सुर्ख़ियों में क्यों?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धार स्थित भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद परिसर को प्राचीन संस्मारक एवं पुरातत्वीय स्थल तथा अवशेष (AMASR) अधिनियम (Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains (AMASR) Act),
1958 के अंतर्गत संरक्षित स्मारक घोषित किया है, जिसका स्वरूप एक हिंदू मंदिर जैसा है।
अन्य संबंधित तथ्य

- न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के वर्ष 2003 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें हिंदुओं के पूजा-अर्चना के अधिकार को केवल कुछ निर्धारित दिनों तक सीमित किया गया था तथा मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार के दिन नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।
- ASI इस संपत्ति के समग्र पर्यवेक्षण, प्रशासन, संरक्षण तथा प्रबंधन का कार्य पूर्ववत् करता रहेगा।
- न्यायालय ने ASI की 94 मूर्तियों और 150+ संस्कृत शिलालेखों के आधार पर माना कि इस स्थल का निर्माण राजा भोज द्वारा 1034 ईस्वी में कराया गया था। इसे बाद में मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था।
- उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भोजशाला प्रकरण संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 द्वारा प्रदत्त मूल "उपासना के अधिकार" (Right of Worship) के संरक्षण से संबंधित मामला है।
भोजशाला मंदिर के बारे में
- स्थापना: इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा धार (मध्य प्रदेश) में की गई थी।
- इसे बाद में धार के मुस्लिम शासकों द्वारा इसे कमाल मौला मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया।
- अधिष्ठात्री देवी: वाग्देवी सरस्वती या अंबिका
- न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया है कि लंदन स्थित ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित देवी सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा को भारत वापस लाने (प्रत्यावर्तन) के लिए औपचारिक प्रयास किए जाएं।
- प्रमुख विशेषताएं :
- यह संस्कृत शिक्षा के एक प्रमुख महाविद्यालय एवं अध्ययन केंद्र के रूप में कार्य करता (सरस्वती सदन या भारती भवन) था।
- यहां शिलाओं पर भगवान विष्णु के कूर्म अवतार (कच्छप अवतार) की स्तुति में प्राकृत भाषा में दो काव्यात्मक स्तुतियां तथा अन्य शास्त्रीय काव्य आदि उत्कीर्ण हैं।
- यहां प्रसिद्ध जैन विद्वान आशाधर के शिष्य एवं राजगुरु मदन द्वारा पद्यबद्ध रचित कर्पूरमंजरी नाटक का अभिलेख प्राप्त होता है।
- इस नाटक में परमारों और चालुक्यों के मध्य हुए युद्धों तथा उनके वैवाहिक संबंधों के माध्यम से हुए संघर्षों की समाप्ति का उल्लेख मिलता है।
- यहां सर्पबन्ध शैली के दो स्तंभ अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें संस्कृत व्याकरण का विवरण मिलता है।
- अनुष्टुप छंद में उत्कीर्ण दो संस्कृत श्लोक प्राप्त होते हैं। इसमें एक में राजा भोज के उत्तराधिकारी परमार नरेश उदयादित्य और नरवर्मन की प्रशंसा की गई है, जबकि दूसरे में उल्लेख है कि यह अभिलेख उदयादित्य द्वारा स्थापित कराया गया था।
राजा भोज (1000 से 1055 ई.) के बारे में
- भोज के समकालीन: राजा भोज के समकालीन चोल वंश के राजेंद्र प्रथम ने गंगैकोंडचोलपुरम् में बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था।
- विजय अभियान: राजा भोज ने लाट (वर्तमान गुजरात) के चालुक्यों, कोंकण के शिलाहारों तथा शाकम्भरी के चाहमानों को पराजित किया। उसने डुबकुंड के कच्छपघातों तथा चंदेल सामंतों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। साथ ही परमेश्वर-परम भट्टारक की उपाधि धारण की।
- साहित्य में योगदान:
- समरांगण सूत्रधार, स्थापत्य कला पर आधारित एक विश्वकोषीय ग्रंथ है। इसमें नगरों और गांवों की योजना, घरों, सभागारों, महलों तथा मंदिरों के निर्माण का विस्तृत वर्णन मिलता है। सरस्वतीकण्ठाभरण, काव्य-रचना के लिए संस्कृत व्याकरण पर आधारित ग्रंथ है।
- व्यवहारमंजरी धर्मशास्त्र या हिंदू विधि पर आधारित एक ग्रंथ है और चारुचर्या व्यक्तिगत स्वच्छता एवं स्वास्थ्य संबंधी ग्रंथ है।
- स्थापत्यकला में योगदान:
- भोज ने बेतवा नदी के तट पर भोजपुर नगर बसाया, भोजेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया, क्षेत्र में तीन बांधों का निर्माण करवाया, कोलांस नदी पर मिट्टी का बांध बनाकर भोपाल की अपर झील का निर्माण करवाया।
- 2011 में इस झील का नाम बदलकर भोजताल कर दिया गया।
भूमिज मंदिर स्थापत्य कला
पंचायतन शैली
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परमार वंश के बारे में
- उत्पत्ति: माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति अग्निवंशी राजपूतों से हुई थी, जो स्वयं को दैवीय वंश का योद्धा मानते थे।
- संस्थापक: परमार वंश की स्थापना नवीं शताब्दी के प्रारंभ में उपेंद्र (कृष्णराज) ने की थी। सीयक II ने इसे एक स्वतंत्र राज्य बनाया। राष्ट्रकूट राजा खोट्टिग को पराजित करने के बाद, सीयक II ने मान्यखेत के राष्ट्रकूटों का उत्तराधिकार प्राप्त किया।
- राज्य का विस्तार: परमार साम्राज्य की मुख्य राजधानियां उज्जैन और धार (धार नगरी) थीं। अपने उत्कर्ष काल में, यह कोटा-बूंदी (उत्तर) से गोदावरी क्षेत्र और खानदेश (दक्षिण) तक, भिलसा-होशंगाबाद-सागर (पूर्व) से माही नदी (पश्चिम) तक फैला हुआ था। इस प्रकार यह वर्तमान मालवा तथा उससे लगे विस्तृत क्षेत्रों को आच्छादित करता था।
- मंदिर स्थापत्य कला: परमारों ने मुख्य रूप से मंदिर-स्थापत्य कला की भूमिज शैली को विकसित किया। इनके अधिकांश मंदिर पंचायतन शैली में निर्मित हैं।