संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक, 2025 {THE CONSTITUTION (ONE HUNDRED AND THIRTEENTH AMENDMENT) BILL, 2025} | Current Affairs | Vision IAS
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संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक, 2025 {THE CONSTITUTION (ONE HUNDRED AND THIRTEENTH AMENDMENT) BILL, 2025}

04 Sep 2025
1 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्री ने लोक सभा में संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किया।

अन्य संबंधित तथ्य

  • यह विधेयक यह प्रावधान करता है कि यदि प्रधान मंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र व राज्य सरकारों तथा केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली का कोई मंत्री किसी गंभीर अपराध के लिए लगातार 30 दिनों से अधिक समय तक हिरासत में रहता है, तो उसे अपने पद से त्याग-पत्र देना होगा या उसे पद से हटाया जाएगा।
    • इसके लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में बड़े संशोधन करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • यही प्रावधान पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश पर भी लागू होगा। इसके लिए केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025 लाया गया है, जो राष्ट्रपति को मुख्यमंत्री/ मंत्रियों को हटाने का अधिकार प्रदान करता है। 
  • जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 भी यही प्रावधान जम्मू और कश्मीर पर लागू करता है। इसके तहत उपराज्यपाल को मुख्यमंत्री/ मंत्रियों को हटाने का अधिकार प्राप्त होगा।
    • ये तीनों विधेयक विस्तृत जांच और चर्चा के लिए संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee: JPC) को भेजे गए हैं।

130वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधान

  • पद से हटाने का आधार: किसी केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यों के मंत्री को पद से हटा दिया जाएगा यदि उसे पांच या अधिक वर्षों के कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार किया जाता है और हिरासत में रखा जाता है।
    • यह प्रावधान प्रधान मंत्री पर भी लागू होगा।
  • पद से हटाने की प्रक्रिया:
    • केंद्रीय मंत्री (प्रधान मंत्री को छोड़कर): राष्ट्रपति को प्रधान मंत्री की सलाह पर 31वें दिन ऐसे मंत्री को उसके पद से हटाना होगा। यदि प्रधान मंत्री 31वें दिन तक कोई सलाह नहीं देता, तो मंत्री स्वतः 31वें दिन से पदमुक्त हो जाएगा।
    • राज्यों के मंत्री (मुख्यमंत्री को छोड़कर): इस मामले में भी ऊपर की तरह एक समान प्रावधान लागू होता है, जिसमें राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर कार्य करेगा। यदि मुख्यमंत्री 31वें दिन तक सलाह नहीं देता, तो मंत्री स्वतः पदमुक्त हो जाएगा।
    • दिल्ली के मंत्री (मुख्यमंत्री को छोड़कर): राष्ट्रपति, दिल्ली के मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्री को हटाएगा। यदि मुख्यमंत्री सलाह नहीं देता, तो 31वें दिन मंत्री मंत्री स्वतः पदमुक्त हो जाएगा।
    • प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री (केंद्र/ राज्य/ दिल्ली): यदि प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो उसे 31वें दिन तक अपना पद त्यागना होगा। यदि वह त्याग-पत्र नहीं देता, तो 31वें दिन से स्वतः पदमुक्त हो जाएगा। 
  • पुनर्नियुक्ति पर कोई रोक नहीं: हिरासत से रिहाई के बाद मंत्री, प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री को फिर से अपने पद पर वापस आने की अनुमति है।

विधेयक के पक्ष में तर्क

  • संवैधानिक नैतिकता और नैतिक शासन: मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नैतिकता संवैधानिक ढांचे का एक अभिन्न अंग है, और गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी व्यक्तियों को मंत्री बनाने से बचना चाहिए।
  • जनविश्वास की रक्षा: यह कदम भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ एक मजबूत संदेश देता है, जिससे जनता का राजनीतिक संस्थाओं पर भरोसा बढ़ सकता है।
  • सुशासन: यह "जेल से शासन चलाना" जैसी स्थिति को खत्म करने का प्रयास है। इससे कार्यपालिका की जवाबदेही बनी रहेगी और उत्तरदायित्व संबंधी संवैधानिक कमियों को दूर किया जा सकेगा।
  • कानूनी कमियों को दूर करना: मौजूदा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of People Act: RPA) केवल दोषसिद्धि यानी दोषी साबित होने के बाद ही निर्वाचित प्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराता है। वर्तमान विधेयक गिरफ्तारी, हिरासत और सजा मिलने के बीच के समय को भी कवर करता है, जिससे इस तरह की कानूनी कमियों को दूर किया जा सकता है।
  • अन्य कर्मचारियों के साथ निष्पक्षता: सामान्य सरकारी कर्मचारियों को 48 घंटे तक हिरासत में रहने के बाद निलंबन का सामना करना पड़ता है, इसलिए मंत्रियों पर भी समान मानक लागू होने चाहिए।
  • अन्य: यह सभी दलों पर समान रूप से लागू होगा। इस प्रकार यह राजनीति को अपराध मुक्त बनाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। इसके अलावा, झूठे मुकदमों व मनमानी गिरफ्तारियों पर न्यायिक निगरानी का संतुलन भी बनेगा। 

विधेयक के विपक्ष में तर्क

  • राजनीतिक हथियार बनाना और संघवाद के लिए खतरा: प्रवर्तन निदेशालय (ED) और CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करके नेताओं को मामूली आरोपों में गिरफ्तार किया जा सकता है। इससे चुनावी प्रक्रिया के बिना ही सरकार गिराने का "कानूनी शॉर्टकट" मिल सकता है।
  • निर्दोष माने जाने के सिद्धांत के प्रतिकूल: यह विधेयक उस सिद्धांत के खिलाफ है, जिसमें कहा गया है कि "जब तक दोष साबित न हो, व्यक्ति निर्दोष है।" केवल गिरफ्तारी या हिरासत के आधार पर पद से हटाना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
    • लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अयोग्यता केवल दोषसिद्धि के बाद लागू होती है, गिरफ्तारी या हिरासत पर नहीं।
  • व्यवहार में असंगति: विधायकों/ सांसदों और मंत्रियों के मामले में एक विरोधाभास की स्थिति है।
    • जहां सांसद एवं विधायक लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत केवल दोषसिद्धि (दोषी घोषित होने और दो साल या उससे अधिक की सजा मिलने) पर ही अयोग्य ठहराए जाते हैं, वहीं इस विधेयक के तहत मंत्रियों को केवल हिरासत में लिए जाने पर ही त्याग-पत्र देने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
    • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, जब तक दोषसिद्धि न हो (केवल गिरफ्तारी पर नहीं), एक विधायक/ सांसद संबंधित सदन का सदस्य बना रह सकता है और उसे मंत्री भी नियुक्त किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि सिर्फ आरोप या गिरफ्तारी के आधार पर विधायक/ सांसद को मंत्री बनने से नहीं रोका जा सकता। दूसरी ओर, वर्तमान विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि गिरफ्तार मंत्री को पद छोड़ना होगा।
  • "रिवॉल्विंग डोर" की समस्या: रिहाई के बाद दोबारा मंत्री बनने की अनुमति से बार-बार पद त्याग और पुनर्नियुक्ति की स्थिति बनेगी। इससे राजनीतिक अस्थिरता आ सकती है और संभावित रूप से रणनीतिक कानूनी चालबाजियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
  • कार्यपालिका का विवेक और राजनीतिकरण: हटाने की दोहरी प्रक्रिया (प्रधान मंत्री/ मुख्यमंत्री की सलाह या स्वतः पदमुक्ति) का राजनीतिकरण हो सकता है। यह संभावना है कि प्रधान मंत्री अपने सहयोगियों को बचा सकता है या प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने के लिए विरोधी मुख्यमंत्री को हटा सकता है।
  • सुरक्षा उपायों का अभाव: यदि गिरफ्तारी गलत या दुर्भावनापूर्ण पाई जाती है तो मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है।
    • यह प्रिवेंटिव डिटेंशन तथा गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (Unlawful Activities Prevention Act: UAPA), 1967; धन शोधन निवारण अधिनियम (Prevention of Money Laundering Act: PMLA), 2002 जैसे कानूनों के दुरुपयोग को बढ़ावा दे सकता है।
      • उदाहरण के लिए, पिछले पांच वर्षों में ED द्वारा दर्ज किए गए 5,000 मामलों में से 10% से भी कम मामलों में दोषसिद्धि हुई है।

अपराधों के बाद अयोग्यता के लिए मौजूदा कानूनी ढांचा और निर्णय

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA) की धारा 8(3): इसके तहत यदि किसी विधायक/ सांसद को कुछ आपराधिक मामलों में दोषी ठहराया जाता है और कम-से-कम दो साल की सजा सुनाई जाती है, तो वह चुनाव लड़ने या पद पर बने रहने के लिए अयोग्य हो जाता है।
  • लिली थॉमस (2013) वाद का निर्णय: सुप्रीम कोर्ट ने RPA की धारा 8(4) को रद्द कर दिया, जिसमें दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दायर करने पर वर्तमान सदस्य अयोग्यता से बच जाता था। 
  • मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014) वाद: कोर्ट ने कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री बनाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है, लेकिन प्रधान मंत्री को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों, विशेष रूप से गंभीर अपराधों वाले व्यक्तियों को मंत्री बनाने से बचना चाहिए।
  • पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन (2018) की जनहित याचिका: कोर्ट ने कहा कि कानून से बाहर जाकर नए अयोग्यता के आधार नहीं जोड़े जा सकते। संसद को चाहिए कि वह ऐसा कानून बनाए, जिससे राजनीतिक दल गंभीर अपराधियों की सदस्यता रद्द करें और उन्हें चुनावी टिकट न दें।
  • भारत निर्वाचन आयोग (2016): 2016 में, इसने लोक प्रतिनिधि अधिनियम में संशोधन की सिफारिश की थी, ताकि ऐसे व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके, जिनके खिलाफ अदालत द्वारा कम-से-कम पांच साल के कारावास से दंडनीय अपराध के लिए आरोप तय किए गए हों।

 

आगे की राह

  • अंतरिम निलंबन: मंत्री को सीधे पद से हटाने की बजाय, कानून में प्रावधान किया जाना चाहिए  कि मुकदमे के दौरान मंत्री केवल अपने अधिकारों और कामकाज से अस्थायी रूप से निलंबित रहे। इससे शासन चलता रहेगा तथा जवाबदेही भी बनी रहेगी।
  • राजनीतिक दलों की भूमिका मजबूत करना: राजनीतिक दलों को आत्म-अनुशासन अपनाना चाहिए और आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को टिकट नहीं देनी चाहिए। उन्हें केवल "चुनाव जीतने की संभावना" की बजाय ईमानदारी और चरित्र को महत्व देना चाहिए।
  • विधि आयोग की सिफारिशें: पांच वर्षों तक के कारावास की सजा वाले अपराधों के लिए आरोप तय करने को अयोग्यता का एक अतिरिक्त आधार बनाया जाना चाहिए।
    • इससे प्रारंभिक न्यायिक जांच सुनिश्चित करके तुच्छ या राजनीतिक रूप से प्रेरित गिरफ्तारियों को रोका जा सकेगा। 
  • जमानत को सामान्य नियम बनाना: गंभीर हिंसक अपराधों को छोड़कर बाकी मामलों में जमानत को सामान्य नियम बनाया जा सकता है। इससे पद से हटाने वाले नए प्रावधान अधिक स्वीकार्य बन सकेंगे।
  • आपराधिक मामलों में तेजी लाना: केवल गिरफ्तारी के आधार पर मंत्रियों को अयोग्य ठहराने की बजाय, मंत्रियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायिक तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्ष जांच एवं त्वरित सुनवाई सुनिश्चित हो सके।
  • एक स्वतंत्र समीक्षा तंत्र स्थापित करना: एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण या न्यायिक पैनल बनाया जा सकता है, जो यह तय करे कि मंत्री को हटाने की शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं। इससे कार्यपालिका के अतिक्रमण को रोका जा सकेगा तथा कानून का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित हो सकेगा।
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