हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएं (CLOUDBURSTS IN HIMALAYAN REGIONS) | Current Affairs | Vision IAS
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हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएं (CLOUDBURSTS IN HIMALAYAN REGIONS)

04 Sep 2025
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, भारत के कई क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएं उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में दर्ज की गईं।

बादल फटने (Cloudburst) के बारे में

  • यह अल्प अवधि में अत्यधिक मात्रा में वर्षण की घटना है, जो कभी-कभी ओलावृष्टि एवं गर्जना के साथ होती है। इससे अचानक बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) बारिश की किसी घटना को "बादल फटना" तब मानता है, जब किसी स्थान पर "एक घंटे में 10 से.मी. या इससे अधिक वर्षा" दर्ज की गई हो।
  • हाल के उदाहरण: किश्तवाड़ जिला, जम्मू-कश्मीर (2025); चमोली, उत्तराखंड (2025); हिमाचल प्रदेश (2020)।
  • बादल फटने की घटनाएं मैदानी इलाकों में भी होती हैं, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में ये अधिक आम हैं, क्योंकि यह "पहाड़ों से टकराकर आर्द्र पवनों के ऊपर उठने" (ओरोग्राफिक लिफ्ट) के कारण होता है। (इन्फोग्राफिक देखें)
  • बादल फटने के परिणाम: अचानक बाढ़ आना, बांध टूटना, मिट्टी का धंसना/ भूस्खलन आदि घटनाएं देखने को मिलती हैं। इससे जान-माल का नुकसान होता है; घरों, सड़कों और सार्वजनिक सुविधाओं को नुकसान पहुंचता है; जैव विविधता की हानि होती है; आदि।

बादल फटने की घटनाओं से निपटने में आने वाली चुनौतियां

  • जलवायु परिवर्तन: ग्लोबल वार्मिंग ने वर्षा के पैटर्न को बदल दिया है, जिससे बार-बार और तीव्र वर्षा हो रही है।
    • उदाहरण के लिए, तापमान में प्रत्येक 1°C की वृद्धि से हवा में लगभग 7% अधिक नमी वहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।
  • पूर्वानुमान संबंधी चुनौतियां: बादल फटने की घटनाएं अत्यधिक स्थानीय और अल्पकालिक होती हैं और इनका पूर्वानुमान लगाना कठिन होता है; बादल फटने की घटना की जगह और समय के बारे में सैटेलाइट आधारित तकनीक में सटीकता का अभाव होता है; डॉप्लर रडार लगभग 3 घंटे पहले इसकी चेतावनी जारी करते हैं, लेकिन वे अत्यधिक महंगे और सीमित क्षेत्र के लिए प्रभावी होते हैं, आदि।
  • मानव-जनित कारण: जंगलों की कटाई, आर्द्रभूमियों का नष्ट होना और अनियोजित विकास के कारण प्रकृति की पानी सोखने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे अचानक बाढ़ और नुकसान की संभावना और बढ़ जाती है।

आगे की राह: बादल फटने से होने वाली आपदा को कम करने की रणनीति (Disaster Risk Reduction: DRR)-  राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (2019)

  • भूस्खलन के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों का निर्धारण (Landslide Hazard Zonation: LHZ): रिमोट सेंसिंग, हवाई तस्वीरें, सैटेलाइट इमेजरी और स्थानीय जानकारी की मदद से उन क्षेत्रों का सही मानचित्र बनाना जो भूस्खलन के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।
  • एजेंसियों के बीच समन्वय: केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच तालमेल बनाकर नियमों को अपडेट करना, नए मानक अपनाना, कानूनों में संशोधन करना और नीतियों की समीक्षा करना।
    • अग्रिम चेतावनी की सूचना सभी तक पहुंचाना सुनिश्चित करना।
  • संरचनात्मक उपाय (Structural Measures):
    • पर्वतों के ढलानों को स्थिर बनाए रखने के लिए जैव-इंजीनियरिंग तकनीक (पेड़ लगाना, वनस्पति उगाना) का उपयोग करना और सुरक्षात्मक संरचनाएं बनाना।
    • वर्षा के जल की निकासी व्यवस्था (ड्रेनेज सिस्टम), छोटी नदियों (rivulets) और प्राकृतिक जल प्रणालियों का रखरखाव एवं उनमें सुधार करना, ताकि बाढ़ के खतरे को कम किया जा सके।
  • गैर-संरचनात्मक उपाय:
    • जीवन और संपत्ति के नुकसान के लिए बहु-जोखिम बीमा का विस्तार करना।
    • जोखिम के प्रति संवेदनशील शहरी नियोजन को अपनाना, जिसमें भवन उप-नियमों में ऐसे बदलाव किए जाएं ताकि आपदा के समय नुकसान कम हो।
    • बढ़ती हुई और अत्यधिक जोखिम वाली बस्तियों में बहु-स्तरीय सुरक्षा योजनाओं को लागू करना।
  • क्षमता विकास: 
    • शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) और पंचायती राज संस्थानों (PRIs) की क्षमता में वृद्धि करना, ताकि वे आपदाओं का बेहतर तरीके से सामना करने की तैयारी और आवश्यक कार्रवाई कर सकें।
    • बीमा और जोखिम को साझा/ स्थानांतरित करने वाले साधनों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना।
  • जलवायु परिवर्तन संबंधी जोखिम प्रबंधन: अनुकूलन संबंधी राज्य-विशिष्ट और स्थानीय प्रयासों को बढ़ावा देना तथा उनका समर्थन करना।

निष्कर्ष

हाल ही में हुई क्लाउडबर्स्ट (बादल फटने की घटना) की घटना यह दिखाती है कि विशेषकर हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम कम करने के लिए तुरंत कदम उठाने की ज़रूरत है। हमें केवल आपदा के बाद राहत पहुंचाने के बजाय, पहले से तैयारी और आपदा-रोधी क्षमता बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। इसके लिए- अग्रिम चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना, समुदाय-आधारित अनुकूलन क्षमता को बढ़ावा देना, आपदा प्रबंधन को संधारणीय विकास से जोड़ना तथा तकनीक, स्थानीय ज्ञान और बेहतर शासन का इस्तेमाल कर जोखिमों को कम करना जरूरी है।

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