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निष्पक्ष और प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था (Fair and Representative Global Order)

04 Sep 2025
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

भारत के विदेश मंत्री ने प्रथम बिम्सटेक (BIMSTEC) पारंपरिक संगीत समारोह में निष्पक्ष और प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था का आह्वान किया।

वैश्विक व्यवस्था निष्पक्ष और प्रतिनिधित्वपूर्ण क्यों नहीं है?

  • वैश्विक संस्थाओं में असमान प्रतिनिधित्व: उदाहरण के लिए- P5 देश (चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता एवं वीटो अधिकार प्राप्त हैं। इससे वे UNSC के निर्णयों में असामान्य रूप से अधिक प्रभाव डालते हैं और अस्थायी सदस्यों को दरकिनार कर देते हैं।
  • ग्लोबल साउथ का हाशिये पर होना: ग्लोबल नॉर्थ (औद्योगिक देशों) के पास IMF में ग्लोबल साउथ (विकासशील या अल्प विकसित देशों) की तुलना में 9 गुना अधिक मतदान शक्ति है।
    • उदाहरण के लिए: संयुक्त राज्य अमेरिका के पास IMF बोर्ड में 16.49% मतदान शक्ति है, जबकि यह केवल 4.22% वैश्विक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
  • अप्रभावी बहुपक्षवाद: शक्तिशाली राष्ट्र बहुपक्षीय मंचों की उपेक्षा करते हैं, जिससे वास्तविक वैश्विक सहयोग कमजोर होता है। परिणामस्वरूप, वैश्विक प्रतिक्रियाएं विभाजित और स्वार्थ-संचालित हो जाती हैं।
    • उदाहरण के लिए: संयुक्त राज्य अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से आधिकारिक रूप से बाहर निकलने वाला है।
  • भू-राजनीतिक शक्ति के उपकरण के रूप में व्यापार: उदाहरण के लिए- संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भारत से आयातित वस्तुओं पर 25% टैरिफ लगाना, यूरोपीय संघ का कार्बन टैक्स आदि व्यापार संबंधों में असमानता को उजागर करते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन की असमानताएं: संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे औद्योगिक देश, कुल ऐतिहासिक उत्सर्जन में लगभग 20% का योगदान करते हैं, लेकिन इसके दुष्परिणाम ज्यादातर ग्लोबल साउथ के देशों को झेलने पड़ते हैं।
    • उदाहरण के लिए: 2024 में फिलीपींस को भयंकर हीट वेव का सामना करना पड़ा था, जिससे वहां सूखा और गर्मी से संबंधित मौतें हुई थीं।
  • प्रौद्योगिकी और ज्ञान का विभाजन: उदाहरण के लिए- प्रौद्योगिकी और नवाचार रिपोर्ट 2025 के अनुसार, दुनिया की 100 कंपनियां, जिनमें से ज्यादातर अमेरिका व चीन की हैं, वैश्विक निजी अनुसंधान और विकास (R&D) निवेश में 40% का योगदान करती हैं। यह तकनीकी शक्ति के बड़े स्तर पर केंद्रीकरण को दर्शाता है।

निष्पक्ष और प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के लिए आगे की राह

  • बहुपक्षीय सुधार: उदाहरण के लिए- G4 (ब्राजील, जर्मनी, भारत और जापान) के सदस्य देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सीटों के लिए एक-दूसरे की दावेदारी का समर्थन करते हैं।
  • बहुपक्षवाद का विऔपनिवेशीकरण (Decolonising Multilateralism): "वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट" जैसी पहलें दिखाती हैं कि भारत एक अधिक न्यायसंगत और समान विश्व व्यवस्था का नेतृत्व कर सकता है।
  • रियो डी जेनेरियो घोषणा का क्रियान्वयन: 17वें ब्रिक्स समिट में स्वीकृत इस घोषणा में समावेशी AI गवर्नेंस और IMF कोटा में बदलाव की बात की गई है, ताकि वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं एवं राष्ट्रीय हितों को बेहतर ढंग से दर्शाया जा सके।
  • डिजिटल और तकनीकी अंतराल को समाप्त करना: ओपन-सोर्स और सभी को शामिल करने वाले डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) मॉडल को ग्लोबल साउथ के लिए एक आदर्श रूपरेखा माना गया है।
  • जलवायु न्याय: साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (Common but Differentiated Responsibilities: CBDR) जैसे फ्रेमवर्क को मजबूत बनाना चाहिए और उन्हें मौजूदा आर्थिक एवं जलवायु चुनौतियों के हिसाब से अपडेट करना चाहिए।

निष्कर्ष

एक निष्पक्ष वैश्विक व्यवस्था के लिए समावेशी संस्थाओं, न्यायसंगत वित्तीय प्रणाली और उत्तर-दक्षिण (North–South) के बीच संतुलित सहयोग की जरूरत है। भारत जैसे उभरते देश इन अंतरालों को खत्म करके एक न्यायपूर्ण और प्रभावी विश्व व्यवस्था बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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