सुर्ख़ियों में क्यों?
उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की है कि संवैधानिक लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद, संविधानवाद पर वरीयता प्राप्त नहीं कर सकता है।
संविधानवाद क्या है?
- संविधानवाद वह सिद्धांत है जिसके अनुसार सरकार की शक्तियां संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन होती हैं तथा राजनीतिक सत्ता का प्रयोग संविधान के उपबंधों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।
- संविधान एक औपचारिक दस्तावेज अथवा दस्तावेजों का समुच्चय है, जिसमें किसी देश या संगठन के शासन के मूल सिद्धांत, विधियां, संस्थागत संरचना तथा प्रक्रियाएं निर्धारित की गई होती हैं।
- इसके विपरीत, बहुसंख्यकवाद (बहुमत का शासन) वह राजनीतिक सिद्धांत है जिसके अनुसार संख्यात्मक बहुमत की इच्छा के आधार पर सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं।
- संविधानवाद का सिद्धांत वैधता के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार न्यायालय यह मानकर विधियों की व्याख्या करते हैं कि संसद का उद्देश्य मूल अधिकारों के विरुद्ध विधि बनाना नहीं है।
भारत में संविधानवाद बहुसंख्यकवाद पर कैसे वरीयता प्राप्त करता है?
- विधि के शासन की स्थापना करता है: अनुच्छेद 14 के अंतर्गत विधि के समक्ष समता तथा विधियों के समान संरक्षण की गारंटी दी गई है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी व्यक्ति अथवा प्राधिकारी संविधान से ऊपर नहीं है।
- न्यायिक पुनर्विलोकन सुनिश्चित करता है: अनुच्छेद 13, 32 तथा 226 भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन का आधार प्रदान करते हैं। ये न्यायालयों को असंवैधानिक विधियों एवं असंवैधानिक कार्यों को निरस्त करने की शक्ति प्रदान करते हैं, जिससे मूल अधिकारों का संरक्षण तथा विधि का शासन सुनिश्चित होता है।
- समावेशिता एवं सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करता है: अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) तथा 46 के माध्यम से सामाजिक न्याय, सकारात्मक भेदभाव तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का उपबंध किया गया है। इससे केवल संख्यात्मक बहुमत पर नहीं, बल्कि वास्तविक समानता पर आधारित शासन सुनिश्चित होता है।
- अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण करता है: संविधानवाद बहुसंख्यक वर्ग द्वारा व्यक्तियों एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों के अतिक्रमण को रोकता है।
- उदाहरण: अनुच्छेद 29 एवं 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकारों का संरक्षण किया गया है।
- शक्तियों के पृथक्करण को बनाए रखता है: उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 50 राज्य को न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देता है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहती है और शासन में शक्ति का संतुलन सुनिश्चित होता है।
संविधानवाद से संबंधित महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
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संविधानवाद से संबंधित चुनौतियां
- कार्यपालिका का अतिक्रमण: संविधानवाद के समक्ष प्रमुख चुनौती आपातकालीन शक्तियों का दुरुपयोग तथा कार्यपालिका का अत्यधिक हस्तक्षेप है।
- उदाहरण: 1975–1977 के आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित किया जाना।
- लोकतांत्रिक शासन से संबंधित चिंताएं: अध्यादेशों (Ordinances) का बढ़ता उपयोग तथा राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं के नाम पर मूल अधिकारों को सीमित करना लोकतांत्रिक शासन के लिए चिंता का विषय है।
- उदाहरण: बिहार भूमि सुधार अध्यादेशों को 1967 से 1981 के बीच अनेक बार पुनः प्रख्यापित (जारी) किया गया।
- शक्तियों का केंद्रीकरण: उदाहरण: अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लागू किया जाना, जिससे राज्यों की स्वायत्तता सीमित होती है तथा संघ एवं राज्यों के मध्य संवैधानिक विवाद उत्पन्न होते हैं।
- संघवाद का कमजोर होना: उदाहरण: राज्यपाल की भूमिका को लेकर उत्पन्न विवाद, जहां कुछ अवसरों पर (गोवा एवं मणिपुर, 2017) राज्यपालों ने प्राथमिकता क्रम का पालन किए बिना मुख्यमंत्री की नियुक्ति की।
- न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक अतिक्रमण: यद्यपि मूल अधिकारों के संरक्षण के लिए न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक होता है, तथापि अत्यधिक न्यायिक सक्रियता शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को प्रभावित कर सकती है।
- उदाहरण: अनुच्छेद 142 के अंतर्गत न्यायालयों द्वारा मध्यस्थता (Arbitral) निर्णयों में संशोधन करना न्यायिक अतिक्रमण का प्रश्न उत्पन्न कर सकता है।
निष्कर्ष
संविधानवाद यह सुनिश्चित करता है कि लोकतंत्र न्याय, स्वतंत्रता, समता तथा गरिमा के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित रहे। अतः उच्चतम न्यायालय ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि संविधानवाद को बहुसंख्यकवाद पर वरीयता प्राप्त होनी चाहिए, ताकि संविधान की मूल भावना सुरक्षित रहे तथा सभी व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।