भारत अपने पुराने होते जल अवसंरचना को सुदृढ़ करने के लिए बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (Dam Rehabilitation and Improvement Project - DRIP) संचालित कर रहा है। DRIP विश्व के सबसे बड़े बांध पुनर्वास तथा सुरक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रमों में से एक है।
भारत में बांधों की स्थिति
- वैश्विक रैंकिंग: भारत 6,628 निर्दिष्ट बांधों के साथ अमेरिका और चीन के बाद बड़े बांधों की संख्या की दृष्टि से विश्व में तीसरे स्थान पर है।
- स्वामित्व:
- 98.5% बांध राज्य सरकारों के स्वामित्व में हैं।
- 0.7% बांध केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (CPSUs) के पास हैं।
- 0.6% बांध निजी संस्थाओं के पास हैं।
- 0.2% बांध केंद्र सरकार के पास हैं।
- राज्यवार वितरण: महाराष्ट्र में निर्दिष्ट बांधों की संख्या सर्वाधिक है, उसके बाद मध्य प्रदेश और गुजरात का स्थान है।
भारत में बांध सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं
- पुरानी होती अवसंरचना: भारत के लगभग 26% (1,681 बांध) बांध 50 वर्ष से अधिक पुराने हैं, जिनमें से 291 बांध 100 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।
- भंडारण क्षमता का ह्रास: केंद्रीय जल आयोग (CWC) के आंकड़ों के अनुसार, अवसादन के कारण जलाशयों ने अपनी कुल भंडारण क्षमता का औसतन 19% हिस्सा खो दिया है। जलाशयों की औसत आयु 42 वर्ष है।
- भूकंपीय सुभेद्यता: उदाहरण के लिए, 2001 में भुज (गुजरात) के भूकंप के कारण चांग बांध की नींव में द्रवीकरण (Liquefaction) की समस्या देखी गई थी।
- हिमनद झील प्रस्फोट का जोखिम: उदाहरण के लिए, 2023 में सिक्किम के चुंगथांग बांध का ढहना हिमनद झील प्रस्फोट के कारण आई अचानक बाढ़ का परिणाम था।
- रखरखाव के लिए आवश्यक वित्तपोषण का अभाव: बांध सुरक्षा के प्रयास प्रायः अपर्याप्त संचालन और रखरखाव (O&M) बजट के कारण बाधित होते हैं।
- अन्य: बदलते जलविज्ञानीय प्रतिरूपों; रिसाव, पाइपों में जंग और कमजोर नींव के कारण संरचनात्मक विफलता; बढ़ती जलवायु परिवर्तनशीलता; तथा सीमा-पार नदियों और बेसिनों में समन्वय संबंधी समस्याएं।
भारत में बांध सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए की गई पहलें

- बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (DRIP): इसे संरचनात्मक मरम्मत, स्पिलवे और गेटों के आधुनिकीकरण तथा उन्नत निगरानी प्रणालियों की स्थापना के माध्यम से मौजूदा बांधों की सुरक्षा एवं परिचालन प्रदर्शन में सुधार के लिए 3 चरणों में लागू किया जा रहा है।
- DRIP चरण I (2012–2021): इसे विश्व बैंक की सहायता से अप्रैल 2012 में प्रारंभ किया गया था। इसमें सात राज्यों के 223 बांध शामिल थे। इसी दौरान धर्मा (DHARMA) एप्लीकेशन पेश किया गया।
- DRIP चरण II और III: 2021 में प्रारंभ किया गया; यह विश्व बैंक और एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) द्वारा सह-वित्तपोषित है। इसमें 19 राज्यों और तीन केंद्रीय एजेंसियों के 736 बांध शामिल हैं।
- बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021: यह निर्दिष्ट बांधों की

- निगरानी, निरीक्षण, संचालन और रखरखाव का प्रावधान करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं हैं -
- 4-स्तरीय संस्थागत ढांचे का निर्माण-
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा समिति (NCDS): शीर्ष निकाय।
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA): नियामक और कार्यान्वयन शाखा।
- राज्य बांध सुरक्षा समितियां (SCDS) और राज्य बांध सुरक्षा संगठन (SDSO): राज्य स्तर पर निगरानी, निरीक्षण और अनुपालन के लिए उत्तरदायी है।
- यह बांध मालिकों पर रखरखाव और मरम्मत के लिए पर्याप्त धन आवंटित करने की जिम्मेदारी आरोपित करती है।
- अन्य: नियमित निरीक्षण, उपकरण प्रणालियों की स्थापना, व्यापक बांध सुरक्षा मूल्यांकन, जोखिम मूल्यांकन अध्ययन, अंतर्वाह पूर्वानुमान, और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (EWS) आदि।
- 4-स्तरीय संस्थागत ढांचे का निर्माण-
- क्षमता निर्माण और अनुसंधान: IIT रुड़की और IISc बेंगलुरु में बांधों के लिए अंतर्राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (ICEDs) तथा MNIT जयपुर में 'बांधों की भूकंपीय सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय केंद्र' स्थापित किए गए हैं। वे भूकंपीय खतरों की मैपिंग, पुनर्वास की आधुनिक तकनीकों और जोखिम के आकलन पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- डिजिटल निगरानी और AI का एकीकरण:
- डैम हेल्थ एंड रिहैबिलिटेशन मॉनिटरिंग एप्लीकेशन (DHARMA) ऐप: यह डिजिटल रूप से निरीक्षणों को रिकॉर्ड करता है, रखरखाव को ट्रैक करता है और बांधों के सुरक्षा संबंधी डेटा को होस्ट करता है।
- ई अभ्यास (eAabhas): बांधों और बैराजों के लिए AI/ML और IoT आधारित वास्तविक समय की निगरानी और बाढ़ पूर्वानुमान मंच।
आगे की राह
- जीवनचक्र प्रबंधन की ओर परिवर्तन: भविष्य की नीतियों को केवल नए बांधों के निर्माण से हटकर मौजूदा अवसंरचना की सुरक्षा, लचीलेपन और व्यापक जीवनचक्र प्रबंधन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
- जलवायु लचीलापन: संवेदनशील क्षेत्रों में बांध मालिकों को मानसून से पहले हिमनद झील प्रस्फोट जनित बाढ़ (GLOF) संबंधी अध्ययन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (EWS) की स्थापना पर सक्रियता से कार्य करना चाहिए।
- सतत वित्तपोषण: दीर्घकालिक रखरखाव सुनिश्चित करने के लिए सतत वित्तीय मॉडल अपनाए जाने चाहिए।
निष्कर्ष
सक्रिय और व्यापक सुधार न केवल अनुप्रवाह वाले क्षेत्रों की आबादी की रक्षा करेंगे और आपदा जोखिमों को कम करेंगे, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भारत के महत्वपूर्ण जल अवसंरचना की दीर्घकालिक स्थिरता, परिचालन दक्षता और लचीलेपन की गारंटी भी देंगे।