सुर्ख़ियों में क्यों?
उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिकाओं (PIL) के बढ़ते दुरुपयोग पर आपत्ति जताई है।
जनहित याचिका (PIL) के बारे में
- जनहित याचिका (PIL) से आशय ऐसी विधिक कार्यवाही से है, जो लोकहित अथवा सामान्य हित के संरक्षण एवं प्रवर्तन के लिए न्यायालय में आरंभ की जाती है। इसमें ऐसे मामलों को उठाया जाता है जिनसे जनता या समाज के किसी वर्ग के कानूनी अधिकार या दायित्व प्रभावित होते हैं।
- लोकस स्टैंडी (वाद दायर करने का विधिक अधिकार) के अनुसार यदि किसी व्यक्ति अथवा समूह के साथ अन्याय हुआ हो और वह निर्धनता, दिव्यांगता अथवा अशक्तता के कारण स्वयं न्यायालय का दरवाजा न खटखटा सके, तो कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति अथवा सामाजिक संगठन उसकी ओर से याचिका प्रस्तुत कर सकता है।
- पृष्ठभूमि:
- PIL की अवधारणा का उद्भव पहली बार 1960 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में हुआ।
- भारत में 'PIL' शब्द का प्रथम प्रयोग न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर तथा न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने अपने एक निर्णय में किया।
- जनहित याचिका (PIL) के दो प्रकार हैं;
- प्रतिनिधिक सामाजिक कार्रवाई- इस प्रकार की जनहित याचिका का उद्देश्य एक निर्धारित एवं वंचित वर्ग को न्याय दिलाना होता है।
- नागरिक सामाजिक कार्रवाई- इस प्रकार की जनहित याचिका समाज के व्यापक वर्ग को प्रभावित करने वाले सामूहिक अधिकारों की रक्षा के लिए दायर की जाती है।
- जनहित याचिका (PIL) एवं पारंपरिक वाद में अंतर: जनहित याचिका में याचिकाकर्ता ऐसा तृतीय पक्ष हो सकता है, जिसका विवाद से प्रत्यक्ष व्यक्तिगत संबंध न हो; जबकि पारंपरिक वाद में याचिकाकर्ता विवाद से संबंधित दोनों पक्षों में से एक होता है।
भारत में जनहित याचिका (PIL) के बढ़ते उपयोग के कारण

- न्यायिक सक्रियता: न्यायालयों ने अनुच्छेद 21, 32 तथा 226 के अंतर्गत मूल अधिकारों के दायरे का विस्तार किया। इससे जनहित याचिका अधिकारों के संरक्षण एवं सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रभावी माध्यम बन गई।
- न्याय तक सरल पहुंच: न्यायालयों ने पत्र आधारित क्षेत्राधिकार (Epistolary Jurisdiction) का विकास किया। इसके अंतर्गत पत्र एवं पोस्टकार्ड को भी रिट याचिका के रूप में स्वीकार किया जाने लगा, जिससे जनहित याचिका अधिक सुलभ हो गई।
- न्याय तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण: इसके अंतर्गत लोकस स्टैंडी के पारंपरिक सिद्धांत को शिथिल किया गया। क्योंकि इसमें पहले केवल वही व्यक्ति याचिका दायर कर सकता था, जिसे प्रत्यक्ष विधिक क्षति हुई हो।
- प्रगतिशील सामाजिक विधानों का निर्माण: बंधुआ मजदूरी, न्यूनतम मजदूरी, भूमि सीमा तथा पर्यावरण संरक्षण से संबंधित विधियों ने न्यायालयों को गरीब एवं वंचित वर्गों के अधिकारों का संरक्षण करने में सक्षम बनाया।
- सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को दूर करना: जनहित याचिका (PIL) ने पारंपरिक मुकदमों की महंगी, लंबी और जटिल प्रक्रिया से राहत दिलाई तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों तक पहुंचने का प्रत्यक्ष एवं कम लागत वाला माध्यम उपलब्ध कराया।
जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग से संबंधित चिंताएं
- जनहित याचिका बनाम निजी हित याचिका: कई बार व्यक्ति या कंपनियां व्यक्तिगत शिकायतों या व्यावसायिक हितों को जनहित का रूप देकर PIL दायर करते हैं।
- उदाहरण: क्षेत्रीय प्रदूषण मुक्ति संघर्ष समिति बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1990) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि समिति स्वच्छ एवं निष्कपट उद्देश्य से न्यायालय नहीं आई, इसलिए जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
- न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या में वृद्धि: उच्चतम न्यायालय में 3,500 से अधिक लोकहित याचिकाएं लंबित हैं, जिससे पहले से लंबित मामलों का बोझ और बढ़ रहा है।
- छिपे उद्देश्य वाली या एम्बुश याचिका (Ambush PILs): एम्बुश याचिकाएं ऐसी जनहित याचिकाएँ होती हैं, जिन्हें जानबूझकर इस तरह दाखिल किया जाता है कि न्यायालय उन्हें जल्दी खारिज कर दे और बाद में कोई वास्तविक/गंभीर याचिकाकर्ता उसी मुद्दे को न्यायालय के समक्ष प्रभावी ढंग से न उठा सके।
- न्यायिक अतिक्रमण: जनहित याचिका के माध्यम से कभी-कभी न्यायालय नीतियां निर्धारित करने अथवा उनके कार्यान्वयन की निरंतर निगरानी करने लगते हैं, जिससे शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत प्रभावित होता है।
- अधिकार और वास्तविक राहत में अंतर: कई मामलों में न्यायालय अधिकारों की घोषणा तो कर देते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण वास्तविक राहत नहीं मिल पाती।
- उदाहरण: निम्न-आय वर्ग के लिए आवासन (Low-Income Housing) के मामलों में।
- राजनीतिक उद्देश्य: वास्तविक जनहित के स्थान पर अनेक लोकहित याचिकाएं राजनीतिक उद्देश्यों से दायर की जाती हैं।
- राजनीतिक दल एवं व्यक्ति अपने विरोधियों को लक्ष्य बनाने, सरकारी पहलों में विलंब उत्पन्न करने अथवा प्रचार प्राप्त करने के लिए जनहित याचिकाओं का उपयोग करते हैं।
जनहित याचिका (PIL) से संबंधित महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
|
जनहित याचिका (PIL) की पवित्रता एवं गरिमा बनाए रखने के उपाय
- उत्तराखंड राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) में उच्चतम न्यायालय द्वारा निम्नलिखित निर्देश दिए गए;
- सत्यापन: जनहित याचिका स्वीकार करने से पूर्व न्यायालय को प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता तथा याचिका की सामग्री की सत्यता का परीक्षण करना चाहिए।
- नियम निर्माण: प्रत्येक उच्च न्यायालय को वास्तविक एवं सद्भावनापूर्ण जनहित याचिकाओं को प्रोत्साहित करने तथा दुराशयपूर्ण याचिकाओं को हतोत्साहित करने हेतु स्पष्ट नियम बनाने चाहिए।
- लोकहित का मूल्यांकन: न्यायालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वृहत्तर लोकहित, गंभीरता एवं तात्कालिकता से संबंधित याचिकाओं को अन्य याचिकाओं पर प्राथमिकता दी जाए।
- दंड अधिरोपित करना: न्यायालयों को अनुचित अथवा स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से तुच्छ याचिकाएं दायर करने वालों को उदाहरणात्मक लागत (Exemplary Costs) लगाकर हतोत्साहित करना चाहिए।
- प्राथमिकता: वृहत्तर लोकहित, गंभीरता तथा तात्कालिकता से संबंधित याचिकाओं को अन्य याचिकाओं की अपेक्षा प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- अन्य सुझाव:
- समुदाय की सहभागिता: प्रभावित व्यक्तियों के साथ विधिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा कर यह स्पष्ट किया जाए कि कौन-से मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।
- वैकल्पिक उपायों का उपयोग: न्यायालय जाने से पूर्व, यदि विषय अत्यंत तात्कालिक न हो, तो 'स्थिति-पत्र (Status Paper)' तैयार कर संबंधित पक्षों के साथ साझा किया जाए तथा संबंधित प्राधिकारियों को कार्रवाई हेतु नोटिस दिया जाए।
- सुदृढ़ दस्तावेजीकरण: याचिका में अपेक्षित राहत का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए तथा उसे दस्तावेजों, समाचार पत्रों की कतरनों, छायाचित्रों, जांच प्रतिवेदनों एवं शपथ-पत्रों जैसे साक्ष्यों से समर्थित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
जनहित याचिका (PIL) न्यायिक शक्ति के वैध प्रयोग का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करती है। यदि जनहित याचिकाओं का सावधानीपूर्वक उपयोग किया जाए तथा उनमें आवश्यक सुधार किए जाएं, तो वे अधिक न्यायपूर्ण एवं समतामूलक समाज के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी। जनहित याचिका का सबसे महत्वपूर्ण योगदान निर्धन एवं वंचित वर्गों के मानवाधिकारों के संरक्षण के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना रहा है।