सुर्ख़ियों में क्यों?
भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (International Fund for Agricultural Development—IFAD) के साथ साझेदारी में कंट्री स्ट्रैटेजिक अपॉर्च्युनिटीज प्रोग्राम (Country Strategic Opportunities Programme—COSOP) 2026–2033 शुरू किया है।
अन्य संबंधित प्रमुख तथ्य

- इस अवसर पर राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के साथ एक समानांतर रणनीतिक साझेदारी समझौता भी किया गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण वित्तीय व्यवस्था को सुदृढ़ करना और वंचित किसानों तक समावेशी ऋण की पहुंच को बढ़ाना है।
- COSOP एक बहुवर्षीय सहयोगात्मक ढांचा है। इसका उद्देश्य भारत में ग्रामीण विकास के लिए IFAD की दीर्घकालिक निवेश प्राथमिकताओं को दिशा देना है। यह कार्यक्रम दो प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:
- ग्रामीण समुदायों की सामाजिक, आर्थिक और जलवायु संबंधी समुत्थानशीलता को सुदृढ़ करना।
- ज्ञान प्रणालियों को सुदृढ़ करना, ताकि सफल और प्रभावी विकास मॉडल को बड़े स्तर पर लागू किया जा सके।
- इस कार्यक्रम में स्वयं सहायता समूह (SHGs), किसान उत्पादक संगठन (FPOs) और ग्रामीण सहकारी समितियों को प्रमुख माध्यम बनाया गया है। इनके माध्यम से ग्रामीण आबादी को वित्त, बाजार और अवसंरचना से जोड़ा जाएगा।
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की प्रमुख चुनौतियां
- कृषि संकट और प्रच्छन्न (छिपी हुई) बेरोजगारी: ग्रामीण विनिर्माण क्षेत्रक ने पूंजी-गहन तकनीक अपना ली है। इसके परिणामस्वरूप रोजगार-विहीन संवृद्धि हो रही है। ग्रामीण उद्योग कृषि से बाहर निकलने वाले अतिरिक्त श्रम को पर्याप्त रोजगार देने में विफल रहा है।
- कृषि का GDP में योगदान लगभग 18% है, जबकि देश के लगभग 46% कार्यबल की आजीविका कृषि पर
- निर्भर है। यह असमानता ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम की सीमांत उत्पादकता और प्रति व्यक्ति आय को कम करती है।

- कौशल की अत्यधिक कमी: परंपरागत ग्रामीण कौशल और आधुनिक औद्योगिक व सेवा क्षेत्रकों की मांगों के बीच एक बड़ा असंतुलन है। ग्रामीण कार्यबल के 75% से अधिक लोगों के पास माध्यमिक स्तर की योग्यता नहीं है। इसके कारण उन्हें बेहतर वेतन वाली औपचारिक नौकरियों में प्रवेश करने में कठिनाई होती है।
- जलवायु परिवर्तन के प्रति सुभेद्यता: भूजल स्तर में गिरावट, भूमि निम्नीकरण तथा रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक उत्पादकता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। भारत के लगभग 30% भौगोलिक क्षेत्र में भूमि निम्नीकरण की समस्या दर्ज की गई है।
- लैंगिक असमानता और श्रम बाजार की समस्या: कृषि से बाहर निकलने वाली महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर सुरक्षित और पर्याप्त विनिर्माण रोजगार उपलब्ध नहीं हैं। इसके कारण ग्रामीण औपचारिक कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी घट रही है और वे मुख्य रूप से बिना वेतन वाले घरेलू एवं देखभाल संबंधी कार्यों पर निर्भर हो रही हैं।
- विखंडित भूमि जोतें : भारत में 85% से अधिक किसान छोटे और सीमांत किसान हैं। छोटी और बिखरी हुई कृषि जोतों के कारण कृषि मशीनीकरण और बड़े पैमाने पर खेती से मिलने वाले लाभों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाता है। इसके परिणामस्वरूप फसल उत्पादकता अभी भी वैश्विक औसत से कम बनी हुई है।
- ऋण और वित्तीय बाधाएं : प्रधानमंत्री जन-धन योजना के कारण बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच में बहुत सुधार हुआ है। इसके बावजूद वंचित किसानों को कम ब्याज दर पर औपचारिक निवेश ऋण प्राप्त करने में अभी भी कठिनाई होती है।

आगे की राह
- ग्रामीण औद्योगीकरण का विस्तार: ग्रामीण क्षेत्रों में MSMEs, खाद्य प्रसंस्करण पार्क और बेहतर भौतिक कनेक्टिविटी के लिए सार्वजनिक पूंजीगत निवेश बढ़ाया जाना चाहिए। इससे कृषि पर निर्भर अतिरिक्त श्रम को सुनियोजित रूप से गैर-कृषि क्षेत्रक में स्थानांतरित करने में मदद मिलेगी।
- कृषि-तकनीक (एग्री-टेक) अपनाने में तेजी लाना: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, AI आधारित मौसम पूर्वानुमान और ड्रोन तकनीक को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उदाहरण के रूप में नमो ड्रोन दीदी योजना का उपयोग किया जा सकता है। इससे कृषि में इनपुट के बेहतर उपयोग और फसल बीमा के आकलन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
- सामूहिकीकरण को बढ़ावा देना: FPOs, SHGs और सहकारी समितियों को पर्याप्त कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराई जानी चाहिए तथा उनके लिए नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाना चाहिए। इससे प्राथमिक उत्पादक केवल कच्चे माल के उत्पादक न रहकर कृषि-प्रसंस्करण मूल्य श्रृंखला में सक्रिय भागीदार बन सकेंगे।
- स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करना: स्थानीयकृत कृषि क्लस्टर विकसित करने और 'फार्म-टू-फोर्क' (खेत से उपभोक्ता तक) प्रत्यक्ष बाजार संपर्क को सुगम बनाने से आपूर्ति श्रृंखलाओं में सुधार होगा और प्राथमिक उत्पादकों के लाभ मार्जिन में वृद्धि होगी।
- नवोन्मेषी ग्रामीण वित्त: IFAD-NABARD साझेदारी का उपयोग ग्रामीण ऋण व्यवस्था को केवल अल्पकालिक फसल ऋण से आगे बढ़ाकर दीर्घकालिक पूंजी निवेश ऋण की ओर ले जाने में किया जाना चाहिए। ऐसी वित्तीय व्यवस्था विशेषकर ग्रामीण सूक्ष्म उद्यमियों और महिलाओं की आवश्यकताओं के अनुरूप होनी चाहिए।
- ग्राम साझा भूमि (Village Commons) का पुनरुद्धार: GIS मानचित्रण और धारणीय ढांचों का उपयोग करके समुदाय-प्रबंधित भूमि का पुनर्वास किया जाना चाहिए। 'कचरे से ऊर्जा' (Waste-to-energy) परियोजनाओं और सौरीकरण को एकीकृत करने से ये भूमि सुदृढ़ और जलवायु-समुत्थानशील आर्थिक परिसंपत्तियों में बदल जाएंगी।
निष्कर्ष
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक परिवर्तन 'विकसित भारत@2047' के दृष्टिकोण को साकार करने की आधारशिला है। यह व्यापक रोडमैप इस बदलाव (संक्रमण) को सुदृढ़ करने के लिए एक समयबद्ध ढांचा प्रदान करता है। भारत को 'अमृत काल' के दौरान अपनी ग्रामीण समृद्धि के प्रमाणित मॉडलों को व्यापक ग्लोबल साउथ (Global South) में निर्यात करने के लिए विशिष्ट रूप से स्थापित करता है।