सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, एक प्रमुख कंपनी की परिचालन गतिविधियों में आए गंभीर व्यवधानों के बाद भारत का नागरिक उड्डयन क्षेत्र चर्चा में है। इसके परिणामस्वरूप नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (Directorate General of Civil Aviation: DGCA) द्वारा नियामक कार्रवाई की गई है।
अन्य संबंधित तथ्य

- दिसंबर 2025 की शुरुआत में उड़ान रद्द होने और व्यवधानों की एक बड़ी घटना देखने को मिली। इसने एयरलाइन के परिचालन नियोजन, चालक दल के रोस्टरिंग और आकस्मिक प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर किया।
- इस स्थिति ने नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) द्वारा नियामक हस्तक्षेप को प्रेरित किया। इसमें पायलटों हेतु विश्राम के नए मानदंडों से छूट भी शामिल थी।
- संकट ने भारत में विमानन शासन के संबंध में चिंताएं पैदा कर दी हैं। इससे नियामक प्रभावशीलता, DGCA सुधार, उद्योग एकाग्रता, स्लॉट आवंटन और आकस्मिक योजना की नई जांच शुरू हो गई है।
भारत में विमानन क्षेत्र की संस्थागत संरचना
- मंत्रालय: नागरिक उड्डयन मंत्रालय नागरिक उड्डयन क्षेत्र के विकास और विनियमन के लिए राष्ट्रीय नीतियों तथा कार्यक्रमों को तैयार करने वाला नोडल मंत्रालय है।
- नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA): यह नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में नियामक निकाय है, जो मुख्य रूप से सुरक्षा संबंधी मुद्दों से निपटता है।
- उत्तरदायित्व: यह भारत में/से/के भीतर हवाई परिवहन सेवाओं के नियमन के लिए उत्तरदायी है। यह नागरिक वायु नियमों, हवाई सुरक्षा और उड़ान योग्यता मानकों के प्रवर्तन के लिए भी जिम्मेदार है।

- यह अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (International Civil Aviation Organisation: ICAO) के साथ सभी नियामक कार्यों का समन्वय करता है।
- भारत को 2025-2028 की अवधि के लिए ICAO परिषद में फिर से चुना गया है।
- भारतीय विमानपत्तन आर्थिक नियामक प्राधिकरण (Airports Economic Regulatory Authority of India: AERA): इसे 2009 में भारतीय विमानपत्तन आर्थिक नियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 के तहत स्थापित किया गया था।
- यह वैमानिकी सेवाओं के लिए टैरिफ को नियंत्रित करता है। साथ ही, यह प्रमुख हवाई अड्डों पर दी जाने वाली अन्य सेवाओं के शुल्क निर्धारित करता है और ऐसे हवाई अड्डों के प्रदर्शन मानकों की निगरानी करता है।
- नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (Bureau of Civil Aviation Security: BCAS): इसे 1978 में DGCA में एक सेल के रूप में स्थापित किया गया था। बाद में, 1987 में इसे नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक स्वतंत्र विभाग के रूप में पुनर्गठित किया गया।
- यह ICAO के शिकागो कन्वेंशन के अनुबंध 17 के अनुसार विमानन सुरक्षा मानक निर्धारित करता है। अनुबंध 17 अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन को गैर-कानूनी हस्तक्षेप के कार्यों से बचाने पर केंद्रित है।
- विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (Aircraft Accident Investigation Bureau: AAIB): इसे 2012 में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक संलग्न कार्यालय के रूप में स्थापित किया गया था।
- AAIB द्वारा 2250 किलोग्राम (All-up Weight: AUW) से अधिक वजन वाले विमानों या टर्बोजेट विमानों से जुड़ी सभी दुर्घटनाओं की जांच करता है।
- 2250 किलोग्राम या उससे कम द्रव्यमान वाले विमानों की घटनाओं की जांच DGCA द्वारा की जाती है, जिन्हें गंभीर घटनाओं के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- AAIB द्वारा 2250 किलोग्राम (All-up Weight: AUW) से अधिक वजन वाले विमानों या टर्बोजेट विमानों से जुड़ी सभी दुर्घटनाओं की जांच करता है।
भारत में विमानन शासन से संबंधित मुख्य समस्याएँ
- नियामक स्वतंत्रता और स्टाफिंग: मंत्रालय के साथ DGCA की निकटता परिचालन स्वायत्तता पर सवाल उठाती है। अन्य देशों के स्वतंत्र नियामकों के पास नियामक नियंत्रण से बचने के लिए अधिक वैधानिक सुरक्षा होती है।
- संसदीय स्थायी समिति (380वीं रिपोर्ट) में कहा गया है कि DGCA में कर्मचारियों की भारी कमी है। यह अस्थायी कर्मचारियों पर निर्भर है और एक स्वतंत्र, विशिष्ट और प्रभावी नियामक के रूप में कार्य करने में असमर्थ है।
- खंडित नियामक कार्यक्षेत्र: सुरक्षा, आर्थिक विनियमन और हवाई अड्डा प्रबंधन जैसे विभिन्न कार्यों के लिए कई एजेंसियां हैं। यदि शासन तंत्र को सुसंगत नहीं बनाया जाता है, तो इससे समन्वय की कमी हो सकती है।
- सुरक्षा निरीक्षण बनाम वाणिज्यिक दबाव: तेजी से विकास और बाजार सुदृढ़ीकरण वाणिज्यिक अनिवार्यताओं और सुरक्षा बफर के बीच तनाव पैदा कर सकता है। लागत दक्षता और शेड्यूलिंग जैसे वाणिज्यिक दबाव अक्सर चालक दल के रोस्टरिंग और रखरखाव जैसे सुरक्षा मानकों को प्रभावित करते हैं।
- बाजार एकाग्रता: बाजार में केवल कुछ ही कंपनियों का प्रभुत्व प्रणालीगत जोखिम को बढ़ाता है। एक बाजार लीडर की परिचालन विफलता देश भर में व्यवधान पैदा कर सकती है और बुनियादी ढांचे पर दबाव डाल सकती है।
- ATF राजकोषीय विरोधाभास: भारत में टिकट की कीमतों में विमानन टर्बाइन ईंधन (Aviation Turbine Fuel: ATF) का हिस्सा लगभग 45% है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह 20-30% है। ATF अभी भी GST के दायरे से बाहर है।
- राज्य VAT 1% से 30% तक होता है। यह एक असमान अवसर और उच्च लागत संरचना बना देता है।
- रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल (MRO) लचीलापन अंतराल: भारत में विशेष सीमा शुल्क-बद्ध औद्योगिक समूहों की कमी है। इसी कारण लगभग 80% प्रमुख इंजनों की ओवरहालिंग अभी भी विदेशों में होती है।
- अन्य मुद्दे: इसमें क्रू की कमी, अवसंरचना संबंधी समस्याएं (जैसे हवाई अड्डों पर भीड़ तथा अवसंरचना विस्तार और यातायात वृद्धि के बीच असंतुलन), सीमित रियल-टाइम निगरानी और अपूर्ण रिपोर्टिंग तथा उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। इनमें अपारदर्शी मूल्य निर्धारण एल्गोरिद्म, बैगेज नियमों में अस्पष्टता और तदर्थ नीतिगत बदलाव आदि आते हैं।
विमानन क्षेत्र में सुधार के लिए हाल ही में उठाए गए कदम:
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आगे की राह
- स्वायत्त CAA: DGCA को एक स्व-वित्तपोषित नागरिक उड्डयन प्राधिकरण (CAA) में बदला जाना चाहिए। इससे मंत्रालय की नीतिगत भूमिका को बनाए रखते हुए DGCA की परिचालन स्वतंत्रता मजबूत होगी।
- कार्यबल सुधार: क्रू रोस्टरिंग पर निगरानी को सुदृढ़ करना, सशक्त आकस्मिक बफर अनिवार्य करना तथा परिचालन अस्थिरता घटाने हेतु प्रशिक्षण, प्रतिधारण प्रोत्साहनों और मानव कारक अनुसंधान में निवेश किया जाना चाहिए।
- प्रवर्तन ढांचा: प्रकाशित मानकों, सुधारात्मक कार्रवाई की समय-सीमा तथा अनुपालन स्थिति के सार्वजनिक प्रकटीकरण के साथ एक पारदर्शी, चरणबद्ध प्रवर्तन एवं दंड ढांचा विकसित किया जाना चाहिए।
- कार्यों का पृथक्करण: सुरक्षा विनियमन, आर्थिक निरीक्षण और दुर्घटना जांच के बीच स्पष्ट कानूनी अलगाव होना चाहिए। उदाहरण के लिए, AAIB की स्वतंत्रता को वैधानिक मजबूती देना और AERA/AAI की भूमिकाओं की समीक्षा करना, ताकि ओवरलैप कम हो सके।
- राष्ट्रीय MRO नीति 2.0: केवल GST रियायतों से आगे बढ़कर एकीकृत विमानन हब बनाने की आवश्यकता है। इसमें इंजन निर्माण और घटक परीक्षण शामिल होने चाहिए।
- सतत विमानन ईंधन (SAF) अधिदेश बढ़ाना: भारत ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए 2027 तक 1% SAF सम्मिश्रण का लक्ष्य रखा है। इसे 2030 तक बढ़ाकर 5% करने की योजना है।
- बाजार लचीलापन: प्रतिस्पर्धी विविधता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और क्षेत्रीय वाहकों के प्रवेश को सुगम बनाया जाना चाहिए। किसी एक वाहक की विफलता के जोखिम को कम करने के लिए स्लॉट आवंटन और आकस्मिक प्रोटोकॉल की समीक्षा की जानी चाहिए।
- उपभोक्ता सुरक्षा उपाय: यात्री अधिकारों के चार्टर को संहिताबद्ध और सरल बनाना चाहिए। किराया घटकों को पारदर्शी बनाएं और शिकायत निवारण के लिए तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
- अन्य आवश्यक सुधार: यात्री शिकायतों को तेजी से हल करने के लिए एक समर्पित विमानन लोकपाल की नियुक्ति की जानी चाहिए। उद्योग और नियामक के बीच नियमित संवाद को संस्थागत बनाया जाना चाहिए और DGCA की तकनीकी जनशक्ति और क्षेत्रीय कार्यालयों का विस्तार किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत का विमानन क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। तेजी से होती वृद्धि के लिए आधुनिक, स्वतंत्र और लचीले शासन की आवश्यकता है। नियामक स्वायत्तता को मजबूत करना और संस्थागत भूमिकाओं को स्पष्ट करना अनिवार्य है। वैश्विक मानकों के अनुरूप होने के लिए मानव पूंजी में निवेश करना भी जरूरी है।