्ष्यों को पूरा करने हेतु विद्युत, औद्योगिक विकास और अवसंरचना के विकास के लिए कोयले की मांग बढ़ रही है।
  • मौसम संबंधी उतार-चढ़ाव: पवन और सौर जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से बिजली उत्पादन में उतार-चढ़ाव को कोयला आधारित सतत, विश्वसनीय एवं किफायती बिजली से संतुलित किया जाता है।
  • विद्युत की मांग को बढ़ाने वाले दो कारक: परिवहन और औद्योगिक हीटिंग जैसी सेवाएं पहले किसी अन्य ईंधन स्रोतों पर निर्भर थीं, लेकिन इन सेवाओं का विद्युतीकरण होने से बिजली की मांग में काफी वृद्धि हुई है, जैसे- इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता उपयोग। इसी तरह डेटा सेंटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए क्षेत्रकों के उदय से भी ऊर्जा की मांग में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है। इन क्षेत्रकों में ऊर्जा की बहुत अधिक खपत होती है।  
  • कोयला निर्यातकों की लाभप्रदता: कोविड-19 और 2022 के ऊर्जा संकट के बाद कोयला निर्यातकों का मुनाफा बढ़ा है।

कोयले के उपयोग को संतुलित करने के लिए भारत द्वारा शुरू की गई पहलें 

  • नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा: इसके तहत पीएम कुसुम, पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना जैसी योजनाएं शुरू की गई हैं।
  • माइन ओपनिंग परमिशन मॉड्यूल: यह कोयला खदानों के लिए मंजूरी प्रक्रिया को तेज करता है।
  • ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन में कमी करना: इसके लिए फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD), इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (ESP) आदि तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है।
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