सुर्ख़ियों में क्यों?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोयला मंत्रालय के अंतर्गत सतही कोयला एवं लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए ₹37,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना को स्वीकृति प्रदान की है।
कोयला गैसीकरण के बारे में![]()
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योजना की अन्य प्रमुख विशेषताएं
- निवेश की अधिकतम सीमा:
- किसी एकल परियोजना के लिए प्रोत्साहन राशि की अधिकतम सीमा ₹5,000 करोड़ निर्धारित की गई है।
- यूरिया एवं सिंथेटिक प्राकृतिक गैस को छोड़कर किसी एकल उत्पाद के लिए अधिकतम ₹9,000 करोड़ तक प्रोत्साहन दिया जाएगा।
- किसी एकल कॉर्पोरेट समूह को उसकी सभी परियोजनाओं के लिए अधिकतम ₹12,000 करोड़ तक प्रोत्साहन प्राप्त होगा।
- निविदा प्रक्रिया: लाभार्थियों का चयन पारदर्शी एवं प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा।
- प्रौद्योगिकी-तटस्थ: यह योजना किसी एक विशेष प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी उपयुक्त गैसीकरण प्रौद्योगिकियों के लिए समान अवसर प्रदान करती है। साथ ही, देशज गैसीकरण प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित करती है।
योजना का महत्व
- आयात प्रतिस्थापन: भारत अपनी आवश्यकता की 50% से अधिक LNG, 100% अमोनिया, 20% यूरिया तथा 80–90% मेथनॉल के लिए आयात पर निर्भर है।
- इस योजना का उद्देश्य इन आयातित उत्पादों के स्थान पर घरेलू कोयला-आधारित उत्पादों का उपयोग बढ़ाना है, जिससे आयात व्यय को कम करने में सहायता मिलेगी। वित्त वर्ष 2024–25 में यह आयात ₹2.77 लाख करोड़ रहा।
- रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपने कोयला एवं लिग्नाइट भंडारों का उपयोग कर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, भू-राजनीतिक संकटों तथा विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में अस्थिरता के प्रभाव को कम कर सकेगा।
- इस्पात क्षेत्रक के लिए कच्चा माल: सिनगैस इस्पात निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण अपचायक के रूप में कार्य करती है। इससे कोकिंग कोयला एवं प्राकृतिक गैस जैसे आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम होती है।
- रोजगार एवं राजस्व सृजन:
- यह पहल कोयला उत्पादक क्षेत्रों में 25 परियोजनाओं के माध्यम से लगभग 50,000 प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित करेगी।
- साथ ही, सरकार को प्रतिवर्ष लगभग ₹6,300 करोड़ का राजस्व प्राप्त होगा, इसके अतिरिक्त अधोवर्ती उद्योगों से कर राजस्व भी बढ़ेगा।
- तकनीकी आत्मनिर्भरता: यह योजना राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन (2021) को आगे बढ़ाते हुए स्वदेशी सतही कोयला गैसीकरण प्रौद्योगिकी को सुदृढ़ करेगी। साथ ही विदेशी इंजीनियरिंग एवं खरीद एजेंसियों पर निर्भरता को कम करेगी।
कोयला गैसीकरण से जुड़ी चुनौतियां
- उच्च पूंजीगत लागत एवं कोयले की गुणवत्ता: कोयला गैसीकरण संयंत्रों की स्थापना में अत्यधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। इन्हें व्यावसायिक रूप से लाभकारी बनने में लंबा समय लगता है।
- भारतीय कोयले में राख की मात्रा 30–45% तक होने के कारण अनेक वैश्विक गैसीकरण प्रौद्योगिकियां तकनीकी एवं आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य नहीं हैं। इससे परियोजनाओं की लागत बढ़ती है तथा महंगे स्वदेशी नवाचारों की आवश्यकता पड़ती है।
- डीकार्बोनाइजेशन का विरोधाभास: कोयला गैसीकरण प्रत्यक्ष कोयला दहन की तुलना में स्वच्छ प्रक्रिया होने बावजूद यह उच्च कार्बन-उत्सर्जन वाली प्रक्रिया बनी हुई है।
- सिनगैस-आधारित DRI से इस्पात उत्पादन में पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जित होती है।

- कार्बन कैप्चर की प्रभावशीलता: हालांकि यह योजना कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) प्रौद्योगिकियों के अनुरूप है, लेकिन वर्तमान में वैश्विक एवं घरेलू स्तर पर CCUS तकनीक प्रौद्योगिकी की सीमाओं, उच्च लागत तथा अपेक्षित प्रदर्शन के अभाव जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।
- पारिस्थितिकीय चुनौतियां: कोयला गैसीकरण में बड़ी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है, जिससे खनन क्षेत्रों में जल संकट और गंभीर हो सकता है। इस प्रक्रिया से भारी धातुओं से युक्त स्लैग अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिसके सुरक्षित निपटान में कठिनाई होती है। इससे भूजल प्रदूषण एवं पर्यावरणीय जोखिम बढ़ सकते हैं।
आगे की राह
- स्वदेशी प्रौद्योगिकी का विकास: दाबित फ्लूइडाइज़्ड-बेड गैसीकरण (PFBG) प्रौद्योगिकी के अनुसंधान एवं विकास में तेजी लाई जानी चाहिए। इससे भारत के 30–45% राख वाले कोयले का स्लैगिंग एवं डी-फ्लूइडाइजेशन जैसी समस्याओं के बिना प्रभावी तरीके से उपयोग किया जा सके।
- वित्तीय व्यवहार्यता बढ़ाना: निजी निवेश को आकर्षित करने तथा प्रारंभिक उच्च पूंजीगत लागत को कम करने के लिए कर अवकाश, पूंजीगत वस्तुओं पर आयात शुल्क में छूट आदि वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किए जाएं।
- डीकार्बोनाइजेशन के प्रयास: गैसीकरण संयंत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा के अधिकतम उपयोग तथा ऊर्जा दक्षता उपायों को बढ़ावा दिया जाए। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा और भविष्य में हरित हाइड्रोजन आधारित ऊर्जा व्यवस्था की ओर संक्रमण सुगम हो सकेगा।
- CCUS का एकीकरण: कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण प्रौद्योगिकियों के व्यवसायीकरण एवं गैसीकरण केंद्रों में एकीकरण को प्राथमिकता दी जाए। इससे भारत के वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता मिल सकेगी।
- सहयोगात्मक तंत्र को बढ़ावा देना: परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए निर्माण–स्वामित्व–संचालन (BOO) मॉडल को प्रोत्साहित किया जाए। विनियमित कोयला विनिमय को क्रियाशील बनाया जाए, ताकि पारदर्शी मूल्य निर्धारण, कुशल मूल्य खोज तथा प्रौद्योगिकी के शीघ्र प्रसार को बढ़ावा मिल सके।
निष्कर्ष
भारत की कोयला गैसीकरण योजना देश के विशाल कोयला भंडारों का उपयोग कर आयात निर्भरता कम करने तथा औद्योगिक आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करती है। हालांकि, कोयले में उच्च राख की मात्रा तथा कार्बन उत्सर्जन जैसी चुनौतियां इसके समक्ष प्रमुख बाधाएं हैं। इसलिए, कोयला गैसीकरण को केवल एक संक्रमणकारी समाधान के रूप में अपनाया जाना चाहिए। वास्तव में, इससे प्राप्त लाभों का उपयोग हरित हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था जैसी दीर्घकालिक एवं सतत ऊर्जा प्रणालियों के विकास में किया जाना चाहिए।
