गतिशील भौमजल संसाधन आकलन (DYNAMIC GROUNDWATER RESOURCES ASSESSMENT) | Current Affairs | Vision IAS

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गतिशील भौमजल संसाधन आकलन (DYNAMIC GROUNDWATER RESOURCES ASSESSMENT)

28 Jan 2026
1 min

सुर्खियों में क्यों?

केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (CGWB) ने राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के साथ मिलकर भारत के गतिशील भौमजल संसाधनों पर राष्ट्रीय संकलन 2025 रिपोर्ट प्रकाशित की है।

अन्य संबंधित तथ्य

यह रिपोर्ट देश के कुल 6762 आकलन इकाइयों (ब्लॉक/मंडल/तालुका) में से कितने प्रतिशत क्षेत्रों में भौमजल यानी भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, इसे दर्शाती है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर 

  • कुल वार्षिक भौमजल पुनर्भरण: 2024 के 446.9 अरब घन मीटर (BCM) से थोड़ा बढ़कर 448.52 BCM हो गया है।
  • वार्षिक दोहन-योग्य भौमजल संसाधन: 2024 के 406.19 BCM से थोड़ा बढ़कर 407.75 BCM हो गया है।
  • कुल वार्षिक भौमजल दोहन (2025): आंशिक रूप से बढ़कर 247.22 BCM हो गया है।
  • भूजल दोहन की स्थिति (Stage of Extraction – SoE): आंशिक रूप से बढ़कर 60.63% हो गई है।
    • SoE का अर्थ है इंसान द्वारा भौमजल का दोहन और प्राकृतिक रूप से भौमजल पुनर्भरण का अनुपात।

भारत में भौमजल संसाधन : वर्तमान परिदृश्य 

  • भारत विश्व में भौमजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। विश्व के कुल भौमजल दोहन का लगभग 25% भारत में होता है (लगभग 230 घन किलोमीटर प्रति वर्ष)।
  • विभिन्न क्षेत्रकों में भौमजल का उपयोग: 64% सिंचाई की जरूरत भौमजल से पूरी होती हैं। 85% ग्रामीण पेयजल भौमजल पर निर्भर है। लगभग 50% शहरी जल जरूरतें भी भौमजल से पूरी होती हैं।
    • कुल दोहन किए गए भौमजल में से 87% कृषि क्षेत्रक में उपयोग किया जाता है और लगभग 11% घरेलू उपयोग में जाता है (वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2024)।
  • भौमजल में प्रमुख संदूषक तत्व: नाइट्रेट (राजस्थान, तमिलनाडु, महाराष्ट्र); फ्लोराइड (हरियाणा, कर्नाटक); आर्सेनिक (गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़कृत मैदान); यूरेनियम (राजस्थान, पंजाब)।

भौमजल प्रबंधन से जुड़ी समस्याएं  

  • अत्यधिक दोहन: जनसंख्या वृद्धि, कृषि गहनता, औद्योगिक मांग और तेज शहरीकरण के कारण भौमजल का जरूरत से ज्यादा उपयोग हो रहा है। इससे जल संकट, सूखा और भारी धातुओं का संदूषण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। 
    • उदाहरण के लिए: CGWB के अनुसार राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में भौमजल का दोहन 100% से अधिक है।
    • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के भौमजल में यूरेनियम, सीसा और नाइट्रेट का मिश्रण गंभीर स्तर पर पाया गया है।
  • शहरीकरण और जलभृत का सूखना: तेज शहरीकरण से पुनर्भरण क्षेत्र बंद हो जाते हैं और पारंपरिक जलस्रोत नष्ट होते हैं। इससे जलभृत से जितना जल दोहन किया जाता है, उतना वापस नहीं भर पाता। इसे 'जलभृत की असंतृप्ति' कहा जाता है। 
  • संस्थागत और प्रबंधन संबंधी कमियां: कई संगठनों की भागीदारी और पुराने कानून (जैसे भारतीय सुखाचार अधिनियम, 1882 (Indian Easement Act) के कारण नीतियां एकीकृत नहीं हैं। निजी बोरवेल से जल दोहन पर अधिक नियंत्रण नहीं है। उदाहरण के लिए: उद्योगों में जल उपयोग का सही लेखा परीक्षा न होने से अधिक दोहन और प्रदूषण होता है।
  • जलवायु परिवर्तन: एक अध्ययन के अनुसार 2080 तक भौमजल ह्रास की दर तीन गुना हो सकती है। इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन से सिंचाई के लिए भौमजल पर बढ़ती निर्भरता है। उदाहरण के लिए: मानसूनी वर्षा में कमी के कारण किसान भौमजल पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। 

आगे की राह

  • जलभृत-आधारित योजना: भारत में दो तरह के जलभृत पाए जाते हैं—सख्त शैल वाले जलभृत (प्रायद्वीपीय भारत) और जलोढ़ मैदान वाले जलभृत  (सिंधु-गंगा के मैदान)। दोनों की भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियाँ अलग हैं। इसलिए व्यापक और सूक्ष्म स्तर पर अलग-अलग समाधान अपनाने की ज़रूरत है।
  •  संस्थागत सुधार: राष्ट्रीय जल आयोग का गठन किया जाए। इसके लिए केंद्रीय जल आयोग (CWC) और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के विलय का सुझाव दिया गया है (मिहिर शाह समिति)। इससे एकीकृत जल प्रबंधन संभव होगा।
  • विधिक सुधार: भौमजल दोहन के अधिकारों को भूमि-स्वामित्व से अलग किया जाए। यह अधिकार स्थानीय निकायों को प्रदान किए जाएं। 
    • भौमजल दोहन के अधिकारों को औपचारिक रूप देने से स्थानीय निकाय सशक्त होंगे।  हाशिए पर मौजूद समुदायों और किसानों को विधिक सहायता मिलेगी और आर्थिक अवसर उपलब्ध होंगे। 
  • जल उपयोग की संधारणीय पद्धतियां अपनाना: 
    • जल-उपयोग दक्षता वाली कृषि: जैसे कि फसल विविधीकरण, परिशुद्ध कृषि (Precision Agriculture), शून्य जुताई (ज़ीरो टिलेज) को बढ़ावा देना।
    • वर्षा जल संचयन और कृत्रिम तरीके से पुनर्भरण: पारंपरिक प्रणालियों को बढ़ावा देना। उदाहरण: राजस्थान के जोहड़।
    • ब्लू-ग्रीन अवसंरचना: हरित क्षेत्र (उद्यान, पेड़) और जलीय क्षेत्रों (नदियाँ, आर्द्रभूमि) को जोड़कर जलभृतों और जलस्रोतों का कायाकल्प किया जाए।
  • समुदायों का सशक्तिकरण: स्थानीय स्तर पर योजना निर्माण को बढ़ावा देना चाहिए। उदाहरण के लिए: तेलंगाना का मिशन काकतीय:
    • मिशन काकतीय लघु सिंचाई ढांचे के विकास, सामुदायिक सिंचाई प्रबंधन को सुदृढ़ करने तथा तालाबों और जलाशयों के कायाकल्प पर बल देता है।

निष्कर्ष

भारत के गतिशील भौमजल संसाधनों पर राष्ट्रीय संकलन 2025 रिपोर्ट भारत के भूजल संसाधनों का डेटा-आधारित आकलन प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट बेहतर योजना निर्माण और प्रबंधन में सहायक है। साथ ही, यह भारी धातुओं से संदूषण और जलभृतों  के क्षय जैसी गंभीर समस्याओं को भी उजागर करती है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक लक्षित और प्रभावी रणनीति बनाने और अपनाने की आवश्यकता है। इससे जल सुरक्षा और सभी तक इसकी उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। 

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मिशन काकतीय (Mission Kakatiya)

यह तेलंगाना सरकार द्वारा शुरू की गई एक पहल है जिसका उद्देश्य सिंचाई के बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से छोटे तालाबों और जलाशयों के जीर्णोद्धार और कायाकल्प के माध्यम से सामुदायिक सिंचाई प्रबंधन को मजबूत करना है।

ब्लू-ग्रीन अवसंरचना (Blue-Green Infrastructure)

यह शहरी नियोजन का एक दृष्टिकोण है जो प्राकृतिक जल प्रणालियों (जैसे नदियाँ, आर्द्रभूमि - ब्लू) को हरित स्थानों (जैसे पार्क, पेड़ - ग्रीन) के साथ एकीकृत करता है ताकि जल प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और शहरी जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सके।

जोहड़ (Johad)

राजस्थान में पारंपरिक जल संचयन संरचनाएं, जो मिट्टी के बने छोटे तालाब या बांध होते हैं, जो वर्षा जल को एकत्र करके भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करते हैं।

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