सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा रणनीति (INMSS-2026) जारी की गई।
अन्य संबंधित तथ्य
यह दो दशकों से भी कम समय में भारत की नौसैनिक रणनीति का तीसरा सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण है। इससे पहले समुद्रों के उपयोग की स्वतंत्रता या फ्रीडम टू यूज द सीज (2007) और सुरक्षित समुद्र सुनिश्चित करना या एनश्योरिंग सिक्योर सीज (2015) जारी किए गए थे।
समुद्रों के उपयोग की स्वतंत्रता या 'फ्रीडम टू यूज द सीज' (2007): समुद्री पहुँच सुरक्षित करना
'एनश्योरिंग सिक्योर सीज़' (2015): समुद्री सुरक्षा का दायरा बढ़ाना
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INMSS की समीक्षा के कारण
- बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य:
- इंडो-पैसिफिक का महत्व: संयुक्त राज्य अमेरिका-चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार कनेक्टिविटी के कारण इसका महत्व बढ़ रहा है।
- भारत का आर्थिक और रणनीतिक उदय: अधिक रणनीतिक स्वायत्तता, महत्वपूर्ण गलियारों (कॉरिडोर) पर प्रभाव, और एक मजबूत वैश्विक भूमिका।
- लगातार बने हुए क्षेत्रीय खतरे: साथ मिलकर चुनौती देने वाली विरोधी ताकतों, अस्थिर पड़ोस और उभरते सुरक्षा जोखिमों से चुनौतियां।
- युद्ध लड़ने के उभरते तरीके:
- 'न युद्ध, न शांति' (NWNP) का मॉडल: पारंपरिक 'युद्ध या शांति' वाली स्थिति के स्थान पर लगातार बनी रहने वाली प्रतिस्पर्धा।
- 'ग्रे जोन' गतिविधियों की प्रधानता: विरोधियों द्वारा ग्रे-जोन रणनीति को पसंदीदा रणनीति के रूप में बढ़ता उपयोग।
- युद्ध के नए क्षेत्र: पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ अंतरिक्ष, साइबर और संज्ञानात्मक क्षेत्रों तक संघर्ष का विस्तार।
- अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियाँ: AI-सक्षम लक्ष्य निर्धारण, सटीक-निर्देशित आयुध, लंबी दूरी के स्टैंड-ऑफ साधनों और अंतरिक्ष-आधारित खुफिया, निगरानी एवं टोही (ISR) का उपयोग।
- उच्च रक्षा संगठन और समुद्री सुरक्षा ढांचा:
- सैन्य ढांचे में बदलाव: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और रक्षा मामलों का विभाग (DMA) जैसे सुधारों के लिए नौसैनिक रणनीतियों के पुनर्समायोजन की आवश्यकता है।
- संयुक्त सैन्य कार्यप्रणाली (Jointmanship) और थिएटर-आधारित व्यवस्था (Theaterisation): अधिक एकीकरण और जल्द लागू होने वाली थिएटर-आधारित व्यवस्था के लिए एक लचीले ढांचे की आवश्यकता है।
- एकीकृत समुद्री शासन व्यवस्था: राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) के तहत राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा समन्वयक (NMSC) समुद्री सुरक्षा के लिए सरकार के सभी विभागों को साथ लेकर चलने वाले दृष्टिकोण (Whole-of-Government Approach) को मजबूत करता है।
समुद्री सुरक्षा पर प्रभाव डालने वाले कारक
- समुद्री भूगोल:
- रणनीतिक स्थिति: भारत प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर स्थित है। इसलिए हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की केंद्रीय स्थिति क्षेत्रीय पहुंच और प्रभाव को बढ़ाती है।
- विशाल समुद्री क्षेत्र: 11,098.81 कि.मी. लंबी तटरेखा, 1,389 द्वीप और 2 मिलियन वर्ग कि.मी. से अधिक का EEZ (विशेष आर्थिक क्षेत्र)।
- विस्तारित महाद्वीपीय मग्नतट: भारत के महाद्वीपीय मग्नतट में लगभग 1.2 मिलियन वर्ग कि.मी. की बढ़ोतरी की संभावना है।
- समुद्री दृष्टिकोण:
- नीतिगत फोकस: महासागर (MAHASAGAR), सागर (SAGAR), मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 और सागरमाला जैसी पहल समुद्री विकास और क्षेत्रीय समृद्धि को बढ़ावा देती हैं।
- प्रवासी और समुद्री कर्मी: समुद्री सुरक्षा भारत के 34 मिलियन प्रवासियों और 300,000 समुद्री कर्मियों (वैश्विक कार्यबल का लगभग 12%) का समर्थन करती है।
- समुद्री अर्थव्यवस्था:
- ब्लू इकोनॉमी और व्यापार: 2030 तक ब्लू इकोनॉमी का योगदान $100 बिलियन होने का अनुमान है; मात्रा के हिसाब से 95% और मूल्य के हिसाब से 68% व्यापार समुद्र के रास्ते होता है।
- आयात पर निर्भरता: समुद्री मार्गों से 88% कच्चा तेल, 50% प्राकृतिक गैस और 20% कोयले का आयात होता है, साथ ही उर्वरक और खाद्य तेल का भी आवागमन होता है।
- रणनीतिक कॉरिडोर: चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मैरीटाइम कॉरिडोर, INSTC और IMEC कनेक्टिविटी को मजबूत करते हैं और जोखिम वाले 'चोक पॉइंट्स' पर निर्भरता कम करते हैं।
- समुद्री अवसंरचना:
- बंदरगाह और शिपयार्ड: व्यापार और लॉजिस्टिक्स 12 प्रमुख बंदरगाहों, 217 गैर-प्रमुख बंदरगाहों और 79 शिपयार्ड पर निर्भर हैं।
- सबमरीन केबल: समुद्र के नीचे बिछी केबल महाद्वीपों के बीच 95% से अधिक इंटरनेट और वॉयस ट्रैफिक संचालित करती हैं।
- विदेशी अनुसंधान केंद्र: भारती और मैत्री (अंटार्कटिका) और हिमाद्रि (आर्कटिक) भारत की वैज्ञानिक और रणनीतिक उपस्थिति को बढ़ाते हैं।

समुद्री खतरे और चुनौतियाँ
- देश-आधारित और हाइब्रिड खतरे:
- विरोधी देश: शत्रु देशों द्वारा भारत के विरुद्ध सैन्य एवं नौसैनिक बलों का प्रयोग।
- नियम-आधारित व्यवस्था को कमजोर करना: IMBL का उल्लंघन, EEZ में गैर-कानूनी गतिविधियां, दोहरे प्रयोग वाले प्लेटफॉर्म/बुनियादी ढांचे का उपयोग, और क्षेत्रीय सैन्यीकरण।
- हाइब्रिड खतरे: युद्ध की स्थिति तक पहुँचे बिना रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रॉक्सी, समुद्री मिलिशिया, साइबर-हमले और अस्वीकार्य अभियानों के माध्यम से युद्ध की सीमा से नीचे रहते हुए सामरिक उद्देश्यों की प्राप्ति।
- समुद्री आतंकवाद:
- समुद्र से और समुद्र में हमले: आतंकवादी समूह हमले करने के लिए समुद्री क्षेत्र का फायदा उठाते हैं।
- टेक्नोलॉजी और सरकारी समर्थन: कमर्शियल ऑफ-द-शेल्फ (COTS) टेक्नोलॉजी, खास विशेषज्ञता और सरकारी प्रायोजकों या कट्टरपंथी एजेंसियों से मिलने वाले समर्थन से खतरा और बढ़ जाता है।
- समुद्री अपराध और गैर-कानूनी गतिविधियाँ:
- समुद्री डकैती और सशस्त्र लूट: खुले समुद्र और क्षेत्रीय जलसीमा के भीतर समुद्री व्यापार पर हमले।
- तस्करी: नशीले पदार्थों, छोटे हथियारों, इंसानों, संरक्षित वन्यजीवों और सामूहिक विनाश के हथियार(WMD) से जुड़ी सामग्रियों की समुद्री मार्गों से तस्करी।
- IUU फिशिंग: अवैध, अपंजीकृत एवं अनियमित (IUU) मत्स्यन गतिविधियाँ समुद्री वातावरण, जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और तटीय आजीविका के लिए खतरा हैं।
- समुद्री प्रदूषण: बड़े पैमाने पर प्रदूषण, खासकर प्लास्टिक अपशिष्ट, समुद्री वातावरण को नुकसान पहुंचा रहा है।
- डार्क वेसल और शैडो फ्लीट: ऐसे जहाज़ जो नियमों, प्रतिबंधों और पकड़ में आने से बचने के लिए AIS और दूसरे ट्रैकिंग सिस्टम को बंद कर देते हैं।
- समुद्री घटनाएँ और उभरते खतरे: सुरक्षा से जुड़ी घटनाएँ जैसे आग लगना, बाढ़ आना, टक्कर होना और समुद्र या किनारे पर जहाज का फंसना या जमीन से टकराना।
समुद्री सुरक्षा के लिए अपनाई गई रणनीतियाँ (INMSS -2026)
- अनुकूल समुद्री वातावरण बनाना:
- सक्रिय उपस्थिति और संकट के समय प्रतिक्रिया: समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने के लिए लगातार तैनाती बनाए रखना। आपदाओं में लोगों को सुरक्षित निकालने के अभियानों के दौरान सबसे पहले मदद पहुँचाने वाले (फर्स्ट रिस्पॉन्डर) के तौर पर काम करना।
- पसंदीदा सुरक्षा भागीदार: मित्र देशों की सहायता हेतु प्रशिक्षण, संयुक्त सैन्य अभ्यास, क्षमता निर्माण तथा रक्षा सामग्री उपलब्ध कराना।
- समुद्री शासन और जागरूकता: वैश्विक समुद्री शासन में योगदान देना और नागरिकों के बीच समुद्री जागरूकता को बढ़ावा देना।
- तटीय और अपतटीय हितों की सुरक्षा:
- एजेंसियों के बीच तालमेल वाली कार्रवाई: जॉइंट ऑपरेशन्स सेंटर्स (JOCs) के माध्यम से नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और मरीन पुलिस के बीच कई स्तरों पर गश्त और आपातकालीन स्थितियों के लिए संयुक्त योजना बनाना।
- समुदाय की भागीदारी: तटीय और मछुआरा समुदायों को समुद्री सुरक्षा की "आँख और कान" के तौर पर शामिल करना।
- संभावित शत्रुओं को रोकना:
- परमाणु और पारंपरिक प्रतिरोध: सुरक्षित रहने में सक्षम SSBN-आधारित परमाणु प्रतिरोध और एक आधुनिक, संतुलित पारंपरिक सैन्य बल बनाए रखना।
- मुस्तैदी और सिग्नल देना: तैयारी दिखाने और प्रतिरोधी की आक्रामकता की कीमत बढ़ाने के लिए अग्रिम तैनाती, रणनीतिक संचार और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों का प्रयोग करना।
- संघर्ष की सीमा से नीचे की स्थिति में भी सफल होना (न युद्ध, न शांति):
- लगातार आकलन: खुफिया जानकारी एकत्र करना एवं खतरों का सतत मूल्यांकन करना, ताकि विरोधी की गतिविधियों का समय रहते पता लगाकर उनका मुकाबला किया जा सके।
- आवश्यकता अनुसार प्रतिक्रिया: बिना अनचाहे तनाव को बढ़ाए, त्वरित कार्रवाई के लिए सही और सुविचारित विकल्पों (जैसे ऑटोनॉमस सिस्टम) का इस्तेमाल करना।
- संघर्ष के दौरान राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करना:
- त्वरित एवं निर्णायक बल प्रयोग: युद्ध की स्थिति में शीघ्र परिवर्तन करते हुए बहु-क्षेत्रीय गतिज एवं अगतिज अभियानों के माध्यम से निर्णायक सैन्य कार्रवाई करना।
- आर्थिक युद्ध: भारत के व्यापार और ऊर्जा मार्गों की रक्षा करना और साथ ही शत्रु के समुद्री व्यापार और रणनीतिक सामान की आवाजाही में बाधा डालना।
- शक्ति का प्रदर्शन और रक्षा: तटीय और अपतटीय संपत्तियों की रक्षा करना। सटीक समुद्री हमलों व स्थल-समुद्र दोनों जगह होने वाले अभियानों के माध्यम से स्थल पर भी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करना।
निष्कर्ष
भारतीय नौसेना परिचालन तैयारी, रणनीतिक दूरदर्शिता, एजेंसियों के तालमेल और नए बदलावों पर काम कर रही है। इसी आधार पर वह आने वाले दशकों में भारत के समुद्री हितों की रक्षा में अहम भूमिका निभाती रहेगी।