बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता मानदंड (Capital Adequacy Norms for Banks) | Current Affairs | Vision IAS

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बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता मानदंड (Capital Adequacy Norms for Banks)

30 Jun 2026
1 min

In Summary

  • आरबीआई ने पूंजी पर्याप्तता मानदंडों में संशोधन किया है, जिससे बैंकों को सीआरएआर गणना के लिए सीईटी1 पूंजी में त्रैमासिक लाभ को शामिल करने की अनुमति मिल गई है।
  • सीआरएआर, या सीएआर, जोखिम-भारित परिसंपत्तियों के मुकाबले पूंजी को मापकर बैंक की सॉल्वेंसी सुनिश्चित करता है, जिसमें टियर 1 (सीईटी1, एटी1) और टियर 2 पूंजी घटक शामिल होते हैं।
  • भारत का न्यूनतम CET1 अनुपात 5.5% और CRAR 9.0% है, जो बेसल III के क्रमशः 4.5% और 8.0% से अधिक सख्त है।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वाणिज्यिक बैंकों, लघु वित्त बैंकों और पेमेंट्स बैंक के लिए पूंजी पर्याप्तता मानदंडों में संशोधन किया है। इसमें गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के प्रावधान से जुड़े पूर्व प्रतिबंधों को हटा दिया गया है। 

अन्य संबंधित प्रमुख तथ्य

  • RBI ने बैंकों को अब CRAR (पूंजी से जोखिम-भारित संपत्ति अनुपात) की संगणना के लिए 'कॉमन इक्विटी टियर 1' (CET1) पूंजी में अर्जित त्रैमासिक लाभ को शामिल करने की अनुमति दे दी है।

पूंजी से जोखिम-भारित संपत्ति अनुपात (CRAR) को समझना

  • CRAR को पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequacy Ratio-CAR) भी कहा जाता है। यह RBI द्वारा उपयोग किया जाने वाला प्रमुख मानदंड है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई बैंक दिवालिया (Insolvent) होने से पूर्व संभावित हानियों की एक युक्तिसंगत मात्रा को वहन करने में सक्षम हो सके। 
    • CRAR = [(टियर-1 पूंजी + टियर-2 पूंजी) ÷ जोखिम-भारित परिसंपत्तियां (RWA)] × 100 
  • महत्व: यह बैंकों के डूबने के जोखिम को कम करके किसी राष्ट्र की वित्तीय प्रणाली की दक्षता और स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है।
    • सामान्यतः, उच्च पूंजी पर्याप्तता अनुपात वाले बैंक को सुरक्षित माना जाता है और यह माना जाता है कि वह अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सक्षम होगा।

CRAR के प्रमुख घटक

  • जोखिम-भारित परिसंपत्तियां (Risk-Weighted Assets - RWA): बैंकों को दिवालिया होने से बचने और अपने जमाकर्ताओं के निवेश की सुरक्षा के लिए न्यूनतम मात्रा में पूंजी रखना आवश्यक होता है।
    • बैंक की विभिन्न परिसंपत्तियों और ऋणों को उनके जोखिम के आधार पर एक निश्चित प्रतिशत जोखिम भारांक दिया जाता है। उच्च जोखिम वाले ऋणों को अधिक जोखिम-भारांक दिया जाता है और उनके लिए बैंक को अधिक पूंजी रखना पड़ता है। 
  • टियर 1 पूंजी (कोर पूंजी): यह अत्यधिक तरल पूंजी होती है। वित्तीय संकट की स्थिति में यह बैंक के लिए प्राथमिक सुरक्षा कवच का काम करती है। इसे दो श्रेणियों में बांटा गया है:
    • कॉमन इक्विटी टियर 1 (CET1): यह सामान्य शेयरों (गैर-संयुक्त स्टॉक कंपनियों के समकक्ष) और स्टॉक अधिशेष, प्रतिधारित/संचित उपार्जन, अन्य व्यापक आय, पात्र अल्पसंख्यक हित (Qualifying minority interest) और विनियामक समायोजनों का योग है।
    • अतिरिक्त टियर 1 (AT1): यह AT1 के मानदंडों को पूरा करने वाले पूंजीगत लिखतों और संबंधित अधिशेष, अतिरिक्त पात्र अल्पमत हित और विनियामक समायोजनों का योग है।
  • टियर 2 पूंजी (पूरक / सहायक पूंजी): यह टियर 2 के मानदंडों को पूरा करने वाले पूंजीगत लिखतों और संबंधित अधिशेष, अतिरिक्त पात्र अल्पमत हित, पात्र ऋण हानि प्रावधानों (Qualifying loan loss provisions) और विनियामक समायोजनों का योग है।

कॉमन इक्विटी टियर-1 (CET1) के बारे में

  • कॉमन इक्विटी टियर-1 (CET1) को वैश्विक स्तर पर बेसल-III फ्रेमवर्क के अंतर्गत लागू किया गया। इसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में प्रणालीगत विफलताओं की रोकथाम करना है। साथ ही आर्थिक मंदी अथवा वित्तीय संकट के दौरान बैंकों को दिवालिया होने से बचाने में सक्षम बनाए रखना है। इसे बैंक की वित्तीय सुरक्षा के लिए अंतिम सुरक्षा कवच माना जाता है।
    • संरचना (Composition): इसमें अर्हताप्राप्त सामान्य शेयर और इससे संबंधित स्टॉक अधिशेष, प्रतिधारित/संचित उपार्जन और संचित अन्य व्यापक आय (Accumulated Other Comprehensive Income - AOCI)  तथा अन्य प्रकट आरक्षित निधियां (Disclosed Reserves) सम्मिलित होती हैं। 
      • इसके अतिरिक्त, इसमें पात्र अल्पसंख्यक हित को भी सम्मिलित किया जाता है तथा अंतिम कुल राशि का निर्धारण लागू विनियामकीय समायोजनों को सम्मिलित करने के बाद किया जाता है।
    • CET1 अनुपात = (कॉमन इक्विटी टियर-1 पूंजी ÷ जोखिम-भारित परिसंपत्तियां) × 100

विनियामक मानक (Regulatory Standards): RBI बनाम बेसल III

भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित पूंजी पर्याप्तता मानक, बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के बेसल III के वैश्विक मानकों की तुलना में अधिक सख्त हैं। 

आवश्यकता 

बेसल III (वैश्विक) 

RBI (भारत) 

न्यूनतम CET1 अनुपात 

4.5%

5.5%

न्यूनतम CRAR 

8.0%

9.0%

 

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बेसल-III फ्रेमवर्क (Basel III Framework)

यह अंतरराष्ट्रीय नियामक मानकों का एक समूह है जिसे 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के जवाब में विकसित किया गया था। इसका उद्देश्य बैंकों की पूंजी की गुणवत्ता और मात्रा को बढ़ाना, जोखिम प्रबंधन में सुधार करना और प्रणालीगत जोखिम को कम करना है।

टियर 2 पूंजी (Tier 2 Capital)

यह एक बैंक की 'पूरक' या 'सहायक' पूंजी है, जिसमें हाइब्रिड ऋण साधन, ह्रास योग्य प्रतिभूतियां और सामान्य ऋण हानि प्रावधान शामिल हो सकते हैं। यह टियर 1 पूंजी की तुलना में कम गुणवत्ता वाली मानी जाती है।

टियर 1 पूंजी (Tier 1 Capital)

यह एक बैंक की सबसे तरल पूंजी है और वित्तीय संकट के दौरान इसका उपयोग 'प्राथमिक सुरक्षा कवच' के रूप में किया जाता है। इसे आगे कॉमन इक्विटी टियर 1 (CET1) और अतिरिक्त टियर 1 (AT1) में विभाजित किया गया है।

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